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इस शख्स ने वैज्ञानिक से किसान बनकर जैविक खेती के लिए अपना सब कुछ समर्पित कर दिया

एक समय था जब खेती करना श्रेष्ठ कार्य माना जाता था तभी तो किसान धरती पुत्र कहलाता था। लेकिन आज ऐसा नहींं है। समय बदला और उसके साथ बदलने लगा खेती का स्वरूप। आज खेती पूरी तरह तकनीक पर आधारित है। महंगे रासायनिक उर्वरकों के प्रयोग ने लहलहाती फसलों की खूबसूरती को बनावटी बना दिया है, लेकिन एक अच्छी बात यह है कि किसान को अब भी यह ज्ञात है कि वह धरती पुत्र है और इस धरती का बेटा होने के नाते उसका फर्ज़ है कि फसलों को उनका वही प्राकृतिक जैविक स्वरूप पुनः प्रदान करें।

अपने कर्तव्य को कुछ इस तरह से ही निभा रहा है भारत का दक्षिणी राज्य तमिलनाडु जो कि जैविक कृषि तकनीकों को प्रेरित करने वाले राज्यों में पहला स्थान रखता है। हमारी आज की कहानी एक ऐसे वैज्ञानिक से किसान बने व्यक्ति की है जिन्होंने जैविक खेती को पूरे भारत में एक नया रूप दिया है। वह और कोई नहीं बल्कि हैं जैविक वैज्ञानिक डॉ. जी नम्मालवार जिन्होंने तमिलनाडु में जैविक खेती की शुरुआत की और भारत के कई अन्य राज्यों में भी खेती को प्रोत्साहित करने के लिए आंदोलन किया। डॉ.नम्मालवार ने किसानों को जैविक खेती के लिए प्रेरित करने में अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया।

डॉ. नम्मलवार का जन्म सन् 1938 में तमिलनाडु के एक किसान परिवार में हुआ था। उनका गाँव कावेरी नदी के पास स्थित होने की वजह से बहुत ही हरा-भरा था। यही कारण था कि उनका पूरा बचपन खेत खलिहानों में बीता।

अपने गाँव से प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने कृषि में स्नातक किया और उसके बाद कृषि वैज्ञानिक के रूप में कोविलपट्टी में कृषि क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र में कार्य करने लगे जो कि 1901 में अंग्रेजों द्वारा शुरू किया गया पहला कृषि शोध केंद्र था। डॉ. नम्मालवार जानते थे कि कोविलपट्टी तमिलनाडु में सबसे शुष्क स्थान है जहाँ पर कृषि के लिए कार्य करना बहुत ही चुनौतीपूर्ण है।

डॉ. नम्मालवार बताते है कि “मैं कपास और बाजरी की फसलों में विभिन्न रासायनिक उर्वरकों के अंतर और जैविक खाद के स्तर पर परीक्षण कर रहा था। ज्वार, रागी, बाजरा, दालें, कपास, आदि जैसी सभी फसलों में मैंने कोशिश की और मैं सफल भी हुआ। उस दौरान मैं हाइब्रिड बीजों, रासायनिक उर्वरकों और रासायनिक कीटनाशकों के उपयोग के बारे में जानकारी हासिल किया।”

उसके बाद अपने कार्य को आगे बढ़ाने और परीक्षण करने के लिए वे शांति द्वीप गए और दस साल शांति द्वीप पर नोबेल पुरस्कार विजेता आर पी डोमिनिक पीयरे द्वारा स्थापित एक संगठन में कृषिविद् के रूप में बिताया। लेकिन उनका लक्ष्य तिरुनेलवेली जिले के कलाकड़ ब्लॉक में कृषि विकास के माध्यम से वहाँ के किसानों के जीवन स्तर में सुधार लाना था।

