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कूड़े के ट्रक के पीछे बैठकर पिछले 25 सालों में इस व्यक्ति ने जो किया है, वह सच में विश्वसनीय है

लोग अक्सर वंचित व्यक्तियों को नीची नज़रों से देखते हैं क्योंकि वे कम शिक्षित और विषम नौकरियां करते हैं। इस तरह की दकियानूसी सोच केवल समाज के प्रभावी संतुलन को बाधित करती है, जबकि हमें समाज में हर तरह के लोगों की जरूरत होती है। लोगों के व्यक्तित्व और बुद्धिमत्ता को निर्धारित करने का यह तरीका नैतिक और तार्किक रूप से गलत है।

49 वर्षीय हरिश्चंद्र धीवर बृहन्मुंबई म्युनिसिपल कारपोरेशन (BMC) के कर्मचारी हैं, जिन्होंने नौकरी की तथाकथित ओछी प्रकृति और आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के बावजूद यह सिद्ध कर दिखाया है कि वह एक शानदार चमकता हीरा फिर भी हो सकता है। इस चमकते हीरे ने शेगांव बुलढाणा द्वारा प्रायोजित कविता लेखन प्रतियोगिता में पहला इनाम अर्जित किया।

धीवर का जन्म पुणे के पास स्थित पुरंदर जिले के एक छोटे से गांव में हुआ था। जब वे 13 वर्ष के थे तब उनके पिता का देहांत हो गया था। भावनात्मक और दिमागी तौर पर अस्थिर होने की वजह से वे दसवीं कक्षा में फेल हो गए थे। कुछ वर्षों के बाद वे मुंबई आ गए, यहाँ वे अपनी बहन के यहाँ रहने लगे।

टाइम्स ऑफ़ इंडिया को बताते हुए उन्होंने कहा, “ उनकी बहन का घर 10 फ़ीट बाय 10 फ़ीट का चेम्बूर में एक कमरा था। यह इलाका उस समय दलदल था।”

अपना जीवन चलाने के लिए शुरू के कुछ साल में उन्होंने विषम नौकरियां की। बाद में दूसरे लोगों की तरह उन्हें BMC में संविदात्मक नौकरी मिली और तब से वे यह नौकरी कर रहे हैं। वे अभी चेम्बूर के मुकुंद नगर चॉल में रह रहे हैं।

पिछले 25 सालों से धीवर BMC में काम कर रहे हैं, उनके जीवन में सड़कें साफ करना, कचरा इकट्ठा करना और उन्हें फेंकना ही शामिल था। जहाँ बहुत से कर्मचारी अपने जीवन की तमाम परेशानियों को भुलाने के लिए शराब का सहारा लिया करते हैं, वहीं धीवर ने एक अलग ही रास्ता चुना। अपनी परिस्थितियों और अपने काम का सामना करने के लिए उन्होंने कविता लिखना शुरू किया।

कचरे के ट्रक के ऊपर बैठकर धीवर ने 200 से भी ऊपर कविताएं लिखी, सार्वजनिक श्रमिकों की भारी और खतरनाक जीवनशैली का चित्रण। अपने काम के अलावा घरेलू हिंसा, बलात्कार, शराबी आक्रोश को भी अपनी कविता का विषय बनाया है।

धीवर बताते हैं, “मेरी कुछ कविताएं 10 से भी अधिक किताबों में प्रकाशित हुई हैं। यह किताबें बहुत सारे कवियों की रचनाओं को समेकित करके बनाया गया है। अगले दो महीनों में मेरी एक खुद की किताब भी आ जाएगी।”

वर्ष 2000 में धीवर ने अपनी पहली कविता लिखी जिसका टाइटल ऐसे कुठवर चलायचे (कितनी दूरी चलूँ इस तरह!) है। वे कहते हैं, “यह कविता हमारे परिवारों में रह रही महिलाओं की स्थिति और बराबरी के अधिकार के लिए लड़ती महिलाओं की व्यथा पर है।”

बहुत वर्षों तक धीवर की कविताओं को किसी ने नहीं पढ़ा था परन्तु उनके बेटे ने उनके हुनर को पहचाना और उन्हें सलाह दी कि कविताओं को ऑनलाइन पोस्ट करें। धीरे-धीरे लोगों ने उनकी प्रतिभा को पहचाना। पिछले पांच सालों से उनके एक सहयोगी ने उनके पसंद को बढ़ावा देने के लिए एक यूनियन बनाया है। उसका नाम उन्होंने “कचरा वहुताक संघ” रखा है।

धीवर की उस यूनियन में अपनी विशेष भूमिका है। जब यूनियन BMC से अपने हक़ की मांग करते हैं तब धीवर नारे लिखते हैं और पोस्टर बनाते हैं, ताकि उनकी आवाज़ बुलंद तरीके से BMC तक पहुंचे।

धीवर जैसे लोग सचमुच हीरे हैं। उन्हें सिर्फ खोजने और तराशने की ज़रूरत है। हम आशा करते हैं कि लोग उनकी कविताओं को पढ़ेंगे और उन्हें समुचित पहचान दिलाने में मदद करेंगे।

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