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‘बच्चे मर रहे थे, परिवार बिखर रहे थे’ फिर एक महिला की क्रांतिकारी मुहिम ने पूरे गाँव को बचाया

मेडिकल जर्नल लांसेट के अनुसार, साल 2015 में भी वैश्विक बाल मृत्यु दर में सर्वाधिक आँकड़ा भारत का रहा था। वैश्विक स्तर पर अतिसार (डायरिया) 5 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए चौथी सबसे बड़ी जानलेवा बीमारी है। जबकि भारत में जन्म के समय होने वाली समस्या और न्यूमोनिया के बाद यह तीसरी सबसे खतरनाक जानलेवा बीमारी है।

असम के जोरहाट जिले में यह बीमारी कइयों की जान ले रहा था। इससे फैले दहशत का कोई कारण लोगों को समझ में नहीं आ रहा था और न ही कोई प्राधिकारी वर्ग की ओर से मदद मिल रही थी। बच्चे मर रहे थे, परिवार बिखर रहे थे। खुले में शौच और स्वास्थ्य संबंधी नियमों का पालन नहीं करना प्रमुख कारणों में थे।

ऐसे में 47 वर्षीय एक ग्रामीण महिला बाॅन्टी सैकिया आगे आईं और इस प्राणघातक रोग के खिलाफ लड़ने का निर्णय लिया। उन्होंने इस बीमारी के बारे में जानने के लिए गाँव में आयोजित स्वास्थ्य शिविरों में भाग लिया और इस रोग के कारणों को समझा। आज वह अपने सतत कठिन प्रयासों और समर्पित भावना से गाँव की कई जिंदगियों को बचा चुकीं हैं।

बाॅन्टी एक शिक्षित महिला हैं। उन्होंने यह तय किया कि वे गाँव के लोगों के बीच इस बीमारी के प्रति जागरुकता फैलाएंगी। इसके लिए उन्होंने उन लोगों को पहले शिक्षित करना शुरू किया जिनके घरों में शौचालय नहीं थे। वे घर-घर जाती और सुरक्षित व स्वास्थ्यकर शौच के महत्व को समझाती।

“मैंने अपने गाँव के लोगों को साबुन से हाथ धोना सिखाया, कैसे घर पर शौचालयों का प्रयोग किया जाए और उसे साफ-सुथरा रखा जाए और स्वस्थ जीवनशैली के नियम बताए”, बाॅन्टी ने NDTV को एक साक्षात्कार में बताया

गांव के स्कूलों में जा-जा कर उन्होंने बच्चों को सुरक्षित शौच और स्वास्थ्यवर्धक जीवनशैली अपनाने की शिक्षा देना शुरू किया। वे ग्राम पंचायतों में कार्यशालाओं का आयोजन करती और डायरिया के कारणों और उसके उन्मूलन के उपायों के प्रति जागरुकता अभियान चलाती। वे शौचालय निर्माण के लिए सरकार द्वारा दी जाने वाली आर्थिक सहायता राशी के बारे में सबको सूचित करतीं।

“यह आसान नहीं था, हर कोई मुझे सुनना नहीं चाहता था। परंतु मैंने कभी उम्मीद नहीं छोड़ा। यदि वे पहली बार में मुझे नहीं सुनते तो मैं दोबारा उनके पास जाती, तबतक की जब-तक वे मेरे अनुसार कहने पर सचमुच में काम नहीं करते।

उन परिवारों के लिए जो शौचालय निर्माण के लिए समाग्री आदि की व्यवस्था कर पाने में असमर्थ थे, उनके लिए बाॅन्टी के पास दूसरे विकल्प थे। वह दुकान के मालिकों से समाग्री उपलब्ध करने के लिए बात करतीं और परिवारों से कहती कि जब सरकार द्वारा आर्थिक सहायता राशि प्राप्त हो तो दुकानदारों को भुगतान कर दें।

पिछले वर्ष बाॅन्टी के गांव को खुले में शौच से मुक्त गांव घोषित किया गया। उन्होंने गांव में 2000 से अधिक शौचालयों के निर्माण में अपनी भागीदारी निभाई है।

बिहार में आयोजित #चलो_चम्पारण समारोह में बाॅन्टी सैकिया को असम को खुले में शौच से मुक्त बनाने के लिए उनके द्वारा किए गए प्रयास को प्रधानमंत्री के द्वारा सम्मानित किया गया।

आज बाॅन्टी सबसे बड़े स्वच्छता पहल, स्वच्छ भारत अभियान का हिस्सा होने पर गर्व महसूस करती हैं।

“मैं आप में से हरेक से यह गुहार करना चाहती हूं कि स्वच्छ भारत का सपना पूरा करने के लिए कुछ करें। हम सब के द्वारा उठाया गया एक साधारण कदम इस लक्ष्य को प्राप्त करने में सामूहिक रुप से मदद कर सकता है।”

सैकिया ने यह सुनिश्चित करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ा कि उसके ग्राम पंचायत में हर घर में शौचालय हो और इसे नियमित रूप से इस्तेमाल किया जाए। आज, वह हमारे लिए एक प्रेरणा और प्रोत्साहन हैं कि हम 2019 तक स्वच्छ भारत का निर्माण करने में अपने स्तर से भूमिका निभाएं।

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