डॉ. नम्मालवार बताते है कि “मैं वहां काली मिट्टी के एक बड़े खेत का प्रभारी था। चूंकि हम कम वर्षा वाले क्षेत्र में थे तो किसानों ने उर्वरक के रूप में मवेशी खाद का उपयोग किया। उन्होंने मिट्टी पर भेड़ों और मवेशियों को भी रखा ताकि उनके मूत्र और गोबर से मिट्टी को प्राकृतिक उर्वरक प्राप्त हो । साथ ही कुछ छोटे से क्षेत्र में मैंने रासायनिक उर्वरकों का उपयोग किया और अंत में मैंने पाया कि रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग करने से किसानों को केवल नुकसान हुआ और उनकी लागत बढ़ गई। उसके बाद मैंने अधिकारियों को लिखा कि यदि रासायनिक उर्वरकों का उपयोग किया जाता है, तो मिट्टी खराब हो जाएगी और किसान आर्थिक रूप से पूरी तरह टूट जायेंगे। और यदि रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग होता है तो उसमे अधिक पानी की भी आवश्यकता होती नही तो पौधे नष्ट होने लगते है।”

उसके बाद डॉ. नम्मालवार ने कृषि में “भागीदारी विकास” के विचार को फैलाने के लिए 1979 में तीव्र गति से काम करना शुरू किया। डॉ. नम्मलवार ने दुनिया भर में यात्राएं की और विभिन्न पारिस्थितिक प्रणालियों में कृषि प्रथाओं और तकनीकों को सीखा और कई किसानों और गैरसरकारी संगठनों को भी जैविक खेती के लिए प्रोत्साहित किया साथ ही उन्होंने तमिल भाषा में कृषि विषय पर कई किताबें और लेख भी लिखे।

उन्हें तमिलनाडु में जैविक खेती का जनक माना जाता है। उन्होंने एक अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कम्पनी द्वारा उपजाऊ कावेरी डेल्टा जिलों में प्रस्तावित मीथेन परियोजना के खिलाफ आंदोलन का नेतृत्व किया और उनके प्रयासों का ही परिणाम रहा की वह परियोजना रद्द कर दी गई। कृषि में उनके योगदान को देखकर गांधी ग्राम ग्रामीण विश्वविद्यालय डिंडुगल ने साल 2007 में उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान की।

डॉ. नम्मालवार बताते है कि “मैं जिस भी किसान से मिलता उसे जैविक खेती के लिए प्रोत्साहित करता और उसके साथ खेतों पर जाकर काम करता हूँ।”

एक दिन रागी की कटाई करने वाली कुछ महिलाओं ने मुझसे पूछा क्या हमारे खेतों पर आएंगे और हमसे जुड़ेंगे? मैंने उनके आमन्त्रण को स्वीकार किया और रागी की फसल काटने चला गया। वहाँ जाकर मुझे बहुत ही अच्छा लगा क्योंकि बचपन में भी अक्सर मैं मेरी माँ के साथ खेतों पर जाकर काम किया करता था।”

उन्होंने कुछ दोस्तों के साथ शुष्क पुदुकोट्टाई जिले में 10 एकड़ बंजर भूमि खरीदी। और वर्षा जल का संग्रहण कर एक नर्सरी शुरू की। उन्होंने वहाँ कुएं खोदे, एक सब्जी उद्यान लगाया और कुक्कुट पालन शुरू किया। सब्जियों की खेती में स्थानीय लड़के और लड़कियों का सहयोग उन्हें मिला इस तरह उन्होंने एक बंजर भूमि का विकास कर दिखाया।

डॉ. नम्मालवार बताते हैं कि “मैंने लोगों से पूछा कि वे कौन से पेड़ लगाएंगे। उन्होंने 52 पेड़ों के नाम दिए। और हमने उन सभी 52 पेड़ों को वहाँ सफलतापूर्वक लगाया।”

तमिलनाडु में खेती को सफल बनाने के बाद उन्होंने महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, उड़ीसा आदि स्थानों पर जाकर भी काम किया। डॉ. नम्मालवार के प्रयासों से जैविक खेती को एक नया स्वरूप मिला है जो हमारी कृषि व्यवस्था के लिए एक उपहार है। एक तरह से डॉ. नम्मालवार ने पुरानी कहावत को ही चरितार्थ करते हुए लगातार रसायनों से क्षरित होती जमीन और उससे होती आ रही खेती को जैविक खेती में बदलकर उसे उसकी “उत्तम” जगह पर स्थापित करने में शानदार कामयाबी हासिल की है।

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