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सिमित आय के बावजूद बुजुर्गों और अनाथों की जिंदगी में उजाला लाने वाले शिक्षक

आज के बदलते परिवेश में गिरते नैतिक मूल्यों से समाज की व्यवस्था डगमगाने लगी है। सदियों पहले आचार्य चाणक्य ने शिक्षक की शक्ति से परिचित करवाते हुए कहा थाशिक्षक राष्ट्र का निर्माता होता है, निर्माण और प्रलय उसकी गोद में पलते है।आज शिक्षक की इसी राष्ट्र निर्माता की भूमिका को फिर से हमारे सामने प्रस्तुत किया है मुम्बई के मलाड स्थित सरकारी स्कूल में प्रधानाध्यापक के रूप में कार्यरत रूपेश रँगराव पाटिल ने। रूपेश ने यह साबित कर दिया की यदि बदलाव लाना है तो पहली शुरुआत खुद से करनी होगी क्योंकि – जिनमें अकेले चलने के हौंसले होते हैंएक दिन उनके पीछे ही काफ़िले होते हैं

जब रूपेश अध्यापक के रूप में कार्यरत थे तो उन्हें एक सरकारी सर्वे के तहत उन बच्चों का सर्वेक्षण करना था जो किसी कारणवश स्कूल नहीं जा पाते थे। उस सर्वेक्षण के दौरान उनके सामने जो तथ्य आये उसे जानकार वे हैरान थे उन्हें पता चला कि कितने ही बच्चे ऐसे हैं जिनके पास सर ढ़कने को छत तक नहीं है, खाने को पर्याप्त भोजन नहीं है। तब उन्हें लगा कि जब परिस्थितयां इतनी विकट है तो ऐसे में वे बच्चे स्कूल आने की कल्पना भी कैसे कर सकते हैं तभी रूपेश ने निर्णय लिया कि उन्हें उस बेसहारा बच्चों की मदद करनी होगी। उन्होंने अपना निर्णय अपनी पत्नी के आगे रखा जो खुद एक सरकारी स्कूल में अध्यापिका है। रूपेश की पत्नी ने उनके निर्णय का समर्थन किया क्योंकि वे खुद एक बच्चे के माता-पिता है इसलिए उन बच्चों की भावनाओं को समझना उनके लिए आसान था।

रूपेश कहते हैं कि “अगर आप सैकड़ो लोगों का पेट नहीं भर सकते तो केवल एक को भोजन दीजिये।अपने इसी विचार को उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया। रूपेश के पास बहुत ज्यादा साधन नहीं थे लेकिन बदलाव की दिशा में कदम बढ़ाने का दृढ़ निश्चय था। रूपेश ने गरीब बच्चों को भोजन देने की शुरुआत के कुछ समय बाद ही साल 2009 में सामजिक सरोकार के उद्देश्य सेश्री पराश ज्ञान शिक्षक प्रसारक मंडलनामक संस्था की स्थापना की और श्री नित्यानंद विद्यालय जो कि एक निजी विद्यालय था उसके परिसर में अपनी योजनाओं को मूर्त रूप देना प्रारम्भ किया और बेसहारों का सहारा बनकर समाज को एक सोच से अवगत कराया। लेकिन कुछ समय पश्चात ही एक ऐसी घटना घटित हुई जिसके बाद रूपेश के इस छोटे से कार्य ने एक अभियान का रूप ले लिया।

एक दिन सुबह रूपेश को उनके स्कूल के बाहर एक नन्हीं सी जान मिली जिसे कोई निर्दयी वहाँ छोड़कर चला गया था, जब भीड़ जमा होने लगी तभी रूपेश को पता चला कि कोई 3 महीने की बच्ची को छोड़कर चला गया है तब उन्होंने फौरन बच्ची को अपनी गोद में लिया और पुलिस में एफ.आई.आर दर्ज कराकर बच्ची को अपने संरक्षण में ले लिया। पास ही रहने वाली एक महिला की सहायता से उन्होंने उस बच्ची की परवरिश का जिम्मा ले लिया। रूपेश ने उस बच्ची का नाम रखाक्रांति, क्योंकि क्रांति ने ही उन्हें एक नए मिशन को प्रारम्भ करने की प्रेरणा दी थी। रूपेश भावुक होते हुए कहते हैं कि “मैंने उस नन्ही सी जान को अपनी बेटी बनाया है और उसका नाम मैंने क्रांति इसलिए रखा है, क्योंकि मैं उसे ऐसा बनाना चाहता हूँ जो समाज के लिए मिसाल हो। और भविष्य में कोई किसी भी बच्ची को इस तरह बेसहारा छोड़ने की हिम्मत ना करे।

