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16 वर्षीय कश्मीरी बच्ची जो उन सैकड़ों लोगों की आवाज़ बनकर उभरी जिनकी खुद की कोई आवाज़ नहीं है

नोबल पुरस्कार के इतिहास में सबसे कम उम्र में यह पुरस्कार पाने वाली मलाला युसुफ़ज़ई ने अपने एक भाषण में कहा था, “जब आपके आस-पास की पूरी दुनिया खामोश हो तो आपकी एक आवाज़ भी सबसे ताक़तवर साबित हो सकती है प्रसिद्ध गीतकार गुलजार ने भी लिखा है, “मेरी आवाज़ ही मेरी पहचान है वास्तव में, एक आवाज़ में पूरी दुनिया की किस्मत बदल देने का माद्दा होता है, यह हमारी आवाज़ ही तो है जिसके बल पर हम समाज में अपनी एक अलग पहचान छोड़ पाते हैं।

पर उनका क्या जिन्हें प्रकृति ने वह आवाज़ ही नहीं सौंपी है? आवाज़, जिसके जरिये वो इस दुनिया को खुद के होने का एहसास दिलवा सकें? जीवन में हम जाने कितने ऐसे लोगों से रूबरू होते हैं जो बोल या सुन नहीं सकते। हम अक्सर उनपर बस तरस खाकर रह जाते हैं, लेकिन उनकी मदद करने के लिए बहुत कम ही लोग आगे आते हैं। हालाँकि दुनिया में ऐसे लोग भी मौजूद हैं जो संवेदनशील होने के साथ साथ समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को भी समझते हैं। वो ने केवल दुनिया को रहने के लिए एक बेहतर स्थान बनाने में विश्वास रखते हैं बल्कि उन लोगों की मदद करने को आगे भी आते हैं जो दुनिया से अलग हैं। आज की कहानी ऐसी ही है एक युवती की है, जो अकेले दम पर 300 मूकबधिर खिलाड़ियों के लिए साइन लैंग्वेज इंस्ट्रक्टर के तौर पर काम कर रही हैं। श्रीनगर के नौगाम इलाके में रहने वाली इस युवती का नाम अरवा इम्तियाज़ भट्ट है।

 300 मूकबधिर खिलाड़ियों के लिए बनती हैं सहायक

अरवा इम्तियाज़ भट्ट ही कोई खिलाड़ी हैं, कोई प्रशिक्षक लेकिन वो सभी मूक बधिर खिलाड़ियों की सहायिका के तौर पर जानी जाती हैं। यह उनलोगों की आवाज़ बनकर उभर रही हैं जिनकी खुद की कोई आवाज़ नहीं है। वो इस कार्य के लिए किसी प्रकार के पैसे नहीं लेती और वो इस कार्य को समाज की एक सेवा के रूप में देखती हैं। वो ‘J&K स्पोर्ट्स एसोसिएशन फॉर दी डेफके साथ जुड़े खिलाड़ियों की मदद साइन लैंग्वेज इंस्ट्रक्टर के तौर पर करती हैं, जिसमे वो स्वयं माहिर हैं। मौजूदा समय में 300 खिलाड़ियों की मदद कर रही अरवा बचपन से ही इस भाषा को जानती और समझती हैं। वो अक्सर खुद स्कूल जाकर उन खिलाड़ियों के साथ टूर पर जाती हैं जिससे उन्हें किसी प्रकार की मुश्किलों का सामना करना पड़े। वो बताती हैं की उनको सबसे ज्यादा ख़ुशी तब मिलती है जब उनकी टीम किसी प्रतियोगिता में पदक जीत कर आती है। पिछले साल दिसंबर में उनके द्वारा प्रशिक्षित J&K की टीम ने रांची में हुई प्रतियोगिता में 4 गोल्ड, 3 सिल्वर और 2 ब्रोंज पदक जीते थे।

