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देश को हरियाली देने के लिए छोड़ दी नौकरी, अपनी तकनीक से 10 साल में ही तैयार कर देते हैं जंगल

हमने सुना था कि जंगल प्राकृतिक होते हैं और उन्हें उगाया नहीं जा सकता लेकिन उत्तराखंड के रहने वाले 32 साल के एक शख्स ने इस मिथक को भी तोड़ दिया। दरअसल, उन्होंने देश में बढ़ती इमारतों और घटते पेड़ों को देखते जंगलों का निर्माण करना शुरू किया। हम बात कर रहे हैं उत्तराखंड में रहने वाले इंजीनियर शुभेंदू शर्मा की, जो पिछले कुछ वर्षों से देश में जंगल उगाने का काम कर रहे हैं। इसके लिए उन्होंने अपनी नौकरी तक छोड़ दी। आज विश्वभर में उनके कारनामे की प्रशंसा हो रही है।

ऐसे आया शुभेंदू की लाइफ में बदलाव

शुभेंदु शर्मा टोयोटा के प्लांट में बतौर इंजीनियर कार्यरत थे, उन्होंने एक पर्यावरणविद से प्रेरित होकर अपनी राह ही बदल दी। हुआ यह कि एक दिन उनके प्लांट में जापान के पर्यावरणविद आए थे, उन्होंने उसी प्लांट में जंगल उगाकर दिखाया। इससे शुभेंदू न सिर्फ प्रेरित हुए बल्कि उन्हें काफी अचंभा भी हुआ। पर्यावरणविद अकीरा मियावाकी से मिलने के बाद शुभेंदू की लाइफ में बदलाव आया और फिर वे जंगल उगाने के काम में लग गए। इसके लिए उन्होंने अकीरा को काफी दिनों तक असिस्ट भी किया। अब तक शुभेंदू यही समझते थे कि जंगलों को प्राकृतिक रूप से ही उगाया जा सकता है और इस प्रक्रिया में कम से कम 100 साल का वक्त लगता है। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि पर्यावरणविद मियावाकी अब तक दुनियाभर में 4 करोड़ पेड़ लगा चुके हैं।

खुद के घर से ही की शुरुआत

जरूरी नहीं शुरुआत में हर काम में कामयाबी ही मिले, इसीलिए शुभेंदू ने जंगल उगाने का पहला प्रयोग उत्तराखंड स्थित खुद के ही घर के बगीचे से किया। 93 वर्ग मीटर फैले इस बगीचे में उन्होंने एक साल में ही 42 प्रजातियों के 300 पेड़ लगा डाले। इससे बंजर पड़ी जमीन खिलखिलाने लगी।

गौरतलब है कि गावों का शहरीकरण करने की कोशिश में हरियाली खत्म सी होती जा रही है, ऐसे में शुभेंदू जैसे लोग समाज में पर्यावरण के प्रति लोगों को जागरुक कर रहे हैं।

देश को हरियाली देने के लिए छोड़ी जॉब

इस काम को अंजाम देने के लिए उन्होंने 2011 में नौकरी तक छोड़ दी। हालांकि ये फैसला आसान नहीं था, भला अच्छी खासी नौकरी कोई ऐसे कैसे छोड़ सकता है लेकिन उन्होंने यह कदम उठाया और बंजर व खाली पड़ी जमीनों पर जंगल उगाने लगे। इस काम के लिए उनके परिवार वाले बिल्कुल भी राज़ी नहीं थे लेकिन आखिरकार वो उन्हें समझाने में सफल हो ही गए।

विदेशों से मिला ऑर्डर

इसके बाद उन्होंने खुद की संस्था ‘अफोरेस्ट’ खोल ली और उसके बैनर तले काम करने लगे। शुरुआत मायूसी भरा था, क्लाइंट न मिलने के कारण उन्हें काफी नुकसान भी हुआ लेकिन फिर एक दिन उन्हें विदेशी कंपनी से 10 हजार पेड़ लगाने का ऑर्डर मिला, उनकी कंपनी का काम खराब पड़ी जमीन पर पेड़ लगाकर उसे हरा-भरा बनाने का है।

आज इनके पास 50 से ज्यादा क्लाइंट हैं, उसके अलावा ये ऑर्डर पर लोगों की ज़मीन पर पार्क तैयार करते हैं। खाली ज़मीन पर प्राकृतिक जंगल उगाने से उनका मकसद है लोगों को शुद्ध हवा मिले और प्रदूषण से मुक्ति मिले।

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