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ये हैं 3 Idiots के असली फुनसुक वांगडू, लद्दाख में इनके अभूतपूर्व कारनामे से पूरी दुनिया परिचित है

आज अगर हम अपने शहर, गाँव, आसपास या समाज में देखे तो कोई न कोई समस्या आपको जरूर देखेगी। कहीं सड़क की, कहीं बिजली की, कहीं पानी की, कहीं शिक्षा की तो कहीं स्वच्छता की। कोई ना कोई समस्या तो हर जगह होती ही है। हम लोग भी हमेशा इन समस्याओं को लेकर चर्चा करते रहते और इसका दोष दूसरों पर मढ़ते रहते हैं। पर कभी खुद इसे समाप्त करने या इसका हल ढूंढने की कोशिश भी नहीं करते। पर अभी भी कुछ ऐसे लोग मौजूद हैं जो समाज के लिए सोचते हैं और समाज की समस्याओं का अपने ही तरीके से हल ढूंढ निकलते हैं। आज हम एक ऐसे ही शख्स की बात कर रहें है जिन्होंने अपने दम पर सामाजिक बदलाव के लिए बहुत सारे अनोखे काम किये है।

इनका नाम है सोनम वांगचुक। 51 वर्षीय सोनम वांगचुक लद्दाख के रहने वाले हैं। सोनम का जन्म जम्मू कश्मीर के लेह जिले में हुआ था। सोनम एक इंजीनियर, शिक्षा सुधारक व अविष्कारक हैं। उनके पिता एक राजनेता थे, वे राज्य सरकार में मंत्री भी रह चुके थे। आपको जानकर हैरानी होगी की 9 साल की उम्र तक सोनम कभी स्कूल नहीं जा सके। क्योंकि उनके गाँव में कोई स्कूल ही नहीं था। उनकी माँ नें ही उनको शुरूआती शिक्षा दी। आपको सोनम वांगचुक का नाम 3 इडियट्स के आमिर खान के किरदार फुनसुक वांगडू से मिलता जुलता लगा होगा। पर असल में भी उनकी शख्सियत कुछ वैसी ही है।

छोटी सी उम्र में ही, ‘सोनम वांगचुक’ ने ये महसूस कर लिया था, कि स्थानीय भाषा का ज्ञान होना अनिवार्य है। क्योंकि उनकी स्कूल लाइफ में लद्दाख में इस्तेमाल होने वाली भाषा की पढ़ाई नहीं करवाई जाती थी। ‘सोनम वांगचुक’ का गणित और विज्ञान की तरफ काफी झुकाव था। हालांकि, इंजीनियरिंग करने के दौरान पिता के साथ उनका विवाद हुआ। वो मेकैनिकल इंजीनियरिंग करना चाहते थे, लेकिन उनके पिता चाहते थे कि वो सिविल इंजीनियरिंग करें। पिता से हुए झगड़े के बाद उन्होंने अपना घर छोड़ दिया और अपने मन के सब्जेक्ट से इंजीनियरिंग करने की ठानी। उन्होंने आईआईटी श्रीनगर से मेकैनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री पूरी की।

अपने दुर्गम इलाके में शिक्षा की स्थिति बेहतर करने के लिए सोनम एवं उनके साथियों ने 1988 में एक अभियान शुरू किया। जिसका नाम स्टूडेंट एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख यानी सेकमॉल रखा गया। वर्षों तक सरकारी स्कूलों में बदलाव लाने का काम किया। ‘सोनम वांगचुक’ ने जम्मू-कश्मीर सरकार के साथ मिलकर, लद्दाख के स्कूलों में पाठ्यक्रम को, वहां की स्थानीय भाषा में कन्वर्ट करने का काम किया। वांगचुक प्रतिभावान बच्चों जिन्हें आगे बढऩे का मौका नहीं मिल पाता है उनके सपने को पूरे करने का काम कर रहे हैं। उनका एक स्कूल भी है जो कि पूरी तरह सौर ऊर्जा संचालित है। वे अब हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ ऑल्टरनेटिव्स की स्थापना करना चाहते हैं, जहां बिजनेस, टूरिज्म और अन्य विषयों की पढ़ाई होगी।

वांगचुक भारत में अपने कृत्रिम हिम स्तूप ग्लेशियर के अविष्कार के लिए भी जाने जाते हैं। 25 साल पूर्व वांगचुक ने इस दिशा में प्रयास करना शुरू किया था। लद्दाख क्षेत्र में कम होते ग्लेशियर और गर्मी के मौसम में पानी की कमी की परेशानी दूर करने का उपाय उन्हें कृत्रिम ग्लेशियर के निर्माण में नज़र आया। पहले चपटे ग्लेशियर बनाए, जो जल्दी पिघल जाया करते थे। वांगचुक को इस समस्या का हल लद्दाख में बने स्तुपाकर मंदिरों में नज़र आया। उन्होंने नई तकनीक से ‘हिम स्तूप’ बनाना शुरू किया।

उनका यह प्रयास सफल रहा और ये नए किस्म का ग्लेशियर अब जल्दी नहीं पिघलता। गर्मी के मौसम में भी ये बूंद-बूंद टपकते थे। इस प्रयोग के सफल होने के बाद लद्दाख के लोगों की पानी की समस्या हल होने लगी और पर्यावरण को सुरक्षित रखने की मुहिम रंग लाने लगी। बसंत के समय में इस कृत्रिम ग्लेशियर से पिघले हुए पानी को टैकों में इकट्ठा किया जाता है, जिसका इस्तेमाल सिंचाई के लिए होता है। लद्दाख के इस कृत्रिम स्तूप ग्लेशियर से अभी तक 10 लाख लीटर पानी का सप्लाई किया है। सुमन नें यह ग्लेशियर 100 हेक्टेयर में बनाया गया और वांगचुक को इसके लिए लॉस एंजिलिस में रोलेक्स अवार्ड से भी नवाजा जा चुका है।

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