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उस शख्सियत की कहानी जिनकी मुट्ठी भर ख़्वाब ने हिंदुस्तान को चंद्रमा तक पहुंचा दिया

भारत विश्व में सफलताओं के देश के तौर पर मशहूर है। यहाँ हर विधा, हर क्षेत्र में तमाम उपलब्धियां हासिल की गयी हैं। यहाँ का युवा वर्ग पूरे विश्व के लिए मिसाल है और यहाँ की सांस्कृतिक विरासत महान है। ऐसे भारत देश में जहाँ हमेशा से विज्ञान और आधुनिकता को बढ़ावा दिया गया है, यहाँ हर क्षेत्र में बेहतरीन काम किया गया है और अंतरिक्ष के क्षेत्र में भी अपार संभावनाएं उत्पन्न की गयी हैं। उसका जीताजागता उदाहरणइसरो (इंडियन स्पेस रिसर्च आर्गेनाईजेशन) है जिसने अंतराष्ट्रीय स्तर पर भारत को अंतरिक्ष विज्ञान में किये गए उत्कृष्ट कार्य के लिए एक अलग पहचान दी है। लगातार सैटेलाइट्स को अंतरिक्ष में प्रक्षेपित करके इसरो ने केवल देश के नागरिकों को गौरवान्वित किया है बल्कि भारत को अंतरिक्ष विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में अग्रणी स्थान भी दिलाया है।

लेकिन इसरो ने आज जो भी उपलब्धि हासिल करके देश का विश्व में मान बढ़ाया है उसका बहुत हद तक श्रेय सतीश धवन को जाता है, हालांकि इसरो के पीछे विक्रम साराभाई की सोच थी लेकिन इसरो को सफलता प्रोफेसर सतीश धवन के ध्येय से मिली है। आइये आज आपको उनकी कहानी से अवगत कराते हैं।

सबसे कम उम्र में बने IISc के सर्विंग डायरेक्टर, सतीश धवन सबसे लम्बे समय तक इस पद पर बने रहे। वास्तव में इन्होंने भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को सफलता की नयी ऊंचाइयों तक ले जाने में अहम् भूमिका निभाई।

25 दिसंबर 1920 में श्रीनगर में जन्मे प्रोफेसर सतीश धवन ने पंजाब यूनिवर्सिटी से गणित विषय में B.A., अंग्रेजी विषय में M.A. और फिर मेकैनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की। 1947 में वो अमेरिका चले गए जहाँ उन्होंने एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में एम्.एस. किया। उसके बाद उन्होंने कैलिफ़ोर्निया इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी (कैलटेक) से भी एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में डिग्री प्राप्त की। इसके पश्चयात उन्होंने 1952 में प्रसिद्ध एयरोस्पेस वैज्ञानिक एवं प्रोफेसर हैंस डब्लू. लैपमैन की सलाह से एरोनॉटिक्स और गणित में पीएचडी भी की। इसके पश्चात वो बैंगलोर के इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ साइंस (IISc) गए, जहाँ उन्होंने बतौर सीनियर साइंटिफिक अफसर कमान संभाली। इसके बाद उन्हें डिपार्टमेंट ऑफ़ एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग का हेड बनाया गया। उनके कार्यकाल के दौरान उनके डिपार्टमेंट ने भारत में एक्सपेरिमेंटल फ्लूइड डायनामिक्स में अभूतपूर्व सफलता हासिल की।

वास्तव में उनके द्वारा पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर शुरू की गयी तकनीक ने भारत में विश्व स्तरीय विंडटनल सुविधा (जोकि जहाज़ों, मिसाइल और अंतरिक्षीय विमानों की ऐरोडाइनामिक्स परिक्षण में काम आता है) का निर्माण किया।

उनकी कार्यशैली को देखते हुए उन्हें IISc बैंगलोर का 1962 में डायरेक्टर भी बना दिया गया। इस पद पर वो केवल सबसे कम उम्र में बने सर्विंग डायरेक्टर बने, बल्कि वो सबसे लम्बे समय तक इस पद पर बने रहे। वो सबसे उत्कृष्ट डायरेक्टर के तौर पर आज भी जाने जाते हैं। 9 साल के अपने कार्यकाल के बाद वो 1971 में 1 वर्ष के लिए कैलिफ़ोर्निया इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी (कैलटेक) चले गए, जहाँ से उन्हें तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने बुलावा भेजा। दरअसल विक्रम साराभाई की 30 दिसंबर 1971 को हुई आकस्मिक मृत्यु के बाद वो सतीश धवन को भारतीय अन्तरिक्षीय कार्यक्रमों की अध्यक्षता सौंपना चाहती थी।

