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एक सिक्योरिटी गार्ड से शुरुआत कर एक अवार्ड विनिंग फिल्म बनाने तक का असाधारण सफर

हम सब के अपने-अपने सपने और अरमान होते हैं, पर कुछ लोग भाग्यशाली होते हैं जिन्हें सब कुछ बिना संघर्ष के प्राप्त हो जाता है और कुछ लोगों को इसे प्राप्त करने के लिए अपना खून-पसीना तक बहाना पड़ता है। बड़े सपने देखना आसान होता है परन्तु सपनों के लिए कठिन परिश्रम करना और किसी भी परिस्थिति में हार न मानना बेहद महत्वपूर्ण है।

ऐसी ही कहानी ऐरे गौड़ा की है जिन्होंने अपने सपनों का पीछा करना कभी नहीं छोड़ा और उसे हकीकत में ढालने के लिए हर सम्भव कोशिश की। स्कूल छोड़ने और एक सिक्योरिटी गार्ड बनने से लेकर अवार्ड विनिंग फिल्म बनाने तक का ऐरे का असाधारण सफर प्रशंसा के योग्य है।

ऐरे गौड़ा का का जन्म 1982 में कर्नाटक के मांड्या के एक गांव नोडेकोप्पालु में हुआ। बड़े ही कठिन दौर से इनका बचपन बीता। आर्थिक रूप से अपने परिवार की मदद करने के लिए इन्हें बहुत से छोटे -मोटे काम करने पड़े। 15 साल की उम्र में इन्हें सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी मिली जिसमें उन्हें महीने के 850 रुपये मिलते थे।

जब उन्हें दो वक्त की रोटी नसीब होने लगी तभी एक त्रासदी ने उन्हें तोड़ कर रख दिया। 1998 में उनकी माता को कैंसर हो गया। परिस्थितियां ऐसी थी कि उन्हें दसवीं के बाद अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी और अपनी माँ की देखभाल के लिए ऐरे, एक बेहतर नौकरी की तलाश में लग गये।

दो साल बाद वे बेंगलुरु चले गए और वहां फिल्म प्रोड्यूसर प्रताप रेड्डी के ऑफिस में एक सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करने लगे। पहली बार उन्होंने फिल्म की शूटिंग वहीँ देखी थी। ऐरे को फिल्म निर्माण की कला बेहद रोमांचित करती थी और उनका सपना था कि एक दिन वे भी फिल्में बनायेंगे। ऐरे अपने सपने के बारे में अपने दोस्तों को बताते, पर जवाब में सिवाय मज़ाक के उन्हें कुछ नहीं मिलता था।

एक दिन ऐरे को एक दोस्त राम मिल गया जो प्रताप रेड्डी का बेटा था। ऐरे को अंग्रेजी समझने में कठिनाई होती थी और राम कन्नड़ सही तरीके से बोल नहीं पाते थे। परन्तु फिर भी उनकी दोस्ती की नींव के बीच यह भाषा का बंधन आड़े नहीं आया।

इस दौरान ऐरे के माँ की हालत बेहद ख़राब हो गई थी और ऐरे ने वापस गांव जाने का मन बना लिया। उसी समय राम की माँ ने उन्हें अच्छी तनख्वाह में अपने ऑफिस में असिस्टेंट की नौकरी की पेशकश की। चीज़ें आसान होने लगी और ऐरे अपनी माँ को बेंगलुरु ले आया। लेकिन कुछ समय बाद उनकी माँ ने इस मनहूस बीमारी के आगे घुटने टेक दिए।

साल भर फिल्ममेकिंग सीखने के बाद ऐरे और राम ने मिलकर एक मूवी बनाई जिसका टाइटल आइका था। हैरानी की बात थी कि उनकी मूवी को 22 वें अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में स्क्रीन किया गया और उनके हिस्से ढेर सारे अवार्ड भी आये। यह सम्मान उनके लिए एक बड़ी प्रेरणा बन गया और फीचर फिल्म में एक मौका लेने का दोनों ने निश्चय किया। ऐरे ने एक फिल्म की अवधारणा की जिसका आधार गांव में बीता उनका अपना बचपन था। उन्होंने फिल्म की पूरी स्क्रिप्ट लिखी, कास्टिंग, यूनिट डायरेक्शन और आर्ट डायरेक्शन का काम भी किया।

ऐरे ने सभी डिपार्टमेंट की बागडोर संभाली और राम ने मूवी डायरेक्ट की। छह महीने के बाद तिथि नामक मूवी बनाई। बहुत सारे फिल्म फेस्टिवल में इसकी स्क्रीनिंग हुई। 2015 में तिथि को लोकार्नो फिल्म फेस्टिवल से अवार्ड मिला। उसी वर्ष इस मूवी को बेस्ट फीचर फिल्म इन कन्नड़ के लिए राष्ट्रीय फिल्म  पुरस्कार भी मिला।

एक सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी से लेकर फिल्म मेकिंग के अपने सपने को साकार करना सचमुच असाधारण बात है। ऐरे गौड़ा ने दिखा दिया कि जिन व्यक्तियों को जीवन में कुछ हासिल करना होता है उन्हें जीवन में बड़े सपने ज़रूर  देखना चाहिए। वे एक मिसाल हैं उन लोगों के लिए जो किसी भी कठिन परिस्थितियों में हार नहीं मानते और अपने लक्ष्य को पाने की हर सम्भव कोशिश करते हैं।

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