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लोगों को मेरी प्रतिभा नहीं बल्कि विकलांगता दिखती थी, मैं बिना किसी परवाह के आगे बढ़ती चली गई

जिंदगी सतत परिवर्तन का नाम है। बहुत आसान होता ज़िन्दगी को बिगड़ जाने देना, परन्तु बहुत कठिन होता है विषम परिस्थितियों से जूझते हुए भी ज़िन्दगी जीना। महत्वपूर्ण होता है आगे बढ़ना और एक नई शुरुआत करना, बजाय इसके कि हमेशा पुरानी चीजों को याद करते रहना। इसके लिए बहुत से साहस और धैर्य की जरूरत होती है परंतु लगातार किया गया प्रयास और अटूट प्रतिबद्धता ज़िन्दगी को बहुत ऊंचाइयों तक ले कर जाती है।

अगर आपका इस पर विश्वास नहीं है तो पूजा शर्मा की जीवन यात्रा पढ़िए, जो यह मानती हैं कि कभी-कभी कठिन समय से गुजर कर ही हम एक बेहतर मुक़ाम तक पहुंच पाते हैं। एक जाने-माने लॉ कॉलेज ने इन्हें एडमिशन के लिए इंकार कर दिया, इस भूतपूर्व मिस व्हीलचेयर इंडिया ने अपने रास्तों में आए हर विषम परिस्थिति को स्वीकार किया और उनसे जूझकर और भी ऊपर उठती रहीं।

40 दिन की उम्र में ही नसों की खराबी की वजह से उन्होंने अपने पैर खो दिए। उनके माता-पिता ने बहुत से डॉक्टरों को दिखाया परंतु कोई मदद नहीं मिली। उनकी यह क्षति गंभीर और असाध्य थी। बिना पैरों के वह बड़ी हुई, पूजा बहुत ही हिम्मती और स्वयं प्रेरित बनी रहीं, पर तभी तक जब तक बाहरी दुनिया की कठोर वास्तविकताओं की चुनौती का सामना उनसे नहीं हुआ था।  

उनका जुनून कानून की पढ़ाई करना था इसलिए उन्होंने पुणे के सिम्बिओसिस कॉलेज में अपना दाखिला करवाया। उनकी जरूरतों का ध्यान रखते हुए कॉलेज ने उनके लिए रैंप की सुविधा उपलब्ध कराई। यह रैंप बिल्कुल खड़ी थी और अधिकारियों से कई बार विनती करने पर भी उनकी बातें अनसुनी कर दी गई। वह कहते जो हमने आपको दिया है उसी में आप एडजस्ट करिए हम आपकी और जरूरतों को पूरा नहीं कर सकते।

पूजा बताती हैं, “कुछ महीनों बाद उन्होंने मुझसे कहा कि आप कहीं और एडमिशन ले लीजिए क्योंकि हम आपकी और मदद नहीं कर सकते, परन्तु मैंने हार नहीं मानी। मैंने एक बेहतर कॉलेज में एडमिशन लिया और अपनी डिग्री पूरी की।”

उन्होंने कॉलेज बदल कर सफलता पूर्वक अपनी कानून की डिग्री पूरी की। सैकड़ों बाधाओं के बाद भी उनकी अन्तः प्रेरणा ने उन्हें हमेशा आगे बढ़ना सिखाया। परंतु दुनिया में जहाँ प्रतिस्पर्धा और नैतिकता से विद्यार्थी पिछड़ जाते हैं, नौकरी के लिए उनका संघर्ष खत्म नहीं हुआ था।

वे बताती हैं, “ इंटरव्यू के दौरान उन्हें केवल मेरी विकलांगता ही दिखाई देती थी, मेरी प्रतिभा नहीं। यह बेहद हतोत्साहित करने वाला होता था परंतु अंत में मुझे एक अच्छी नौकरी मिल गई। पूजा जीवन में एक के बाद एक सफलता के नित नए सोपान तय करती जा रही है, फिर भी जीवन में कई ऐसी घटनाएं घटीं जिन्होंने उनकी इच्छा शक्ति को झिंझोड़ कर रख दिया। कभी-कभी वह अपने आप को अयोग्य महसूस करने लगती और उनका आत्मविश्वास ढहने लगता।

पूजा बताती हैं, “ मैं वह रात नहीं भूल पाती जब मेरे एक दोस्त ने, जो मुझे घर वापस छोड़ने वाला था, मुझे दिल्ली के किसी अनजान जगह पर सरे राह अपनी गाड़ी से उतार दिया। मैं बहुत डर गई थी। मैंने बहुत सारे उबर कैब्स को कॉल किया परंतु जब वह देखते कि मैं व्हीलचेयर में हूं तो वह मुझे छोड़ने से मना कर देते। वह पहली बार था जब मैं खूब रोई थी। पर यही वह समय था जब मैंने निश्चय किया कि अब मैं किसी पर निर्भर नहीं होउंगी । मैंने जल्द ही ड्राइविंग सीख ली और अपनी कार को अपने हिसाब से मॉडिफाई करवा लिया और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।”

पूजा की शारीरिक विकलांगता ने उसके जीवन को नहीं बदला, कभी हार ना मानने वाली उसकी जिजीविषा थी जिसने उनका पूरा जीवन बदल कर रख दिया। वह अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती थी और दूसरों से किसी भी तरह से कम महसूस नहीं करना चाहती थी।

पूजा कहती है, “मेरे जीवन में बहुत सारी चुनौतियां आईं परंतु मैंने हार नहीं मानी। बहुत से लोग सबसे पहले मेरे व्हीलचेयर को देखते हैं परंतु मेरे साथ कुछ समय बिताने के बाद वह सभी खुश हो जाते हैं। मुझे लगता है आज मैं अपने पांव पर खड़ी हूं और मैं उड़ रही हूं।”

2017 में उन्हें मिस व्हीलचेयर इंडिया का तमगा मिला और उसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। पूजा ने एक ऐसी उपलब्धि हासिल की, जो दूसरे नहीं कर पाते, उन्होंने खुद को सशक्त बनाया और आज वह आत्मनिर्भर हैं। वह उन सभी लोगों की हीरो हैं जो अपनी कमजोरियों से भागते हैं और शर्म महसूस करते हैं बनिस्बत इसके कि वे अपनी कमजोरियों को अपनी ताकत बनाना चाहें।

जिंदगी सभी के सामने विषम परिस्थितियां लाती है, कभी-कभी हालात हमारी आत्मा को बिखेर कर रख देते हैं, परंतु महत्वपूर्ण यह है कि हम कैसे खड़े होते हैं और हम क्या करते हैं। हम पूजा को उनके सुनहरे भविष्य के लिए शुभकामनाएं देते हैं।

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