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किसानों को उनके मेहनत की उचित कीमत दिलवाने का अनूठा प्रयास कर रही है IIT दिल्ली की यह छात्रा

किसानों के खेत से लेकर आपकी प्लेट तक आने में फसल उत्पाद को कई बिचौलियों और व्यापारियों से हो कर गुजरना पड़ता है। बीच के इस श्रृंखला वृद्धि का कार्य किसानों से सस्ते दाम पर खरीद कर महंगे मूल्य पर आगे बेचने का होता है। इस पूरी प्रक्रिया में ज्यादाकर असली मुनाफा बिचौलियों का होता है, जबकि दोनों छोर पर स्थित किसान और ग्राहक ठगे रह जाते हैं। किसानों द्वारा मंडियों तक फसल पहुंचाने की लागत भी अधिक होने से बिचौलियों की सक्रियता बढ़ जाती है। किसी फसल उत्पाद का जो मूल्य उपभोक्ता देता है उसका कम ही हिस्सा किसानों तक पहुंचता है। बाजार मूल्य का कभी-कभी तो 20 से 30% ही किसानों तक पहुँच पाता है। बिचौलिए कम होंगे तभी किसानों को अपनी फसल की पहले से ज्यादा कीमत हासिल होगी और उपभोक्ता को किफायती दर पर कृषि उत्पाद हासिल हो पाएगा।

किसानों की इन समस्या को समग्र रुप से हल करने का प्रयास कर रही हैं अनु मीणा। राजस्थान के एक छोटे से गाँव मनौली की रहने वाली अनु ने अपने दादा जी को, जो एक किसान थे, इन समस्याओं से रु-ब-रु होते देखा था और आज भी किसान ऐसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। अनु ने इसका हल निकालने का सोंचा। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, दिल्ली से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने ‘एग्रोवेब’ नामक स्टार्टअप की आधारशिला रखी। ‘एग्रोवेब’ का उद्देश्य तकनीक के माध्यम से किसानों को अत्यधिक प्रभावशाली कीमत दिलवाने का है। वे वितरण श्रृंखला को शोध, विश्लेषण और तकनीक के माध्यम से संगठित करने का काम कर रही हैं।

केनफ़ोलिओज़ से खास बातचीत में अनु ने बताया कि “GDP का 13% योगदान कृषि से है, फिर भी कृषि अत्यधिक असंगठित है और लोग इसे क्षेत्र को सरल और कारगर बनाने का प्रयास कर रहे हैं। यद्यपी इसमें तकनीक को सम्मलित करने में वक्त लगेगा।”

अपने इस उपक्रम को शुरुआत करने के लिए अनु को अपने कुछ मित्रों और वरिष्ठों से पैसे उधार लेना पड़ा। परंतु जल्द ही वे योगेश अग्रवाल के ‘डैफोडिल साॅफ्टवेयर लिमिटेड’ से सीड फण्ड प्राप्त करने में सफल रहीं। इससे उनके काम को प्रोत्साहन मिला और वे अपने मुख्य काम पर ध्यान केन्द्रित कर सकीं कि कैसे किसानों को उनके उत्पाद के लिए बेहतर कीमत उपलब्ध कराया जाए। उन्होंने ताजे फल और सब्जियाँ खुदरा दुकानों, होटल, रेस्तरां कैंटीन और केटरर्स तक वितरण का काम शुरु किया।

अनु ने बैचमेट पायल जवालकर और अरुण यादव जिन्हें कृषि व्यवसाय क्षेत्र में 6 वर्षो का अनुभव है, के साथ मिलकर टीम बनाया जो उन्हें ‘एग्रोवेब’ के विश्लेषण संबंधी और कार्य विधी में मदद करते हैं। कुछ अन्य उत्साही युवकों के समूह के साथ ‘एग्रोवेब’ संगठनात्मक संरचना अपनी टीम के साथ सहकारिता पर फोकस करता है।

