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बूढ़ी माँ को रोटी बनाने की समस्या से परेशान देख इस 12वीं पास युवक ने बनाया शानदार रोटी मेकर

दुनिया भर में लोग पारंपरिक तरीके से रोटी बनाते हैं। रोटी बनाना एक कला है लेकिन इसमें विज्ञान भी कम नहीं। सही आकार और स्‍वाद की अच्‍छी रोटी का सही अनुभव एक माँ के पास ही होता है। माँ के हाथों की रोटी का अानंद ही कुछ अलग है। परंतु रोटी पकाने से पहले सही आकार में बेल कर गोल बनाना हाथों को थका देने वाला हिस्सा होता है। यदि यह काम आसान हो जाए तो माताओं को कितनी राहत मिलेगी और माँ के आराम को देखकर बच्चों के लिए रोटी का स्वाद दोगुना हो जाएगा।

ग्रामीण इलाकों में पारंपरिक तरीकों से रोटी बनाना बहुत मेहनत का काम है। हमारी आज की कहानी जिस व्यक्ति की है उन्होंने अपनी माँ और गांव की कई अन्य महिलाओं को घरों में रोटी बनाते हुए मुश्किल का सामना करते देखा। बड़े परिवार होने की वजह से गांव की औरतों को काफी ज्यादा रोटियां बनानी पड़ती हैं। इस बात से परेशान होकर उसने तय किया कि वे कुछ ऐसा बनाएंगे जिससे कि रोटी बनाना आसान हो सके। इसीलिए रोटी मेकर बनाने के लिए उन्होंने काम करना शुरू किया।

कर्नाटक के चित्रदुर्ग के छोटे से गांव बुक्कासागर के रहने वाले बोम्‍मई एन. जिन्हें वास्तु नाम से भी लोग जानते हैं, ने एक ऐसा अनोखा रोटी मेकर मशीन का ईजाद किया है जिससे कि रोटियां बेलना और बनाना बिल्कुल आसान हो गया है। 1 घंटे में 180 रोटियां बनाने की क्षमता वाली इस मशीन से उनकी माँ को बहुत आराम और खुशी मिल रही है। इससे और भी महिलाओं को रोटी बनाने की थका देने वाली मेहनत से निजात तो मिलेगा, साथ ही रोटियों का आकार और स्वाद बिल्कुल वैसा ही बना रहेगा।

कर्नाटक के छोटे से गांव के रहने वाले 40 वर्षीय बोम्‍मई के पिता नागराजप्पा, खेतीहर मजदूर हैं और दूसरे के खेतों में दिहाड़ी पर काम करते हैं और माँ रुद्रम्मा, गृहिणी है। बोम्मई को रोटियां बहुत पसंद हैं। उनकी मां बड़े प्यार से उनके लिए रोटियां बनाती पर बोम्मई, उनकी यह कठिनाई समझते थे। बूढ़ी हो रही उनकी माँ के लिए यह मुश्किल हो रहा था। रोटी बेलते वक्त काफी सारा सूखा आटा भी इधर-उधर फर्श पर बिखर जाता था। जिसे वे ढ़ेर सारे अखबारों से पोछकर साफ करती। यह देख उन्होंने कुछ ऐसा बनाने का सोचा जो रोटी बनाने के काम को आसान कर सके। बोम्मई की रोटी मेकर मशीन सौर ऊर्जा और एसी करंट दोनों से चलती है। इसकी लागत 15 हज़ार रुपए आई है। इसे ऑपरेट करना आसान है। इसका आकार किसी सामान्‍य इंडक्‍शन की तरह ही है और वज़न 6 किलो है।

केनफ़ोलिओज़ से बातचीत में उन्होंने बताया, “रोटी बनाने का काम राज्य भर में बढ़ रहा है और मुझे लगा कि यह मशीन बड़े परिवारों और छोटी इकाइयो के होटलों में मदद करेगी जो बड़ी मात्रा में चपाती तैयार कर लेते हैं।”

