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बिचौलियों से छुटकारा पाने के लिए गाँव की अनपढ़ महिलाओं ने बना डाली करोड़ों का टर्नओवर वाली कंपनी

आवश्यकता अविष्कार की जननी होती है। और सबसे आधारभूत आवश्यकता है रोटी, कपड़ा और मकान। जब इन अावश्यकताओं को भी पूरा कर पाना कठिन होता है तो उसे पूरा करने के लिए नये खोज और राह की तलाश होती है जिसके लिए कोई सीमा बाधा नहीं रह जाती है। तेलंगाना का हसनाबाद एक सूखाग्रस्त गाँव है। जहाँ लोग बेहाली और बदहाली का जीवन जीने को मजबूर हैं। यहाँ खेती बहुत मुश्किल से होती है और जो पैदावार होती है उसका बड़ा हिस्सा बिचौलिए खा जाते हैं। अपनी जरुरतों को पूरा कर पाने के लिए उन्हें मजदूरी करनी पड़ती है। मगर अब वहाँ के जीवन स्तर में सुधार आने लगा है। लोग खुशहाल हैं।

हसनाबाद गाँव में इस परिवर्तन लाने का सारा श्रेय गाँव की दो महिला नगम्मा और लक्ष्मी को जाता है। इन दोनो के प्रयास से अब अनाज की सीधी बिक्री होने लगी। बिचौलियों का कोई स्थान नहीं रहा। कम्पनी की सफलता को देखते हुए पिछले कुछ ही सालों में 800 महिलाएँ जुड़ी हैं। इन महिलाओं की मासिक आय में औसतन 8,000 रुपये की बढ़ोतरी हुई है। हसनाबाद फार्मर्स सर्विसेज प्रड्यूसर कंपनी में वह पैकेजिंग से लेकर मार्केटिंग तक खुद करती हैं। खेती के लिए जरुरी जैसे बीज, किटनाशक, खाद, और दूसरी दवाओं का भी कंपनी ने डिलरशीप लेकर बिचौलियों को दरकिनार कर कम लागत पर खेती हो रही है।

2013 में 63 वर्षिय नगम्मा और 35 वर्षिय लक्ष्मी ने कंपनी की शुरुआत की। पिछले तीन सालों में कंपनी का सालाना टर्नओवर 2 करोड़ का है। लक्ष्मी और नगम्मा को एक दूसरे पर विश्वास था। दोनो ने साथ काम करना शुरु किया और अपने जैसी महिलाओं को जोड़ने का प्रयास करने लगी। 15 किलोमीटर तक के अलग-अलग गाँव से 15-15 महिलाओं को जोड़ा। कंपनी के पंजीकरण करवाने तक इनके साथ 60 महिलाएँ जुड़ चुकी थी। पहले साल में दाल को खरीदने बेचने का काम हुआ। जिसमें न सिर्फ संगठन से जुड़े सदस्यों बल्कि अन्य किसानों से भी दलहन खरीद कर बेचा। पहले साल ही टर्नओवर 4 करोड़ का हुआ। आज कंपनी की डाईरेक्टर नगम्मा और लक्ष्मी के साथ 800 महिलाएँ जुड़ कर काम करतीं हैं। आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि 15 संस्थापक सदस्य महिलाओं में से सिर्फ तीन 10वीं पास है और सभी अनपढ़ हैं।

गौरतलब है कि पति की मृत्यु के बाद नगम्मा के लिए गृहस्थी चलाना बहुत ही कठिन हो गया था। किसी तरह 20 साल तक सूखे और बिचौलियों से जुझते हुए उन्होंने खेती कर गुजारा किया। एक तो फसल ठीक से तैयार नहीं हो पाती और सही मूल्य नहीं मिल पाने की वजह से आर्थिक चुनौतियों से जूझना होता था। खाने-पीने, कपड़े, बच्चों की पढाई-लिखाई और खेती के लिए बीज खाद खरीदने तक में बेहद मुश्किलों का सामना करना पड़ता। गाँव की दूसरी महिला लक्ष्मी दूध बेचने का काम किया करती थी। पति की मजदूरी से घर चला पाना संभव नहीं हो पा रहा था। 2012 में उन्हें एक सामाजिक संगठन ने आर्थिक स्थिति मजबूत करने के लिए कंपनी खोलने की सलाह दी। यह बात नगम्मा के मन में बस गई। उन्होंने लक्ष्मी से इस बारे में बात कर कंपनी खोलने का निश्चय कर लिया।

लक्ष्मी के इस फैसले का उनके पति ने काफी विरोध किया। लेकिन दोनो महिलाओं ने तमाम चुनौतियों का डटकर मुकाबला करते हुए अपने बढ़ते कदम को नहीं रोका। शुरुआती दिनों में जब वो महिलाओं से कंपनी में 100 रुपये देकर हिस्सेदारी बनने की बात कहतीं तो उन्हे चिटफंड कंपनी समझ कर लोग पीछे हट जाते थे। कई कठिनाईयों का सामना करने के बाद भी कंपनी ने प्रोडक्शन और बिक्री का काम शुरु किया। हसनाबाद फार्मर्स प्रोड्यूसर कंपनी में पैकेजिंग से लेकर मार्केंटिंग तक की कमान संगठन से जुड़ी महिलाओं के कंधे ही है। विभिन्न कृषि से जुड़े संसाधनों की भी खरीद-बिक्री सीधे कंपनियों से करके बिचौलियों की दुकान बंद कर दी।

जिन खोजा तिन पाइयां गहरी पानी पैठि। मैं बापुरा बुडन डरा रहा किनारे बैठि॥

कबीर दास का यह दोहा बिल्कुल सत्यार्थ है नगम्मा और लक्ष्मी जैसी महिलाओं के लिए। संघर्ष करने से ही रास्ते निकलते हैं और किस्मत की मंजिल मिलती है। अपनी परिस्थितियों से हार न मानने वाली इन महिलाओं ने न सिर्फ अपने जीवन को सजाया सँवारा बल्कि अपने गाँव की परिस्थिति को भी बदल दिया। अब न यहाँ बदहाली है न सूखा और न ही कोई सोता है भूखा। कम पढ़ी लिखी और अनपढ़ महिलाओं का यह प्रयास आज के शिक्षित और संघर्ष से हार मान जाने वालों के लिए एक प्रेरणा है। यह सच है कि सच्चे लगन से ही अवसर प्राप्त होते हैं और सफलता प्राप्त करने के लिए हमें कभी परिस्थिति के आगे आत्म समर्पण नहीं करना चाहिए।

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