,

जंगल बचाने के लिए जान तक की बाज़ी लगा दी, मंत्रियों से लेकर माफियाओं तक को टेकने पड़े घुटने

असली योद्धा वे ही नहीं होते जो अपने हाथों और हथियारों से लड़ते हैं बल्कि वे हैं जो अपनी मानसिक ताकत और आत्मविश्वास से लड़ते हैं। वे अपने समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने के लिए संग्राम की शुरुआत करते हैं और उसे परिणाम तक पहुँचाने में जी तोड़ संघर्ष करते हैं।

झारखंड के पूर्वी सिंहभूम का एक छोटा सा गाँव मुतुरखम स्थानीय माफियाओं के साए तले एक दहशतगर्द और खामोशी के दिन काट रहा था। अपने लिए परिवर्तन की राह देख रहा था। ऐसे में जमुना टुडू नाम की एक महिला ने न सिर्फ उन माफियाओं के खिलाफ डट कर खड़ी हुई बल्कि उन्होंने प्रकृति के संरक्षण के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य भी किए। उनका यह प्रयास लगातार जारी है।

प्रकृति पूजन की परंपरा

1998 में, विवाहोपरांत जब जमुना उड़ीसा के एक गाँव से मुतुरखम आईं तो उसी वक्त उन्होंने इस मुहिम का आगाज़ किया। जैसा उन्होंने देखा था उससे यह गाँव पूरी तरह से भिन्न नजर आ रहा था। जंगलों में पेड़ों के ठूंठ देख कर वे अचंभित रह गईं। यह उनके लिए बेहद दर्दनाक था क्योंकि वे एक ऐसी पृष्ठभूमि से हैं जो प्रकृति की पूजा करती हैं।

जमुना को यह जानकर बेहद झटका लगा कि इन पेड़ों की अवैध रुप से कटाई कर स्थानीय माफ़िया अपनी नशाखोरी और शराबबाजी की खातिर बेच देते हैं। हालांकि सिर्फ 10वीं पास जमुना वनों की कटाई के नकारात्मक पहलूओं को बहुत अच्छे से समझती थी। वह समझ चुकी थी कि इस प्रकार यह काम पूरे गाँव के अस्तित्व को खतरे में डाल देगा।

उन्होंने स्थानीय लोगों से बात की मगर वे लोग माफियाओं का सामना करने से डरते थे। किसी में उनके खिलाफ आवाज़ उठाने की हिम्मत नहीं थी। मगर जमुना उनमें से नहीं थी जो गुंडों से खौफ़ खाती और उनके आगे झुक जाती।

माफियाओं से लिया लोहा

जमुना ने स्थानीय महिलाओं से बात करनी शुरु की और उन्हें उन आपदाओं के बारे में चेतावनी दी जिनका उन्हें सामना करना पड़ सकता है यदि वे अपने विरासत की रक्षा न कर सकें। उन्होंने उन सांस्कृतिक नियमों और जनजातीय रीति-रिवाज़ों की व्याख्या की जिसमें पेड़ों को काटना एक पाप करने जैसा है। अपने अटल अविचल दृढ़ता के साथ जमुना अथक रुप से ग्रामीणों में प्रोत्साहन भरती रहीं और जल्द ही उन्होंने 25 महिलाओं का एक समूह तैयार कर लिया।

इस समूह का नाम वन सुरक्षा समिति रखा गया, जिसे तीर-धनुष, भालों, बाँस के डंडों से सुसज्जित किया गया। जिससे वे जंगल के बदमाशों को काबू कर सकें। जब गाँव के पुरुषों ने महिलाओं में जंगलों की रक्षा का यह साहस देखा तो उन्होंने भी उनका साथ देने का निर्णय किया।

हालांकि जमुना के लिए यह सब करना इतना आसान नहीं थी। उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। 2004 तक उन्होंने 50 समिति का गठन कर लिया। यह माफियाओं को बुरी तरह झुंझला कर रख दिया। माफियाओं ने बदला लेने के भाव से उनके घर पर हमला कर उसे ध्वस्त कर दिया।

