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“शुरुआत में मुझे वजन उठाने से बहुत डर लगता था’ कुछ ऐसी है इतिहास रचने वाले गुरुराजा की कहानी

यह सच है कि प्रतिभा संसाधन की मोहताज नहीं होती, यदि हौसला और कुछ कर गुजरने का ज़ज़्बा साथ हो तो देर ही सही, कामयाबी जरूर मिलती है। हमारी आज की कहानी एक ऐसे ही शख्स के हौसले से ओतप्रोत है जिन्होंने राह में आने वाली तमाम चुनौतियों का डटकर मुकाबला किया और आज वैश्विक मंच सिर्फ अपना ही नहीं पूरे हिंदुस्तान का नाम रोशन कर रहे हैं।

जी हाँ हम बात कर रहे हैं 21वें राष्ट्रमंडल खेलों में भारत की झोली में पहला पदक डालने वाले कर्नाटक के पी. गुरुराजा की। उन्होंने भारोत्तोलन में पुरुषों के 56 किलो वर्ग मेंं सिल्वर मेडल जीतकर इतिहास रच दिया। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि गुरुराजा एक ट्रक चालक के बेटे हैं और उन्हें जीवन के हर मोड़ पर आर्थिक परिस्थितियों का सामना करना पड़ा है।

 

वैसे तो कोई भी कामयाबी साधारण नहीं होती लेकिन गुरुराजा की कामयाबी की कहानी इसलिये भी औरों से अलग है क्योंकि उसकी परिस्थितियां भी अलग थीं, बनना तो उन्हें भारोत्तोलक यानी वेट लिफ्टर ही था और बड़े संघर्ष के बाद वे बन भी गये पर वे बनना कुछ और ही चाहते थे। गुरुराजा की कामयाबी की कहानी फिल्मी भी है और दिलचस्प भी।

एक समय खाने के थे लाले

उनकी मानें तो शुरुआती दिनों में वे कई बार इस खेल से डरकर हार भी गए थे लेकिन फिर खुद से ही प्रेरित होकर आगे बढ़े, हर डर के बाद वे अपने परिवार के बारे में सोचते और उन्हें जीत हासिल होती, इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ।  कर्नाटक के एक छोटे से कस्बे कुंडूपारा के एक गरीब परिवार में जन्में गुरुराजा के पिता ट्रक ड्राइवर हैं। साल 2010 में उन्होंने सिर्फ 13 साल की उम्र में वेटलिफ्टिंग के क्षेत्र में कदम रखा था और खेलना शुरू किया था। 10 सदस्यों से भरे पूरे परिवार में गुरुराजा कई साल तक आर्थिक तंगी से जूझे, एक समय तो ऐसा आया कि उनके पास खाने तक के पैसे नहीं थे।

पिता को बनाया अपना आदर्श और सुशील कुमार से मिली प्रेरणा 

गुरुराजा ने हार नहीं मानी और लड़ते गए। हर दौर में उनके पिता ने उनका हौसला बढ़ाया, पिता के अलावा एक और शख्स थे, जिनसे गुरुराजा को लगातार हिम्मत मिलती थी और वो थे सुशील कुमार।

गुरुराजा बताते हैं कि सुशील कुमार से ही प्रेरित होकर मैंने वेटलिफ्टर बनने की ठानी पर वे कहते हैं कि मैं पहलवान बनना चाहता था लेकिन मेरे कोच को मुझ में अलग करने की प्रतिभा दिखी। और उन्होंने मुझे इसी तरह तैयार भी किया।

मैं अभी भी कुश्ती का लुत्फ उठाता हूं। मुझे अभी भी उस खेल से काफी लगाव है।

ओलम्पिक में करना चाहते हैं देश का प्रतिनिधित्व

गुरुराजा कहते हैं कि मैं ओलंपिक की तैयारी करूंगा, राष्ट्रीय महासंघ और मेरे सफर में मेरा साथ देने वालों से मुझे काफी मदद मिली है। मेरे सभी कोचों ने करियर को संवारा है। उन्होंने सुशील कुमार को पहली बार 2010 में राष्ट्रमंडल खेलों में देखा था, तब उन्होंने भारोत्तोलन शुरू किया था।

शुरुआत में मैं बहुत हताश था, मुझे वजन उठाने में डर लगता था, 2010 में मैं छोटा था और भार उठाने में काफी मशक्कत लगती थी।

शुरुआती दिनों में उन्हें हार का सामना करना पड़ा लेकिन फिर वे कहते हैं कि – “मैं अपने घर की आर्थिक परिस्थितियों के बारे में सोचने लगता था कि कैसे मेरे पिता ने ट्रक चलाकर हमारा लालन-पालन किया, अपने 10 सदस्यों से भरे पूरे परिवार का भविष्य सोचता हूँ तो हिम्मत मिलती है।”

इस बार की जीत की बात करेंं तो वे बताते हैं कि क्लीन और जर्क के पहले दो प्रयास में विफल होने के बाद, मेरे कोच ने मुझे हिम्मत दी, वे मुझे लगातार प्रेरित करते रहते हैं, उन्होंने मुझे समझाया कि मेरा भविष्य और जीवन का काफी कुछ इस प्रयास पर निर्भर करता है। मैंने अपने परिवार और देश को याद किया और पहले दो प्रयासों में हारने के बाद तीसरे प्रयास में जीत मिली।

गुरुराजा की सफलता यह साबित करती है कि यदि व्यक्ति पूरी लगन और मेहनत के साथ अपने लक्ष्य का पीछा करे तो कामयाबी जरूर हासिल होगी।

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