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मोटी तनख्वाह की नौकरी छोड़ यह शख्स अपने अनूठे आइडिया से बांस को बना रहे प्लास्टिक का विकल्प

हमारी संवेदनशीलता ही है जो हमें मनुष्य बनाती है। जब हम अपने आसपास के पर्यावरण, समाज के प्रति संवेदी होते हैं तो साथ ही किसी अवांछित के ना होने की जिम्मेदारी भी उठाते हैं। महाराष्ट्र के पुणे मे भी एक युवा इसी तरह पर्यावरण की चिंता लेकर कुछ नया और उपयोगी करने आगे आया है। पर्यावरण के प्रति अपनी जिम्मेदारी को निभाते हुए एक आईटी प्रोफेशनल योगेश शिंदे ने अपनी मोटी तनख़्वाह वाली नौकरी छोड़कर किसान बनने का संकल्प लिया।

बांस को बना रहे प्लास्टिक का विकल्प

योगेश आज बांस की खेती कर रहे हैं और इतना ही नहीं उनकी योजना के अनुरूप वे बांस को प्लास्टिक के विकल्प के तौर पर खड़ा कर रहे हैं। हम सभी जानते हैंं कि प्लास्टिक पर्यावरण के लिए सबसे घातक है या यूँ कहें कि हमारे पर्यावरण को प्रदूषित करने वाला धीमा ज़हर है। शुरुआत में योगेश भी पर्यावरण संरक्षण और किसानों की समस्याओं के प्रति बहुत अधिक संवेदनशील नहीं थे। लेकिन अपनी नौकरी के दौरान जब उन्हें जर्मनी जाने का अवसर मिला तो उनका सामना वहाँ के किसानों से हुआ और उन्हें पता चला कि भारत जैसे कृषि प्रधान माने जाने वाले देश के किसान और जर्मन के किसान में दिन-रात का अंतर हैं, वहाँ के किसान समृद्ध हैंं।

उसके पास वो सब सुविधाएं हैंं जो एक संपन्न व्यक्ति के पास होती है, साथ ही वे पर्यावरण संरक्षण को लेकर बहुत ही जागरूक हैं। इस बात ने उन्हें सोचने पर विवश कर दिया। उसके बाद योगेश जब भारत लौटे तो वे बदल चुके थे। उनके पास एक विचार था जिसने उन्हें एक नई दिशा प्रदान की।

किसानों का दर्द दिल से महसूस किया

योगेश एक घटना का ज़िक्र करते हुए कहते हैं कि “जब मैं लौटकर आया तो उसी समय पेशे से एक किसान और मेरे परिवार के करीबी मित्र ने आत्महत्या की थी। ऐसा नहीं था कि मैंने अपने जीवन में पहली बार किसी किसान के आत्महत्या करने के बारे में सुन रहा था। लेकिन यह पहली बार था जब मैंने उसके दर्द को दिल से महसूस किया।”

योगेश को यात्रा करना बहुत पसंद है और अपनी नौकरी के दौरान उन्हें 20 देशों में रहने और वहाँ की संस्कृति को समझने का अवसर मिला। योगेश बताते हैं कि “मैं कुछ ऐसा करना चाहता था, जिससे पर्यावरण को नुकसान भी न हो और किसानोंं को ज्यादा-से-ज्यादा लाभ भी मिले। मेरे मन में यह विचार तब आया, जब मैं अपने काम के सिलसिले में यूरोप के दौरे पर था। मैंने वहां देखा कि कैसे किसान और आम लोग पर्यावरण को फायदा पहुंचाने के लिए प्राकृतिक पदार्थों से बने प्रोडक्ट़्स पर ही जोर दे रहे थे।”

पर्यावरण के लिए सबसे हानिकारक है प्लास्टिक

इन सब बातों के साथ ही योगेश ने यह भी जाना की हमारे पर्यावरण के लिए सबसे हानिकारक प्लास्टिक है और हम सुबह ब्रश करने से लेकर किचन तक में प्लास्टिक की कई चीजें प्रयोग में लाते हैं क्योंकि सस्ता और मजबूत होने के कारण प्लास्टिक आज हमारी दिनचर्या का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। यही कारण है की आज हर साल लाखों मीट्रिक टन प्लास्टिक वेस्ट पैदा हो रहा है। प्लास्टिक को जमीन में पूरी तरह से गलने में हजारों साल लग जाते हैं। इस प्रक्रिया में पर्यावरण को बहुत हानि होती है। उदाहरण के तौर पर एक टूथब्रश को ही देखिये जिसे हम महीने-दो महीने में बदलते रहते हैं देश में लगभग 150 मिलियन टूथब्रश हर महीने फेंक दिए जाते हैं। इसका नुकसान पर्यावरण को रहा है।