आर्थिक तंगहाली के कारण वे अपनी पढ़ाई जारी नहीं रख सके और 12वीं के बाद उन्हें पढ़ाई छोड़नी पड़ी। उन्होंने एक छोटी सी अपनी साइकिल मरम्मत की दुकान से शुरुआत की। मगर बदलते समय के साथ साइकिल का उपयोग सीमित होता चला गया और उन्हें यह काम बंद करना पड़ा। अभावग्रस्त बोम्मई ने खेती के उपकरणों की मरम्मती करने से शुरुआत की और एक वेल्डिंग शाॅप खोला। आज उनके पास लाइसेंस प्राप्त वर्कशाॅप है जिसमें वे नई-नई मशीनें बनाया करते हैं। प्रारंभ से ही उनका रुझान नए प्रयोगों की ओर रहा। वे ग्रामीण क्षेत्रों में गृहस्‍थी के कामों में कम परिश्रम लगे ऐसी उपयोगी चीज़े बनाना चाहते हैं।

इससे पहले उन्होंने एक ऐसा कोयले का चुल्हा बनाया जिसमें कोयले की खपत 80 प्रतिशत तक कम होती है और इससे प्रदूषण भी कम होता है। पानी गरम करने के लिए उनके घर में पुराने स्टाइल के चुल्हे का इस्तेमाल होता था। जिसके लिए उनकी मां को काफी संघर्ष करना पड़ता और घर में धुआं भी खूब होता था। इससे बचने के लिए बोम्मई ने पर्यावरण के अनुकूल चूल्हा बनाया।

उन्होंने बताया, “एक छोटे सड़क किनारे के होटल में गैस सिलेन्डर का इस्तेमाल किया जाता था। हर महीने 3 से 4 सिलेन्डरों की खपत थी। जब उसने मेरे इस चूल्हे के बारे में सुना तो उसने इसे खरीदा और लकड़ी का प्रयोग करना शुरु किया। इससे उसकी लागत बहुत कम हो गई और फायदे में काफी इजाफा हुआ। जिससे वह बहुत खुश हैं।”

इसमें एक एयर फिल्टर भी लगा है, जिससे पहले के मुकाबले सिर्फ 20 प्रतिशत धुआं निकलता है। गांव वालों ने इसे इतना पसंद किया कि वे अब तक 50 चूल्हा बनाकर बेच चुके हैं। बोम्मई के कोयले वाले चुल्हे की लागत मात्र 2600 रुपये है। मगर इससे गैस सिलेंडर के मुकाबले कम से कम प्रदूषण में अधिक से अधिक पैसे की बचत होती है।

सामान्य घरेलू कामों की कठिनाइयों को दूर करने के लिए वे नई नई खोज करते हैं और गांव वालों की मदद करने के बारे में सोचते रहते हैं। बोम्मई अपने द्वारा विकसित उपकरणों को बड़े स्तर पर और भी उन्नत बनाना चाहते हैं। लेकिन आर्थिक रुप से वे थोड़े मजबूर हो जाते हैं। वे इसके लिए किसी सरकारी या गैर सरकारी से मदद की आशा करते है जिससे वे अपने उपकरणों को और बेहतर और सस्ता बना सकें। धुंआहीन चूल्हा और रोटी मेकर को अच्छे से डेवलप करना चाहते हैं। जिससे की ग्रामीण आबादी को और भी लाभ पहुंच सके।

बोम्मई के आविष्कारों ने यह साबित कर दिया है कि अनुसंधान इंजीनियरिंग काॅलेज और अनुसंधान केन्द्रों तक ही सीमित नहीं है। ग्रामीण इलाकों में हो रहे इस प्रकार के आविष्कारों को और बढ़ावा देने की आवश्यकता है। ग्रामीण नवाचारों के प्रोत्साहन से बोम्मई जैसे कई प्रगतिशील उद्यमियों के साहस और उत्साह बढ़ेगा और विभिन्न प्रयोगों के उपकरणों और संयंत्रों के निर्माण का मार्ग प्रशस्त होगा और देश में एक नए औद्योगिक क्रांति की शुरुआत होगी।

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