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उस डॉक्टर की कहानी, जिनकी बदौलत भारत में हृदय रोग का उपचार संभव हो पाया

चिकित्सा का क्षेत्र सबसे ज़िम्मेदारी भरा और चुनौतीपूर्ण क्षत्रों में से एक है। इस पेशे को अपनाने के लिए कड़ी मेहनत और दृढ़ संकल्प की आवश्यकता होती है, जो हर किसी के बस की बात नहीं है। आज चिकित्सा और मेडिकल का क्षेत्र सबसे उन्नत क्षेत्रों में से एक है। रोज़ नए-नए तकनीकों का ईजाद हो रहा है और उपचार के अत्यधिक उन्नत तरीकों का उपयोग भी किया जा रहा है।

एक डॉक्टर किसी का जीवन बचाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा देता है। तभी तो लोग उन्हें भगवान का दर्जा देते हैं और इस क्षेत्र को आदर की नज़र से देखा जाता है। आज के आधुनिक दिनचर्या के कारण जहाँ एक ओर बड़ी संख्या में लोग हृदय रोग से पीड़ित हैं, वहीं आज इसके इलाज के किये बहुत सारे डॉक्टर और स्पेशलिस्ट उपलब्ध हैं। लोग अपना इलाज करवाने के किये विभिन्न हृदय रोग विशेषज्ञों तक पहुंच जाते हैं। लेकिन क्या आप उस व्यक्ति को जानते हैं जिसने भारत में पहली बार हृदय रोग का उपचार यानी कार्डियोलॉजी को लाया?

इनका नाम है डॉ शिवरामकृष्ण अय्यर पद्मावती, यह महिला भारत की पहली हृदय रोग विशेषज्ञ है। 60 से भी अधिक वर्षों से हृदय रोगियों का इलाज करने वाली डॉ पद्मावती जल्द ही 101 वर्ष की हो जाएंगी। उन्हें सबसे पहले देश में कार्डियक शोध लाने और हृदय रोग उपचार के अभ्यास करने का श्रेय दिया जाता है। इतनी उम्र दराज़ होने के के बाद भी वे दिन में 12 घंटे काम करती हैं, ताकि आज भी वे रोगियों की मदद कर सके।

डॉ पद्मावती 1917 में बर्मा में पैदा हुईं, जिसे अब म्यांमार कहा जाता है। वे बर्मा के दक्षिण भाग में स्थित मेर्गुई द्वीपसमूह में पली-बढ़ीं। वे हमेशा से पढ़ने में बहुत अच्छी थी और उन्होंने स्कूल व विश्वविद्यालय में कई पुरस्कार प्राप्त किये थे। उन्हें बर्मा के रंगून विश्वविद्यालय से अपनी पहली डिग्री मिली, जहां वह पहली महिला छात्र थीं। पद्मावती ने रंगून मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की डिग्री प्राप्त की है एवं लंदन के रॉयल कॉलेज ऑफ फिजिसियंस से एफ.आर.सी.पी. एवं इडिनबर्ग के रॉयल कालेज ऑफ फिजिशियंश से एफ.आर.सी.पी.ई. की डिग्री हासिल की है।

1941 में द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान डॉ पद्मावती को परिवार सहित भारत वापस भागने के लिए मजबूर होना पड़ा। वह तीन साल तक तमिलनाडु में रही और युद्ध समाप्त होने के बाद 1949 में वह अपने परास्नातक के लिए लंदन चली गयी।लंदन जाने के बाद उन्हें रॉयल कॉलेज ऑफ फिजियंस से फ़ेलोशिप मिली। इस दौरान पद्मावती ने जॉन्स हॉपकिंस विश्वविद्यालय और हार्वर्ड मेडिकल स्कूल में भी अध्ययन किया।

वे 1953 में भारत आ गईं एवं दिल्ली के लेडी हार्डिंग्स मेडिकल कालेज में लेक्चरर हो गईं, जहां उन्होंने एक कार्डियोलॉजी क्लिनीक को भी स्थापित किया। वह एक ऐसा समय था जब लोगों के बीच हृदय रोग के प्रति जागरूकता की कमी थी। उन्होंने खुद को एक प्रमुख हृदय रोग विशेषज्ञ के रूप में स्थापित किया और अपने पूरे करियर को इसी पर केंद्रित कर दिया। फिर उन्होंने दिल्ली में लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज में भारत का पहला कार्डियक क्लिनिक और कैथेटर प्रयोगशाला स्थापित किया गया।

वे कहती हैं, “जब मैं लेडी हार्डिग अस्पताल से जुड़ी, वहां सभी महिलाएं अंग्रेज़ थीं। वहां कार्डियोलॉजी विभाग नहीं था। हमने इसे शुरू किया। फिर जी.बी. पंत हॉस्पिटल में मैंने कार्डियोलॉजी विभाग शुरू किया।”

उन्होंने देश में प्रतिष्ठित मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज में भी पहले कार्डियोलॉजी विभाग की स्थापना की जहां की वह निदेशक थीं। उन्होंने भारत के कई अग्रणी चिकित्सकों को प्रशिक्षित किया है जो चिकित्सा क्षेत्र में अपना योगदान देने के लिए आगे बढ़े हैं।

उस दौर में कार्डियोलॉजी एक अज्ञात क्षेत्र हुआ करता था, पर पद्मावती को इसके महत्व और जरूरत का अंदाज़ा था। उन्होंने 1981 में दिल्ली में भारत के पहले राष्ट्रीय हृदय संस्थान (एनएचआई) की स्थापना के लिए पुरजोर पहल की। इसके उद्घाटन के लिए उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से गुजारिश की थी। उसी दिन राजीव गांधी का जन्मदिन भी था पर इतनी व्यस्तता के बाद भी वे उनके बुलावे पर आयी और उद्घाटन किया। डॉ पद्मावती ने कार्डियोलॉजी के अनुसंधान को बढ़ावा दिया और हृदय रोगों के बारे में जागरूकता फैलाने में मदद की। इस क्षेत्र में उनके अग्रणी कार्य के लिए, भारत सरकार ने उन्हें 1992 में देश के दूसरे सर्वश्रेष्ठ नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया।

101 की उम्र में भी पद्मावती प्रतिदिन लगभग 12 घंटे रोगी को देखती हैं। वे अभी भी राष्ट्रीय हृदय संस्थान, दिल्ली के निदेशक के रूप में कार्यरत हैं, और अखिल भारतीय हृदय फाउंडेशन की संस्थापक अध्यक्ष हैं। वह कार्डियोलॉजी में छात्रों को प्रशिक्षित करने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) को भी सहयोग करती हैं।

भारतीय चिकित्सा क्षेत्र में उनका एक अतुलनीय योगदान रहा है। आज भी उनका लोगों के प्रति सेवा का जो भाव है उसे देख दूसरे डॉक्टरों को भी प्रेरणा लेनी चाहिए।

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