अनु कहती हैं, “यह स्टार्टअप सिर्फ व्यक्तिगत भूमिका नहीं है बल्कि जिस काम की अवश्यकता है उसके प्रति जवाबदेही लेने की है।”

7 महीने पहले शुरु किया गये इस स्टार्टअप ने कई चुनौतियों का भी सामना किया है। चूँकि इसमें लौजिस्टिक्स और लागत प्रबंधन के लिए किसी अन्य पक्ष की कोई भूमिका नहीं, अतः उन्हें वितरण हेतु स्वयं लागत कुशल होना पड़ता है। इसके अतिरिक्त, ग्राहक के अावश्यकतानुसार गुणवत्ता की जाँच और तदानुसार अलग-अलग आपूर्ति एक समय लगने वाला कार्य होता है।

गुरुग्राम से संचालित ‘एग्रोवेब’ पानीपथ, सोनीपथ, हरपुर और राजस्थान से माल लेते हैं। ढाँचागत व्यवस्थाक्रम में कोई विशेषज्ञ गाँव से उत्पाद लेकर मंडी तक पहुंचाता है और फिर वहाँ से व्यापारी के माध्यम से विभिन्न संस्थानों तक पहुँचता है। ‘एग्रोवेब’ का लागत समिकरण अधिक बेहतर है क्योंकि वे सीधे किसानों से खरीदते हैं। उदाहरण के तौर पर यदि किसान आलू 3 से 4 रुपये प्रति किलो बेच रहा है, तो ये उन्हें 4 से 5 रुपये में लेते हैं। जिससे 25% की कीमत वृद्धि किसानों को एक बड़ा लाभ देती है।

 

केनफो़लिओ़ज से साक्षात्कार में अनु ने कठिनाईयों का जिक्र करते हुए बताया, “प्रत्येक किसान तक पहुंचना आसान नहीं होता। हमलोगों ने प्रयास कर 50 किसानों को सम्मलित किया है, परंतु एक बड़े पैमाने पर यह कर पाना आसान नहीं। इन कठिनाई को दूर करने के लिए हमलोग सरकार से जुड़ने का अवलोकन कर रहे हैं जिससे विस्तृत पैमाने पर किसानों से सम्बद्ध हो सकें।”

चालू रुप से ₹50,000 से अधिक के प्रतिदिन लेन देन के साथ 30 ग्राहक और 50 किसानों को अपने साथ 7 महीनों के कार्यकाल में जोड़ा है। उन्होंने छः महीनों में 1.2 करोड़ का लक्ष्य रखा है। ‘एग्रोवेब’ टीम की इच्छा इस उपक्रम को दूसरे शहरों तक भी विस्तृत करने की है, जिससे की बेहतर संलग्नता हो सके और अधिक से अधिक किसानों की बेहतरी के लिए कार्य का मार्ग प्रशस्त हो।

“हो जाए अच्छी भी फसल, पर लाभ कृषकों को कहाँ खाते; खवाई, बीज ऋण से हैं रंगे, रखें कहाँ” मैथिली शरण गुप्त की कविता ‘किसान’ की ये पंक्तियाँ किसानों के अच्छी पैदावार के बावजूद उचित कीमत न मिलने का दर्द बयान करती है। परंतु आशा की किरण है कि बड़े-बड़े संस्थानों से पढ़े लिखे युवा इन किसानों की मदद को आगे आ रहे हैं। अनु मीणा का प्रयास एक सुगढ़ प्रयास है, जिसमें किसान अपने कृषि कार्यो पर संयमित रह सके और वितरण एवं विपणन के कार्यों में ‘एग्रोवेब’ जैसी संस्था उन्हें उचित मूल्यों के साथ सरलता और सहूलियत प्रदान कर सके।

कृषि जीवन का आधार है और किसान उस जीवन का अन्नदाता। किसानो के हितों की रक्षा का उद्देश्य हमेशा प्राथमिकता स्तर पर सर्वोच्च होनी चाहिए।

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