उन्होंने भारत वापस लौटने और इंदिरा गाँधी की बात मानने से पहले अपनी दो शर्तें उनके सामने रखी, जिन्हे अंततः इंदिरा गाँधी ने स्वीकार कर लिया। उनकी प्रथम शर्त थी की उन्हें IISc, बैंगलोर का डायरेक्टर फिर से बनाया जाए और भारतीय अन्तरिक्षीय कार्यक्रमों का मुख्यालय बैंगलोर में बनाया जाए।

उन्हें मई 1972 में भारत के स्पेस डिपार्टमेंट का सेक्रेटरी नियुक्त किया गया और इसी समय इसरो और स्पेस कमीशन की नीव रखी गयी, धवन उन दोनों के अध्यक्ष नियुक्त कर दिये गए। उनके कार्यकाल से ही इसरो ने अभूतपूर्व सफलताएं हासिल कर देशविदेश में मिसालें कायम कर दी। उनका नवीन तकनीक पर जोर, और विकास पथ पर आगे बढ़ने की चाह ने इसरो को एक अलग पहचान दी। उन्होंने दूसरे क्षेत्र के लोगों और अन्य डिपार्टमेंट के अफसरों को भी इसरो के साथ काम करने का मौका दिया, जिससे की सहकारिता का एक बेहतर चलन की शुरुआत हुई।

 

उन्होंने इसरो में विभिन्न प्रोजेक्ट डाइरेक्टरों को पूर्ण स्वतंत्रता दी और उन्हें उनके प्रोजेक्ट की पूरी जिम्मेदारी सौंपते हुए सर्वे सर्वा घोषित किया, जिससे की सिफारिश और रेडटैपिस्म का कल्चर बंद हो सके। उन्होंने समय रहते सभी प्रोजेक्ट को खत्म करने पर ख़ासा जोर दिया, और खुद के उपकरण बनाने की हमेशा सिफारिश की जिससे संस्थान आत्मनिर्भर बन सके। आज यही फलसफा कई भारतीय उद्योग अपना रहे हैं जिससे उन्हें किसी और पर निर्भर नहीं होना पड़ता है।

उन्होंने कई महान वैज्ञानिकों को इसरो के विभिन्न प्रोजेक्ट्स के लिए चुना, जैसे की SLV 3  के लिए . पी. जे. अब्दुल कलाम, NAL में किये जा रहे शोध के लिए आर. नरसिम्हन एवं भारत की प्रथम सेटलाइट आर्यभट्ट के लिए यू. आर. राव।

उन्होंने हमेशा युवा वर्ग का प्रोत्साहन किया और उन्हें नयी ऊंचाइयां छूने के लिए प्रेरित किया। . पी. जे. अब्दुल कलाम बताते हैं कि जब 1979 में SLV-3 का प्रथम प्रक्षेपण असफल हुआ तो प्रोफेसर धवन ने हालात खुद संभालते हुए प्रेस वार्ता में कहा, “दोस्तों आज हम एक मिशन में असफल हुए हैं, हम कईओं में सफल भी हुए हैं और मैं चाहता हूँ की इसरो में मेरे सभी साथी मेरा साथ दें जिससे अगले मिशन में हम सब अवश्य कामयाब हों“। इसके ठीक 1 साल बाद, 1980 में अंततः SLV-3 का प्रक्षेपण सफल हुआ, जिसके बाद प्रोफेसर धवन ने पिछली बार की तरह खुद प्रेस वार्ता करते हुए यह मौका . पी. जे अब्दुल कलाम को दिया। यह दर्शाता है की सतीश धवन नाकामयाबी अपने सर ले सकने में माहिर थे और सफलता का श्रेय औरों को देते थे।

तो यह थी कहानी भारत के महानतम गुरु, वैज्ञानिक और एक इंसान की जिसने मुट्ठी भर ख़्वाब लेकर देश की तकदीर ही बदल दी। आज जितने प्रयास अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत कर रहा है वह सब उन्ही के ख्वाबों की देन है। हम ऐसे व्यक्ति को सलाम करते हैं और ऐसा मानते हैं कि उनसे प्रेरणा लेकर लाखों युवा अपने देश का भाग्य बदलने की ओर अग्रसर हो सकेंगे।

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