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चार बच्चों ने अपनी पॉकेट मनी से बचाए डेढ़ लाख रुपये से शहर के सरकारी स्कूल की बदली दुर्दशा

आए दिन समाचारों में निरंतर बढ़ रहे अपराधों की ख़बरें पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है कि आधुनिक समाज मानवीयता और संवेदनशीलता से दूर होता जा रहा है। ऐसे में यह खबर कि बेंगलुरु के चार बच्चों ने अपनी पॉकेट मनी से सरकारी स्कूल की बिल्डिंग को रिपेयर करवाया सबका ध्यान अपनी ओर खींचता है। साथ ही संवेदनहीन होते समाज के लिए एक समाधान भी प्रस्तुत करता है कि बचपन से नैतिकता मानवीयता एवं संवेदनशीलता के संस्कार यदि भावी पीढ़ी में रोपित किए जाएं तो समाज में बदलाव अवश्य आ सकता है। बेंगलुरु के इन चार बच्चों की आपबीती बच्चों से लेकर बड़ों तक सभी को प्रेरणा देने वाली है।

निधि रेड्डी के घर में काम करने वाली बाई ने एक दिन उनके घर पर बताया कि उनका बेटा जिस सरकारी स्कूल में पढ़ता है उसकी जर्जर हालातों की वजह से वह बंद होने की कगार पर आ गया है। यह सुनकर निधि के मन में करुणा और दया के भाव उत्पन्न हुए और उसने उसी पल इस समस्या के समाधान के बारे में सोचना भी शुरू कर दिया। वह स्वयं 12वीं कक्षा की छात्रा हैं ऐसे में उनके लिए आर्थिक सहायता करना संभव नहीं था लेकिन उसने अपने भाई-बहन दीक्षा रेड्डी जो चौथी कक्षा की छात्रा हैं, ध्रुव रेड्डी जो आठवीं कक्षा के छात्र और नेहा रेड्डी जो एसएसएलसी की छात्रा हैं, को इस बारे में बताया। इन चारों भाई-बहनों ने मिलकर अपनी पॉकेट मनी से बचाए पैसों से सरकारी स्कूल की मरम्मत करवाने का निर्णय लिया। चारों ने मिलाकर डेढ़ लाख रुपए स्कूल की प्रिंसिपल से मिलकर उन्हें स्कूल की मरम्मत के लिए दिए। गुप्त दान की महिमा को इस प्रकार से शास्त्रों में वर्णित किया गया है कि दाया हाथ भी यदि दान करे तो बाएं हाथ को भी पता ना चले। इन चारों बच्चों ने भी डेढ़ लाख रुपए का यह गुप्तदान अपने माता-पिता को बिना बताए किया। स्कूल टीचर्स ने इन बच्चों के माता-पिता को जब उनके बच्चों के इस अद्भुत कार्य के बारे में बताया तो माता-पिता भी गर्व से फूले नहीं समाए।

आज इस सरकारी स्कूल की दीवार पेंट हो गई है, बच्चों के बैठने के बेंच रिपेयर करवा दिए गए हैं और शौचालय के साथ-साथ स्कूल की बिल्डिंग भी रिपेयर करवाई गई है। अब स्कूल में बच्चों के पढ़ाई सुचारु रुप से चल रही है।

प्राचीन इतिहास इस बात का गवाह है कि बड़े-बड़े शूरवीर, दानी, महापुरूष अपने बड़ों से प्रेरणादायक कहानियां सुनकर अपने अंदर के छिपे गुणों को अपनी प्रतिभा में समाहित कर पाए। आज समाज में खो रहा सद्भाव-भाईचारा-प्रेम यदि बनाए रखना है तो भावी पीढ़ी को ऐसी सच्‍ची कहानियों से जोड़ना ही होगा। निधि और उसके भाई-बहनों की यह कहानी प्राइमरी और सेकेंड्री स्कूल के बच्चों के पाठ्यक्रम में भी शामिल होनी चाहिए जिसे पढ़कर अन्य बच्चों के मन में भी समाज के लिए कुछ करने की भावना जागृत हो।

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