भयानक परिणाम

2009 में जब वे अपने पति, मानसिंह से साथ एक रेलवे स्टेशन पर खड़ी थीं तो उन पर नुकीले पत्थरों से हमला हुआ। उनके पति के सिर पर धारदार हथियार से हमला किया गया। जिससे वे वहीं खून में लथपथ होकर गिर पड़े। इसके बावजूद जमुना के शब्दकोश में भय जैसा कोई शब्द नहीं था। उन्होंने उनमें से पाँच बदमाशों को जेल भिजवा कर माफियाओं को एक चेतावनी दे डाली।

“शुरुआत में मैं भयभीत हो गई थी मगर फिर मैंने सोचा यदि हम डरते रहे तो जंगल को और इस उद्योग में फैले भ्रष्टाचार को नहीं रोक पाएँगें। आज न तो मंत्री लोग और न ही नक्सली मुझे डरा सकते हैं”।

आज वन सुरक्षा समिति में 10,000 से अधिक वन रक्षक 300 समितियों में कई गाँवों में कार्य कर रहे हैं। उनकी गश्ती दल सुबह, दोपहर और रातों में निकलती है। 125 एकड़ में आच्छादित वन क्षेत्रों में पेड़ों की सुरक्षा और वृक्षारोपण करती है। इन सब से बढ़ कर उन्होंने ग्रामीणों और पेड़ों के बीच संबंध को और मजबूती देने के लिए कई उत्सवों जैसे रक्षा बंधन और भाई दूज पेड़ों के साथ आयोजित करती हैं। पूर्वी झारखंड के लोग उन्हें बहुत सम्मान देते हैं और उन्हें ‘जंगल क्विन’ और ‘लेडी टार्जन’ कहते हैं।

“मेरे बच्चे नहीं हैं परंतु मैं इन्हें अपने भाई के समान मानती हूँ। प्रत्येक रक्षा बंधन पर मैं इन्हें एक राखी बांधती हूँ और ‘हम लोग इनकी सुरक्षा करते रहेंगे’ ऐसी शपथ लेती हूँ” ,जमुना ने बताया।

वह मानती हैं कि जंगल में संसाधनों की बहुत बड़ी मात्रा है जो दैनिक आवश्यकताओं के लिए ईंधन प्रदान कर सकता है। यदि न्यायपूर्ण तरीके से उपयेग किया जाए तो पेड़ों से स्वंय गिरने वाली टहनियां ग्राम निवासियों की आवश्यकता पूरी करने के लिए काफी है। वन सुरक्षा समिति से प्रभावित हो कर वन विभाग ने मुतुरखम गाँव को संरक्षण में ले लिया है।

आगे के परिणामों में विद्यालयों का निर्माण किया जा रहा है और जल की आपूर्ति के लिए मार्ग प्रशस्त किए जा रहे हैं। युवा पीढ़ी को प्रोत्साहित करने के लिए किसी लड़की के जन्म पर वह 18 पेड़ लगाती हैं और उनके विवाह होने पर 10 पौधों का रोपण करती है। जमुना के प्रयासों को नजरअंदाज नहीं किया गया और 2013 में उन्हें ‘एक्ट आॅफ सोशल करेज’ के लिए गोल्डफ्रे फिलिप्स पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

2015 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी द्वारा उन्हें राष्ट्रपति भवन में आमंत्रित किया गया। जमुना को द वुमन ट्रांसफॉर्मिंग इण्डिया अवार्ड से भी पुरस्कृत किया गया। नीति आयोग की ओर से सम्पूर्ण भारत में महिलाओं के महत्वपूर्ण योगदान के उत्सव में यह किया। जमुना जैसी महिला ने यह साबित किया है कि यदि आप में साहस हो तो कुछ भी असंभव नहीं।

माफ़िया का समाज से खात्मा किया जा सकता है यदि लोग एक साथ इकट्ठा हों और उनके विरुद्ध खड़े होने का साहस करें तो।

आप अपनी प्रतिक्रिया नीचे कमेंट बॉक्स में दे सकते हैं और इस पोस्ट को शेयर अवश्य करें 

आपका कमेंट लिखें