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उस गुमनाम नायक की कहानी जिन्होंने कुम्भ मेले में खोये लाखों लोगों को परिवारवालों से मिलवाया

2013 में इलाहाबाद में हुए महा कुम्भ मेले में लगभग 80 लाख लोगों ने भाग लिया था। भारत के चार पवित्र स्थानों में 12 वर्षों में एक बार यह कुम्भ मेला लगता है। यह मेला लगभग दो महीने तक चलता है और इस समय पाप से मुक्ति के लिए पवित्र नदी में स्नान करना शुभ माना जाता है।

हमने कितनी ही फिल्मों में कुम्भ मेले में दो भाइयों के खोने की कहानी सुनी होगी, परन्तु वास्तविक जीवन में भी इस तरह की घटनाएं होती हैं। इसका कारण यह है कि मेले में बहुत भारी संख्या में लोग उपस्थित होते हैं। हालांकि आजकल टेलीकम्यूनिकेशन नेटवर्क की मदद से लोग अपने परिवार के लोगों को कुछ ही घंटों या कुछ दिन में ढूंढ निकालते हैं। परन्तु कुछ बच्चे और बुजुर्ग व्यक्ति जिनके पास फ़ोन नहीं होता और जिनके पास घर जाने तक के लिए पैसे नहीं होते; ऐसा नहीं कर पाते। इन लोगों की मदद के लिए सरकार ने एक कदम उठाया है। वहां पर खोये हुए व्यक्तियों के लिए एक टेंट की व्यवस्था की जाती है जिसका नाम खोया-पाया शिविर, या लॉस्ट एंड फाउंड कैंप होता है। इसके अलावा भारत सेवा दल जैसे बहुत से ग्रुप्स होते हैं वे खोये हुए व्यक्तियों को उनके परिवार वालों से मिलाने का काम करते हैं।

2013 में हुए कुम्भ मेले के दौरान एक ऐसी ही घटना घटी। जिसमें मध्यप्रदेश के एक छोटे से गांव से आये एक 73 वर्षीय किसान अपनी भाभी सरस्वती देवी को कुम्भ मेला लेकर आए थे। जब वे ख़ुशी से मेले में घूम रहे थे, तब लगभग 10 करोड़ लोगों की भीड़ में वे दोनों बिछड़ गए और खो गए।

गंगा नदी के किनारे फैले 4700 एकड़ के क्षेत्र में, सरस्वती देवी आग के किनारे खड़ी थीं, डर से कांप रही थी और उनकी आँखों से लगातार आंसू बह रहे थे। सरस्वती देवी कभी भी अकेले घूमने नहीं गई थी। भीड़ में घूमते हुए उन्हें एक पुलिस ऑफिसर मिल गया जिसने उन्हें भारत सेवा दल के टेंट तक पहुंचाया।

सरस्वती देवी बताती हैं, “भारत सेवा दल के लोगों ने मुझे खाना खिलाया और कम्बल भी दिए। वे बड़े अच्छे लोग थे, मेरे घर के लोगों से भी अच्छे।”

भारत सेवा दल की स्थापना 1946 में एक 86 वर्षीय समाज सेवक राजा राम तिवारी ने किया था, यह उनका पहला कुम्भ मेला था। यह एक चैरिटी ग्रुप है जो कुम्भ के बिछड़े परिवारों को मिलाता है। कुछ साल पहले यह मेला हर तीन वर्षों में हुआ करता था और यहाँ अधिकतर बुजुर्ग व्यक्ति ही आया करते थे। एक बार राजा राम को एक रोती हुई वृद्ध महिला मिली जो अपने साथियों से बिछड़ गई थी।

राजा राम ने कुछ टिन को जोड़कर एक मेगाफोन बनाया और उनके साथियों को नाम से आवाज़ देने लगे ताकि वे उस महिला से मिल पाएं। आख़िर में उस महिला को उनके साथी मिल गए और उन्होंने राजा राम को धन्यवाद दिया और उनके पैर छुए। इस तरह का सम्मान राजा राम को मिलता।

वे कहते हैं,“ यह काम करके मुझे संतुष्टि मिलती है। आत्मा तृप्त होती है और मैं इसके लिए गंगा मैया (नदी) को धन्यवाद देता हूँ।”

उन्होंने अपने आप को कुम्भ मेले में आने वाले लोगों की सेवा में समर्पित कर दिया है। उनका तरीका पूरी तरह व्यवस्थित होता है और उनके दर्जन भर वालंटियर्स बिछड़े परिवार वालों का नाम लाउडस्पीकर से पूरे मेले में चिल्लाते हुए घूमते हैं। इस ग्रुप ने आज तक लगभग 10 लाख बिछड़े वृद्धों और 20,000 बच्चों को अपने परिवारों से मिलवाया है। इस ग्रुप ने कुम्भ मेले में एक बड़ी भूमिका निभाई है।

राजा बताते हैं कि प्रायः हर व्यक्ति अपने परिवारों से एक घंटे या एक दिन में ही मिल जाता था। वे याद करते हुए एक वाक़या बताते हैं जिसमें एक महिला, जो बहरी थी और वह लिख भी नहीं पाती थी, खो गई थी और लगभग 10 दिन के अंदर वह अपने परिवार वालों से मिल पाई। वे बताते हैं कि अशिक्षित और वंचित लोगों के साथ उनके घरों के बारे में जानकारी पा सकना बड़ा मुश्किल होता है।

एक और चैरिटी फाउंडेशन है जिसका नाम हेमवती नंदन बहुगुणा है। उनका काम बिछड़ी लड़कियों और महिलाओं को ढूंढना है। हाई टेक के उपयोग से कई लॉस्ट एंड फाउंड सेण्टर डिजिटल कैमरे से फोटो खींच लेते हैं और उसे बड़े स्क्रीन्स पर दिखाते हैं।

राजा जैसे लोग समाज की निस्वार्थ सेवा करते हैं और बिछड़े लोगों को उनके परिवार से मिलाते हैं। उनका नाम दो बार देश के सबसे बड़े सम्मान पद्मश्री के लिए नॉमिनेट किया गया। बहुत से लोग उनका सम्मान करते हैं, क्योंकि यह व्यक्ति इस सेवा के लिए एक रुपया तक नहीं लेते हैं। कभी-कभी उन्हें प्राइवेट डोनेशन मिल जाया करता है।

हम उनके निस्वार्थ सेवा के लिए उन्हें सलाम करते हैं और आशा करते हैं कि अधिक से अधिक लोग इस नेक काम में मदद के लिए आगे बढ़ेंगे।

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