क्रांति के आने के बाद ही रूपेश ने अपने स्कूल परिसर में एक अनाथाश्रम शुरू किया। तभी उनकी नजर एक बुजुर्ग महिला पर पड़ी जो शायद अपनों की मारी थी, उसके पास पहनने को कपड़े तक नहीं थे। एक कबाड़ भरा कमरा उसका घर था। रूपेश से उनकी यह स्थिति देखी नहीं गई और उन्होंने उस महिला को अपने साथ चलने को कहा पर वह महिला किसी भी वृद्धाश्रम में रहने को तैयार नहीं थी। रूपेश कहते हैं किवो बहुत स्वाभिमानी महिला है, मैंने उन्हें भरोसे में लेने के लिए रोज मिलना और काफी देर तक बातचीत करना शुरू किया। फिर उन्हें भरोसा दिलाया कि उन्हें एक अच्छा सा किराए का कमरा दिलाया जायेगा जहां वो आराम से रह सकती हैं।अपने ज़माने में सिविल इंजीनियर रही वह महिला आज स्वाभिमान से कहती हैं कि “मैं किसी वृद्धाश्रम में नहीं अपने घर में रहती हूँ।रूपेश कहते है वे महिला गाने की बहुत शौक़ीन है और मरने से पहले अपने गीतों का एक एलबम लॉन्च करना चाहती है।

कुछ ही समय बाद उन्हें अस्पताल में एक और महिला मिलीपता करने पर मालुम हुआ कि वो महिला सड़क किनारे भीख माँगा करती थी और एक दिन वाहन से टक्कर होने की वजह से वो घायल हो गयी। अस्पताल वालों ने रूपेश से सम्पर्क कर उस महिला को उनके संरक्षण में सौंप दिया और रूपेश ने भी अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए उनकी देखभाल की जिससे वे जल्दी ही स्वस्थ हो गयी और आज रूपेश के वृद्धाश्रम में ही रहती है।

आज रूपेश की संस्था के पास 10 वर्ष से कम उम्र के 9 बच्चे है। इन 9 बच्चों की भी अपनी अलग कहानी है कुछ आदिवासी है, तो किसी के सर से माँ पिता का साया उठ गया है, किसी के पास भोजन नहीं था, तो अपने बच्चों को शिक्षा देने में असमर्थ थे। उन सभी बच्चों को आज समाज की मुख्यधारा से जोड़ने का काम कर रहे है रूपेश। आज रूपेश की संस्था में बच्चे रहनेखाने के साथसाथ पढ़ते हैं, खेलते हैं और कम्प्यूटर की शिक्षा भी प्राप्त कर रहे हैं और इतना ही नहीं बच्चों के भविष्य के लिए संस्था नित नई बेहतर योजनाएं के निर्माण के लिए सतत प्रगतिशील है जहाँ बच्चों को उच्च शिक्षा के साथ बेहतर जीवन-यापन के लिए काबिल बनाने के लिए तैयार किया जा रहा है।

सबसे खास बात यह है की रूपेश अभी इस अनाथालय और वृद्धाश्रम को अपने और अपनी पत्नी के वेतन से चलाते हैं। आने वाले समय में वे सैकड़ों बच्चों को सहारा देना चाहते हैं। उनका सपना है कि वे आदिवासी बच्चों की उच्च शिक्षा और प्रशासनिक सेवा में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने में जी जान लगा दें। जिससे भविष्य में वे एक स्वस्थ विचारवान और सशक्त राष्ट्र का निर्माण करे।

अपनी छोटी-छोटी कोशिशों से बदलाव की जो बयार रूपेश ला रहे हैं वह सच में काबिले तारीफ़ है। रूपेश रंगाराव पाटिल जैसे शिक्षक ही सही मायनों में देश में क्रांति लाएंगे। गर्व है हमे रूपेश की सोच पर जिन्होंने आज भी मानवीय मूल्यों को सहेज कर रखा है।

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