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9वीं पास इस व्यक्ति के शानदार आइडिया ने सूखाग्रस्त गाँव को हरियाली से भर दिया

गुलाबी शहर जयपुर की गोद में बसा एक छोटा सा गाँव लापोड़िया। एक बार यहाँ सूखे का हमला हुआ मगर अब यह गाँव सूखे से दूर और गरीबी से मुक्त है। इसके लिए धन्यवाद के पात्र हैं लक्ष्मण सिंह, जिनके वर्षा जल संचयन के देशी तरीके ने 3.5 लाख से अधिक लोगों को लाभ पहुँचाया है।

1969 में लापोड़िया में ही 5वीं कक्षा तक पढ़ाई करने के बाद अपनी आगे की पढ़ाई करने लक्ष्मण जयपुर चले आए। “वह गाँव का बहुत बुरा दौर था, सभी कुएँ सूख गये थे और वहाँ अकाल की स्थिति थी”, उन्होंने केनफ़ोलिओज़ से साक्षात्कार में दौरान बताया।

लोग पानी के लिए झगड़ा करते क्योंकि गाँव का एक मात्र तालाब भी सूख चुका था। 200 परिवारों का मुख्य पेशा खेती ही था और सभी कृषि कार्य ठप पड़े थे। लक्ष्मण के पिता उनके आगे की पढ़ाई का खर्च नहीं वहन कर पा रहे थे अतः उन्हें 10वीं की पढ़ाई बीच में ही छोड़ कर अपने गाँव वापस लौटना पड़ा।

अपनी पढ़ाई जारी रखने के लिए वे आस-पास के पुस्तकालयों से किताब ले कर पढ़ते। वे अपने गाँव में फैले अकाल की विभीषिका को दूर करने के लिए तरह-तरह के उपायों का पता करते रहते। “सहायता के लिए हम लोग सरकारी अधिकारियों के पास तक गये मगर वे कोई पर्याप्त जवाब नहीं दिए”, उन्होंने बताया।

लक्ष्मण अब 18 साल के हो गए थे। उन्होंने महसूस किया कि लापोड़िया के अभाग्य को दूर करने का एकमात्र उपाय है सूखे तालाबों के बुंड (मिट्टी के मुँडेर) को दुरुस्त किया जाए। जो पिछले 30 वर्षों से टूटे पड़े थे। उन्हें उनके दोस्तों का साथ मिला और 1977 में कठिनाइयों से मुक्ति के लिए ‘ग्राम विकास नवयुवक मंडल, लापोड़िया’ (GVNML) का निर्माण हुआ।

“हमलोगों ने तालाब निर्माण, वृक्षारोपण, अधिक फसल उपजाने और रात्रि विद्यालय चलाने का निर्णय लिया” ,लक्ष्मण ने बताया। उन्होंने एक देशी वर्षा जल संचयन तकनीक “चौका पद्धति” को विकसित किया। चौका एक आयताकार बंदीकरण संरचना है जो तीन ओर से मिट्टी के मेंढ़़ो से घिरी होती है। ये मिट्टी छोटे खेतों को बनाते वक्त निकाली गई होती है। उन्होंने गाँव की मिट्टी को उच्चावच किया और कुएँ, तलाबों को भी घेरा। जमा किए हुए पानी ने भूमिगत जल स्रोतों की भरपाई करनी शुरु की और धीरे-धीरे तालाब और कुएँ भरने लगे।

‘लापोड़िया “हरा भरा” बन सकता है’ ग्रामीणों ने उनकी इस कल्पना का मज़ाक उड़ाया। और बुंड की मरम्मत के लिए हमारी मजदूरी का भुगतान कौन करेगा?” उनके व्यंग्य भरे इस मांग का लक्ष्मण सिंह के पास कोई जवाब नहीं था। वे गुहार लगाते थक गये थे। मजदूरी में छूट देने के लिए कोई अमीर जमींदार तैयार नहीं थे, उन्हें पैसे दान स्वरुप देने के लिए कोई परोपकारी नहीं थे और सरकार बहुत दूर और बेपरवाह थी। वह पूरी तरह निराश थे इस दुष्शचक्र से बाहर निकलने के लिए कोई रास्ता नहीं लग रहा था।

