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कभी ख़ुद हो गई थी मानव तस्करी का शिकार, आज अपनी मुहिम से बचा चुकी हैं सैकड़ों जिंदगियां

भारत में प्रतिवर्ष 30 लाख बच्चे और महिलाएं मानव तस्करी का शिकार होते हैं। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अनुसार 2014 की वार्षिक रिपोर्ट में यह बताया गया है कि 12 लाख बच्चे बलपूर्वक वेश्यावृत्ति के लिए मजबूर कर दिए जाते हैं। अधिकतर लोग भाग्य के आगे घुटने टेक देते हैं परंतु कुछ महिलाएं इस गुलामी की ज़ंजीर को तोड़ने में सक्षम हो पाती हैं और एक बेहतर जिंदगी बिताती हैं।

आज हम जिन की कहानी आपके सामने लेकर आए हैं वह 27 वर्षीया रमा देवी हैं जिन्होंने एक कठोर कदम उठाया और यह भी सुनिश्चित किया कि 12 साल पहले जो उनके साथ हुआ था, वह भयावह स्थिति किसी और के साथ न हो।

किशोरावस्था के शुरुआत में जब अधिकतर बच्चे भविष्य की नई आशायें और सपने बुन रहे होते हैं, वहीं रमा का 14 वर्ष की उम्र में ही विवाह हो गया था। ससुराल की उनकी जिंदगी में उनके लिए कुछ भी याद करने लायक नहीं था। उन्होंने बड़ी शारीरिक और मानसिक यातनाएं सही और दहेज उत्पीड़न से भी होकर गुज़रीं ।

शादी के कुछ महीनों बाद ही रमा गर्भवती हो गई और उन्हें प्यार और देखभाल की जरूरत थी।  परंतु उनके पति में कोई बदलाव नहीं आया और फिर भी उन पर अत्याचार करता रहा। सही तरीके से देखभाल नहीं मिलने की वजह से वह अपने माता-पिता के घर आंध्र प्रदेश के अनंतपुर आ गईं।  

15 वर्ष की उम्र होते-होते रमा ने एक बेटी को जन्म दिया। उन्हें लगा परिस्थितियां अब बेहतर  हो जाएंगी, परन्तु भाग्य ने उनका साथ नहीं दिया और उनकी यातनाएं बढ़ने लगीं। बच्चे के जन्म के बाद उनका पति उन्हें मां के यहां से लौटा लाया था। उनकी सास ने बेटी पैदा होने पर शिकायत करनी शुरू कर दी और नए सिरे से अत्याचार करने शुरू कर दिया। रमा दिन भर घर के सारे काम करती थी। यातनाएं असहनीय हो चुकी थीं इसलिए रमा ने 5 महीने बाद वह घर छोड़ दिया और अपने माता-पिता के घर आ गईं।

घर लौटने के बाद रमा ने देखा उनके माता-पिता ईंटे के भट्टे में दैनिक मजदूरी करते थे। वह जल्दी ही समझ गई कि जब तक उनके माता-पिता काम से नहीं लौटकर आ जाते उन्हें अकेले ही रहना पड़ेगा। अकेलेपन को दूर करने के लिए रमा ने पास रहने वाली पुष्पा के साथ दोस्ती कर ली। पुष्पा के घर के पास दो और महिलाएं थीं और एक पुरुष भी रहता था। वह उनसे तभी बात करते थे जब रमा के माता-पिता काम पर चले जाते थे। वह महिला रमा की मां की उम्र की थी इसीलिए रमा को उन पर विश्वास करने पर कोई भय नहीं था।

एक दिन उन्होंने रमा और पुष्पा को अपने साथ फिल्म देखने जाने के लिए राज़ी किया और यह विश्वास भी दिला दिया कि वह जल्द ही लौट आएंगे। रमा अपने 5 महीने के छोटे बच्चे को छोड़कर मूवी देखने चली गई। उसे नहीं पता था उनके लिए यह तो लम्बी और कठिन परीक्षा की एक शुरुआत है। फिल्म के अंतराल के दौरान रमा और पुष्पा को कोल्ड ड्रिंक दी गई, सिर्फ यही आखिरी चीज उन्हें याद है।

कुछ दिनों के बाद जब उन्हें होश आया, तब उन्होंने अपने आप को महाराष्ट्र के भिवंडी के एक वेश्यालय में पाया। तब उन्हें पता चला कि वे दोनों एक लाख रुपए में बिक चुकी हैं।

