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यह ऑटो ड्राइवर किसी शख्सियत से कम नहीं हैं, इनकी खूबियों को जानकर आप भी बन जायेंगे फैन

कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें उन छोटी-छोटी चीजों के लिए शिकायत होती है जो उनके पास नहीं होतीं; वहीं कुछ ऐसे होते हैं जिन्हें लगता है कि उनके पास सिर्फ सही दिशा वाला एक सपना बस नहीं है। पर वास्तव में अधिकतर लोगों के पास अवसर भी होते हैं और क्षमताएं भी होती हैं; समस्या सिर्फ यह होती है उनके पास किसी काम को करने के लिए एक उसूलों वाला रवैया नहीं होता।

बेंगलुरु के एक 52 वर्षीय ऑटो ड्राइवर जीसी शिवकुमार ने अपने यात्रा की शुरूआत एक प्रेरणादायक फ़िल्म के आधार पर की। एक ऑटो-ड्राइवर, एक रेडियो जॉकी, एक कवि और एक लोकहितैषी शिवकुमार के मुकुट में कई रत्न जड़े हैं। आज वे जहाँ हैं उसके लिए, उनकी स्वयं को तलाशते रहने और तराशते रहने की कभी न खत्म होने वाली इच्छाओं को ही सारा श्रेय जाता है।

शिवकुमार का जन्म कर्नाटक के दसराहल्ली में 18 सदस्यों वाले एक सयुंक्त परिवार में हुआ था। उन्हें लोग ऑटो शिवू के नाम से जानते हैं। उन्होंने अपने जीवन में बड़े-बड़े सपने देखे थे। पैसों की कमी की वजह से उनकी पढ़ाई का सपना केवल नवीं कक्षा तक की पढ़ाई तक सीमित रह गया। अपने घर की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए उन्होंने कई छोटे-मोटे काम करने शुरू कर दिए।

आख़िर में शंकर नाग की मशहूर फिल्म ऑटो राजा देखकर वे 1993 में एक ऑटो ड्राइवर बन गए। उसके बाद उन्होंने अपना काम पूरी निष्ठा से किया। वे ग्राहकों को ऑटो की सवारी के दौरान एक बिल्कुल अलग अनुभव परोसा करते थे।

पहली नजर में देखने पर उनका ऑटो-रिक्शा किसी दूसरे आम भारतीय ऑटो-रिक्शा की तरह ही लगता था। अपनी ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए उन्होंने ऑटो को चमकीले रंगों और तरह-तरह की चीज़ों से सजाया हुआ था। पर जब आप एक बार उनके ऑटो से घूमते हैं तब आप महसूस करेंगे कि ऑटो में बहुत सारी अलग-अलग तरह की विशेषताएं हैं।

ऑटो में एक फर्स्ट-ऐड किट, एक भरा-पूरा पुस्तकालय, प्रख्यात लेखकों और बड़े-बड़े व्यक्तित्व के अनमोल वचन और फोटो होते हैं। इसके अलावा वरिष्ठ नागरिकों, विद्यार्थियों, भूतपूर्व सैनिकों के परिवार के लिए विशेष छूट दी जाती थी और कभी भी, किसी भी परिस्थितियों में अतिरिक्त पैसे नहीं लेते।

शिवकुमार 25 सालों से यह काम कर रहे हैं और उन्हें उनके काम के लिए 31 अवार्ड्स मिल चुके हैं। अधिकतर अवार्ड बेंगलुरू सिटी पुलिस ने उनकी ईमानदारी और प्रभावशाली व्यवहार और ग्राहकों के बहुमूल्य सामान वापस करने की वजह से दिए हैं। उनका सबसे यादगार अनुभव एक ऑटो ड्राइवर के रूप में तब था, जब एक बार उन्होंने एक एक्सीडेंट के शिकार का जीवन बचाया और जब एक महिला ने उनकी गाड़ी में अपने बच्चे को जन्म दिया।

शिवकुमार बताते हैं, “मेरे यात्रियों ने मुझे प्रसिद्ध बनाया है। लोगों के व्यवहार की वजह से मैं कभी-कभी अपने आपको आमिर खान और सलमान खान महसूस करता हूँ। लोग मेरे ऑटो और मेरे साथ सेल्फी भी लेते हैं।”

हर दिन ऑटो चलाने के अलावा वे सप्ताह में दो दिन रेडियो जॉकी का काम करते हैं और रेडियो एक्टिव शो की मेज़बानी करते हैं। इसके अलावा भी और बहुत कुछ है उनके लिए बताने को। भले ही वे नवीं के बाद पढ़ाई नहीं कर पाए, उन्होंने कभी भी हार नहीं मानी। अपने लिखने के जुनून से आज तक वे लगभग 1500 कवितायें लिख चुके हैं।

गरीब परिवार से होने की वजह से शिवकुमार ज़रूरतमंद विद्यार्थियों की आर्थिक सहायता के महत्त्व को भली-भांति जानते हैं। गरीबों और होनहार विद्यार्थियों की मदद के लिए उन्होंने गुरुकुल सेवा ट्रस्ट की शुरूआत की है। उनका ट्रस्ट निराश्रित बच्चों को लगभग एक लाख रूपये तक की पुस्तकें, यूनिफार्म उपलब्ध कराता है।

उन्होंने अपनी क्षमताओं को और बढ़ाते हुए स्लम के बच्चों के ऊपर एक टेलीफिल्म बनाना और एक कन्नड़ फिल्म डायरेक्ट करना चाहते हैं। उनके सम्मान में बहुत से संस्थान (उनके जन्मदिवस पर) 9 नवंबर को ऑटो रिक्शा दिवस मनाते हैं।

शिवकुमार ने यह दिखा दिया है कि कोई भी उपलब्धि हासिल करना असंभव नहीं है। वे देश के अन्य ऑटो ड्राइवर की तरह ही हैं। परन्तु उनके द्वारा अपनी क्षमताओं को तराशने के लिए किये गए लगातार प्रयासों और बिना डरे अपनी इच्छाओं को व्यक्त करने की वजह से वे आज सबके प्रशंसा के पात्र बने हैं।

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