फिर एक दिन उन्हें लगा कि शायद एक रास्ता है: गांववाले बांध की मरम्मत के लिए स्वयंसेवक बने क्योंकि अंततः वे ही लाभार्थी रहेंगे। पड़ोसजनों ने उनके सुझाव पर मजाक उड़ाया। उन सब का कहना था कि उनके पास और भी बेहतर काम करने के लिए है। अंत में सिंह ने खुद ही ऐसा करने का संकल्प लिया। एक दोस्त ने उनका साथ दिया। दोनों ने मिलकर खुद ही बांध की मरम्मत का फैसला किया। यह कोई छोटा काम नहीं था: बांध 1.5 किमी लंबी और 15 फीट ऊंची थी। कुदाल फावडों से सशस्त्र, वे 1978 की गर्मी के दिनों वे बुंड बनाने में जुट गए। आने-जाने वाले आश्चर्य होते, “कैसे बस दो लोग बुंड की मरम्मत कर सकते हैं? वे जवाब देते, “ठीक है, आप हमारे साथ जुड़ सकते हैं, इससे मदद हो जाएगी।” गाँव के चार और युवक उनके साथ जुड़े। सातवें दिन तक, मदद करने वालों का आंकड़ा 20 तक पहुँच गया । जब दो महीने बाद बारिश हुई, तालाब में दशकों में पहली बार पानी जमा हुआ।

अपने दल की मदद से लक्ष्मण का काम और विकसित होने लगा। उन्होंने 558 गाँवों में चौका पद्धति की पहल की। उन लोगों ने सैकड़ों पेड़ लगाए और पंक्षियों, पशुओं, छोटे जीव जन्तुओं और अन्य सजीव वर्गों के लिए ‘प्रकृतिक आवास’ का निर्माण किया जहाँ वे जीवित रहें और विकास करें।

इन सब के बावजूद लक्ष्मण को हर कदम पर चुनौतियों का सामना करना पड़ा। जब लोंगो ने पेड़ काटने शुरु कर दिए तो GVNML ने नियम बनाया कि एक प्रति एक पेड़ काटने के एवज में उन्हें दो पेड़ लगाने होगें। ऐसे में ग्रामीण इसकी शिकायत ले कर पुलिस तक पहुँच गए। उनके खिलाफ वारंट तक जारी हुई, जिसमें पूछा गया, “आप कौन सी धारा के तहत ऐसा काम कर रहे हो।” उनसे काम बंद कर देने के लिए कहा गया। “मैंने कहा कि मैं अपने गाँव के लिए काम करता रहूँगा। यदि आप सजा देना चाहते हैं तो बिल्कुल दें”, लक्ष्मण ने बताया।

बहुत ही जल्द उनका काम उनके लिए बोलने लगा और उन्होंने अनेकों लोगों का सहयोग पाया। अब गाँव के लोग भी उनके साथ सहकारिता निभाने लगे और 1984 तक सभी तालाब और कुएँ पुनर्जीवित हो उठे और 1800 एकड़ कृषि भूमि सिंचित किया जाने लगा। साल में दो फसलें काटी जाने लगी और लापोड़िया आत्मनिर्भर बन गया। ग्रामीणों ने दुग्ध उत्पादन शुरु किया और आज वे एक गाँव से 24000 लीटर दूध प्राप्त करते हैं।

GVNML में आज लगभग 80,000 सदस्य हैं और 45 कर्मचारी। इनके चार कार्यालय मुख्य रुप से राजस्थान में जयपुर और टोंक जिले में है।

लक्ष्मण कहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने आस पास कम से कम एक पेड़ लगाना ही चाहिए। “अगर हमने ये नहीं समझा तो मनुष्य को ज़रुर खतरा होगा”, अंततः उन्होंने कहा।

एक कामचलाऊ, सूखे का दर्द और समस्याओं से ग्रसित गाँव लापोड़िया, मात्र एक व्यक्ति के कदम बढ़ाने से, आज नवीनीकरण का एक प्रतीक बन गया है। यह खेती के नख़लिस्तान के रुप में उभरा है। लक्ष्मण सिंह ने अपनी मेहनत और दृढ़ संकल्प से न सिर्फ अपने गाँव का बल्कि राजस्थान के कई गाँवों का भविष्य बदल दिया है।

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