अपनी स्थिति से टूट चुकी वे वेश्यालय के मैनेजर के पास गईं परंतु वहां भी कोई सुनवाई नहीं हुई। मैनेजर ने बताया कि रमा के माता-पिता ने उसे बेचने के लिए हामी भरी थी और डील पूरी हो गई। परंतु दोनों ने मैनेजर की बातों पर विश्वास नहीं किया और उन्हें छोड़ देने की गुज़ारिश करने लगीं। जल्दी ही उन्हें पता चल गया की बहुत सी दूसरी लड़कियों के साथ भी ऐसा ही हुआ है। उन्हें जबरदस्ती वेश्यावृत्ति के लिए मजबूर किया गया है।

रमा बताती है, “ वह हमें मारते थे और खाना भी नहीं देते थे….. मैं उस समय केवल अपने बच्चे और माता-पिता के बारे में सोचती थी। मैं उनसे मिलने के लिए बेचैन हो रही थी।”

बंधनों से मुक्त होने के लिए, दोनों दूसरी लड़कियों से इस नरक से निकलने के लिए बात करने लगी। परंतु एक कर्मचारी ने उनकी आवाज़ सुन ली और वेश्यालय के मैनेजर को जाकर सूचित कर दिया और तब उनकी स्थिति और भी बदतर हो गई। उन्हें पहले से भी अधिक यातनाएं मिलने लगी, यहां तक कि रमा की आंखों में मिर्ची पाउडर का पेस्ट तक डाल दिया।

यह सब लगभग 1 साल तक चलता रहा। मैनेजर ने यह निश्चय कर लिया था कि वह दोनों को जाने देंगे क्योंकि वह दोनों दूसरी और लड़कियों को बगावत के लिए उकसा रही थीं। जब रमा घर वापस आई तब उन्होंने देखा कि उनके माता-पिता ने बच्चे की देखभाल के लिए 1.25 लाख का ऋण लिया हुआ है। सबसे बड़ी बात यह थी उसकी बेटी उसे नहीं पहचान पा रही थी क्योंकि बच्ची अलग होते समय केवल 5 महीने की थी।

धीरे-धीरे रमा संभलने लगी थी और कुछ समय बाद वह आंध्र प्रदेश से संचालित NGO रूरल एंड इनवायरमेंट डेवलपमेंट सोसाइटी (REDS) के संपर्क में आई। उनकी मदद से रमा ने यह तय किया कि उनकी तस्करी करने वालों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही करेगी। शुरुआत में पुलिस ने उनका केस रजिस्टर नहीं किया था।

रमा को मीडिया का साथ मिला, इस वजह से पुलिस ने रिपोर्ट फाइल की। यह कोर्ट केस 4 साल चला। उन्हें कोर्ट के बाहर सेटलमेंट करने की पेशकश भी की गई परंतु कोई भी रकम उन तस्करों को सजा दिलाने के लिए पर्याप्त नहीं थी।  2016 में जिन तीन लोगों ने उन्हें बेचा था उन्हें 7 साल की जेल हुई और 50,000 रुपयों का जुर्माना लगा।

रमा की लड़ाई यहीं पर खत्म नहीं हुई। REDS और पुलिस की मदद से रमा बुर्का पहनकर भिवंडी गई और एक बच्चे को बिकने से बचाया। कुछ समय बाद जब रमा ने लोगों का विश्वास जीत लिया तब वह पुलिस के साथ वेश्यालय गई और 30 महिलाओं  को छुड़ा लिया।

आज रमा अपने 10 साथी महिलाओं के साथ मिलकर आंध्र प्रदेश के अनंतपुर के कादरी गांव में लोगों में  इस तरह के मानव तस्करों और यौन शोषण जैसे ख़तरों के खिलाफ जागरूकता फैला रही हैं ।

रमा देवी ने न सिर्फ अपने पर हुए अत्याचार के ख़िलाफ़ साहस दिखाया बल्कि समाज में फैले अन्याय के खिलाफ़ भी खड़ी हुई और  इसके शिकार महिलाओं की बेहतर जिंदगी के लिए भी मार्ग प्रशस्त किया। इन सब परिस्थितियों से निपटने के लिए अलौकिक ताकत की जरूरत पड़ती है और हमारी आज की नायिका ऐसी ही सुपरवुमन हैं। समाज को रमा जैसी और भी साहसी महिलाओं की जरूरत है।

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