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पत्रकारिता छोड़ बनाया बैंक, जहाँ पैसे नहीं रोटी मिलती है, रोजाना हजारों लोगों का भरते हैं पेट

आज भारत उन देशों में है जहाँ गरीबी और भुखमरी सर्व व्याप्त है। हर चौक-चौराहे, मंदिर-मस्जिद, बस-ट्रेन कोई भी ऐसी जगह नहीं होगी जहाँ आपको भिखारी ना मिले। यह हमारे देश में बढ़ रही गरीबी को समझने के लिए काफी है। ना जाने ऐसे कितने लोग हैं जिनको दो जून की रोटी भी नसीब नहीं हो पाती। इसी दर्द को एक पत्रकार देख नहीं पाया है और खोल दिया एक बैंक। जहाँ पैसे नहीं, रोटी दी जाती है।

कौन हैं तारा पाटकर

लखनऊ से लगभग 230 किलोमीटर दूर बुंदेलखंड के महोबा में पत्रकार से सामाजिक कार्यकर्ता बनेे इस शख्स का नाम है ‘तारा पाटकर’। 46 साल के तारा जिसने पत्रकारिता की नौकरी छोड़, अपने गृहनगर के लोगों को भोजन, चिकित्सा सुविधाएं और सामाजिक समन्वय लाने के कामों में जी जान लगाने का एक साहस भरा कदम उठाया।

2014 में पत्रकारिता छोड़ बनाया ‘रोटी बैंक’

तारा पाटकर ने 2014 में अपने पत्रकारिता के कैरियर को छोड़ दिया और हर रोज ज़रूरतमंदों को खिलाने का एक अनूठा प्रयास शुरू किया। उन्होंने ‘रोटी बैंक’ के माध्यम से महोबा जिले में भूखे और बेघर गरीबों को मुफ्त भोजन प्रदान करना शुरू किया। रोज़ाना, उनकी टीम 1,000 से ज्यादा जरूरतमंद लोगों को खिलाती है।

लोग जुड़ते गए, कारवां बढ़ता गया 

तारा बताते हैं कि जब हम रोटी मांगते बच्चों, बूढों को देखते थे तो लगता था सारी आदर्शों की बाते बेकार है। इसके बाद दस घरों से दो रोटी और सब्जी जमा होना शुरू हुई। चौराहों, रेलवे स्टेशन, बस स्टेशन जैसी जगहों पर 20 से 25 भूखे गरीबों को हर रोज खाना खिलाने की शुरुआत हुई, लेकिन लोग आते गये कारवां बढ़ता गया। आज लगभग 800 घरों से रोटियां आती हैं और करीब 1000 से अधिक लोगों का पेट इससे भरता है।

तारा पाटकर ने 15 अप्रैल 2015 को महोबा जिला मुख्यालय में पहली बार रोटी बैंक की स्थापना की थी। पर आज महोबा के बाद इंदौर, छतरपुर, ललितपुर, दिल्ली, बेंगलुरु, हैदराबाद, लखनऊ, आगरा, हमरीपुर, औरई, हजारीबाग और गुजरात के कुछ इलाकों तक रोटी बैंक अपनी सेवा दे रहा है और भूखों का पेट भर रहा है।

पर्यावरण को लेकर भी हैं काफी गंभीर

पाटकर सिर्फ़ रोटी बैंक से ही प्रसिद्ध नहीं है। उन्होंने तमाम ऐसे समाजक मुद्दों को भी उठाया जो जरुरी थे। वह इसके लिए सरकार से भी लड़ते रहे। तारा पर्यावरण के बहुत ही बड़े प्रेमी है, उन्होंने पर्यावरण के किये कई बार आवाज़ उठाई। वर्ष 2014 में उन्होंने सरकार से अपनी बात मनवाने के लिए 9 दिनों का जल सत्याग्रह किया। दरअसल गोमती में 27 गंदे नाले गिरते थे जिससे पर्यावरण को ख़ासा नुकसान हो रहा था। तारा पाटकर के इस सत्याग्रह के आगे सरकार ने घुटने टेक दिए और नालों को बंद करवाया।

पर्यावरण को बचाने के लिए लखनऊ में बनवाया साइकिल ट्रैक

डीज़ल और पेट्रोल गाड़ियों से हो रहे प्रदूषण को रोकने और शहर में साइकिलिंग को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने अनेको प्रयास किये। उन्हीं के अथक प्रयासों की वजह से लखनऊ के प्रमुख मार्गों पर सरकार ने साइकिल ट्रैक का निर्माण करावाया।

आज की मतलबी दुनिया में तारा पाटकर जैसे लोग खोजने पर भी नहीं मिलते। इनका प्रयास सच में बेहद अनुकरणीय है। समाज और पर्यावरण के प्रति उनके प्रेम को हमारा सलाम।

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