पिता चलते हैं ऑटो रिक्शा, माँ और भाई भी सुन और बोल नहीं सकते

अरवा की माँ और भाई दोनों सुन एवं बोल नहीं सकते। हालाँकि उनके भाई मोहम्मद सलीम, एक अच्छे बैडमिंटन प्लेयर हैं। वो बताती हैं कि उन्होंने अपने भाई और माँ के जीवन में काफी संघर्ष देखा है और उन्होंने इस बात को बेहद ही कम उम्र में समझ लिया था कि इस दुनिया में बहुत सी असमानताएं व्याप्त हैं। बचपन से ही उन्होंने यह ठान लिया था कि उन्हें उन लोगों की ज़ुबान बनना है जो खुद बोल या सुन नहीं सकते और यह कोशिश करनी है कि ऐसे लोगों को वो यह महसूस होने दें की वो दुनिया में अकेले हैं या वो जीवन में कुछ हासिल नहीं कर सकते। 11 साल की उम्र में साइन लैंग्वेज इंस्ट्रक्टर बनने के बाद वो अपने मामा (जो खुद भी बोल या सुन नहीं सकते हैं) द्वारा चालित मूक बधिरों के लिए काम करने वाली एक संस्था के साथ जुड़ गयी। उनके पिता एक ऑटो चालक हैं और उनके घर की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर है। अरवा का डॉक्टर बनने का सपना है और इसके लिए उनके पिता भी आशान्वित हैं की एक दिन उनकी बेटी डॉक्टर बनकर उनका नाम और भी ज्यादा रोशन करेगी।

माँ, भाई और मामा हैं उनकी प्रेरणा

वो कहती हैं की उन्हें बचपन से ही यह यकीन था की वो दुनिया में लोगों की मदद करने के लिए आयी हैं और वो दूसरों के लिए अपने जीवन को समर्पित करना चाहती हैं। हालाँकि वो खुद को डॉक्टर बनते देखना चाहती हैं लेकिन वो कहती हैं की उनके पिता की आर्थिक स्थिति उतनी मजबूत नहीं जिससे वो डॉक्टरी का कोर्स कर सकें। हालाँकि वो यह जरूर मानती हैं की वो अगर अच्छे कर्म करती जाएँगी तो शायद एक दिन इसी मेहनत से उन्हें उनके ख्वाब को पूरा करने का मौका भी हाथ लग जाये। डॉक्टर बनकर भी वो औरों की मदद में अपने जीवन को सौंप देना चाहती हैं। वो अपनी माँ, भाई और मामा के साथ साथ अपने पिता को भी अपनी प्रेरणा का स्रोत मानती हैं। वो कहती हैं की बचपन से उन्होंने संघर्ष के बीच जीवन यापन किया है और वो इस बात को भलीभांति समझती हैं की मनुष्य के सामने भले कितनी ही कठिनाइयां क्यों जाएँ, उसे उनसे खुद से जूझकर अपने नाम एक बेहतर मुकाम करना होता है। वो मेहनत, लगन, हौसला और हिम्मत को अपने हथियार के रूप में देखती हैं और यह मानती हैं की भले ही सूरज उगने में देर करता है लेकिन वो जब उगता है तो चारों ओर से अंधकार को मिटा देता है।

अरवा इम्तियाज़ भट्ट की जितनी तारीफ की जाए उतनी कम है। J&K स्पोर्ट्स कॉउन्सिल में सेक्रेटरी के पद पर तैनात वहीद उर रहमान पर्रा उनकी तारीफ में कहते हैं की, “मैं इस युवती के जज़्बे को सलाम करता हूँ और मैं हर संभव प्रयास करता हूँ की उसे किसी प्रकार की दिक्कत का सामना करना पड़े। वो हम सबके लिए प्रेरणा का स्रोत हैं

वास्तव में अरवा जैसे लोग इस समाज को जीने के लिए एक बेहतर स्थान बनाने की ओर लगातार प्रयासरत हैं। उनके इस जज़्बे को देखकर ऐसा मालूम चलता है कि इस दुनिया से इंसानियत मिटी है कभी मिट सकती है। औरों की निस्वार्थ भाव से मदद करना हम सबको अरवा जैसे लोगों से सीखना चाहिए। वो हमे यह प्रेरणा देती हैं की हमे अपने स्तर से असक्षम एवं दुर्बल लोगों की हरसंभव मदद करनी चाहिए जिससे वो सब भी वो जीवन जी पाएं जो हम जी रहे हैं। इंसानियत ही अरवा का धर्म है और इसे ही वो कर्म के रूप में भी देखती हैं। हम उन्हें सलाम करते हैं और उम्मीद करते हैं की जैसे वो औरों की मदद के लिए आगे आई हैं वैसे ही हम सब भी औरों की मदद के लिए अपने अपने स्तर से प्रयास करेंगे।

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