पत्नी ने बास इण्डिया की स्थापना की

योगेश एक आईटी प्रोफेशनल थे और वे अपनी पढ़ाई का खेती में प्रयोग करना अच्छे से जानते थे इसलिए उन्होंने प्लास्टिक के विकल्प के रूप में बांस को चुना। जिसके लिए महाराष्ट्र की भूमि बहुत ही उपयुक्त थी। योगेश बताते हैं कि “एक बार सभी स्थितियों का अध्ययन करके और मेरी पत्नी अश्विनी शिंदे ने 2016 में पुणे के पास वेले गांव में बांस इंडिया की स्थापना की थी। हमारा लक्ष्य प्रमुख हस्तशिल्प और फर्नीचर उद्योग से दूर रहकर और घरेलू प्लास्टिक उत्पादों के प्रभावी विकल्प के तौर पर बांस का प्रयोग करना था।”

मुश्किलें भी आईं, लेकिन हार नहीं माना

योगेश के लिए कार्य शुरू करने की सबसे बड़ी चुनौती थी, धन की व्यवस्था करना। शुरुआत में कई बैंकों ने उन्हें लोन देने से मना कर दिया। फिर उन्होंने अपने स्तर पर बीज फंड को सुरक्षित करने के लिए अपने ही घर पर बांस के बीजों का संवर्धन करना शुरू किया। धीरे-धीरे काम प्रगति करने लगा सभी सरकारी नियमों की पूर्ति करने के बाद बांस इंडिया ने काम करना शुरू किया और आज वे नोटबुक, कपड़ों के टेग, पेन, डेस्क, टूथब्रश से लेकर आदि का बांस से निर्माण करना प्रारम्भ किया। और ई-कॉमर्स मंच के माध्यम से उनका क्रय-विक्रय शुरू किया।

प्लास्टिक कचरे को रोकना है लक्ष्य

पहले सात महीनों में बिना किसी बाहरी वित्तीय सहायता के 50 मिलियन से अधिक उनका व्यवसाय रहा। उसके बाद कई लोग उनकी सहायता को आगे आए किसानों को अधिक संख्या में रोजगार और खेती का विकल्प मिला और पिछले नौ महीनों में उन्होंने सात देशों में निर्यात किया है उनका लक्ष्य है 1,00,000 किलो प्लास्टिक कचरे को रोकना।

योगेश बताते हैं कि “हम जानते है बांस सिर्फ एक प्रकार का घास हैं लेकिन इसमें हजारों प्रजातियां हैं। यह इतना बहुमुखी है कि घरों, फर्नीचर और स्वादिष्ट पोषक तत्व युक्त भोजन बनाने में भी कारगर है इतना ही नहीं बांस किसी भी चीज में ढाला जा सकता है — चाहे वह हथियारों या संगीत वाद्ययंत्र हों। भारत तो दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बांस उगाने वाला देश है हमारे देश में लगभग 125 बांस की प्रजातियां पाई जा रहीं हैं लेकिन यह वैश्विक बांस उत्पाद बाजार हिस्सेदारी का केवल चार प्रतिशत योगदान देता है।”

पर्यावरण को बचाना है सबसे बड़ा मकसद

योगेश कहते हैं कि “बांस से प्रोडक्ट तैयार करने और उन्हें देश के और विदेश के बाजारों तक पहुँचाने के लिए बहुत धन की आवश्यकता थी और मैंने इसमे अपने जीवन भर की पूंजी लगा दी थी जो बहुत ही बड़ा जोखिम था। लेकिन अब सफलता हमारे पास है और परिणाम से सभी परिचित है। योगेश की योजना ने आज कई किसानों को नई उम्मीद दी है साथ ही पर्यावरण को प्रदूषित कर रहे प्लास्टिक का विकल्प बांस के तौर पर हमें प्रदान किया है।

यदि उनकी यह योजना वृहत पैमाने पर अपनाई जाती है तो लगातार खराब होते पर्यावरण को बचाने की दिशा में यह एक बड़ा कदम साबित होगा। यह मनुष्य के परिवेश व पर्यावरण के प्रति संवेदनशील होने का एक उदाहरण है। ऐसे उदाहरण दुनिया के खूबसूरत बने रहने की उम्मीद जगाने में मील का पत्थर साबित होगा।

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