,

रिक्शा चालक पिता और घरों में काम करने वाली माँ का पुत्र है आज दिल्ली का सबसे तेज अंडर-16 धावक

2 सितम्बर 2017, जहाँ हर कोई ईद के जश्न के मजे ले रहा था वहीं एक लड़का अपने सपनों को पूरा करने की दौड़ लगा रहा था। और उसने ऐसी दौड़ लगाई की पुराने सभी नेशनल रिकार्ड तोड़ दिए। दो स्वर्ण पदक जीतने वाले इस लड़के को जब पदक दिया जा रहा था तो सबकी आँखें टिकी थी कि उसके माँ-बाप इस घड़ी में जरुर वहाँ उपस्थित होंगे। मगर ऐसा नहीं था। आर्थिक तंगी से जूझते पिता उस वक्त रोजमर्रा की घरेलू जरुरतों को पूरा करने के लिए रिक्शा खींच रहे थे और माँ घरों में बर्तन माँज रही थी।

अंडर 16 के धावक निसार अहमद जब छत्रसाल स्टेडियम में दिल्ली स्टेट एथलेटिक्स प्रतियोगिता में दौड़े तो उन्होंने न सिर्फ 100 और 200 मीटर स्प्रिंट प्रतियोगिता में स्वर्ण हासिल किया बल्कि अंडर 16 आॅल इण्डिया रिकार्ड भी पीछे छोड़ दिया। निसार ने अंडर 16 में 100 मीटर में एम.एस. अरुण के 2013 के रिकार्ड को 0.01 सेकेण्ड से और इसी साल 200 मीटर में चन्दन बाउरी के रिकार्ड को 0.03 सेकेण्ड के रिकार्ड से तोड़ा। 100 मीटर रेस 11 सेकेण्ड में और 200 मीटर की रेस तो निसार ने 22.08 सेकेण्ड में पूरा किया।

जब वह तंग गलियों से होता हुआ अपने स्लम पहुंचा और दोस्तों को रिकार्ड तोड़ने की खबर दी तो सभी को निसार की इस सफलता पर बहुत गर्व हुआ। बहन यह खबर सुन कर भावुक हो उठी। हालांकि निसार के माता पिता को उसके उपलब्धियों के बारे में बहूत समझ तो नहीं है पर वे अपने बेटे की खुशी में बहूत खुश हैं और उसके इस जुनून को पूरा करने के लिए अपना हर संभव प्रयास करते हैं।

15 साल के निसार अब दिल्ली के सबसे तेज धावक हैं। आजादपुर रेलवे ट्रैक के पास बड़ा बाग स्लम के 10X10 के कमरे में अपनी बड़ी बहन और माता-पिता के साथ रहते हैं। एक सबसे बड़ी बहन का विवाह हो चुका है। इसी कमरे में एक ओर स्लैब लगा कर किचन बनाया हुआ है। एक कोने में टीवी लगा है तो दूसरी ओर निसार की जीती हुई ट्राॅफीयाँ रखी हुई है जो 2015 में स्कूल नेशनल गेम्स में बेस्ट एथलिट के लिए मिले थे। कमरे में एक छोटा कुलर भी है। कमरे में हवा आने जाने का कोई रास्ता नजर नहीं आता है।

निसार के पिता, जिन्हें लोग नन्कू के नाम से जानते हैं वो एक रिक्शा चालक हैं। वे अपने रिक्शे से कन्स्ट्रकशन मैटीरीयल बिल्डिंग साईटस तक पहुँचाते हैं। इससे उन्हें 200 रुपये तक की प्रतिदिन कमाई हो जाती है और महीने में अधिकतम 7,000 रुपये की आमदनी होती है। घर की माली हालात में मदद के लिए निसार की माँ, शफीकुनिशा घरों में बर्तन माँजने का काम करती है। नन्कू अपने बेटे को स्टेडियम में दौड़ते हुए देखना चाहते हैं। मगर इससे उनके एक रोज की कमाई नहीं हो पाएगी और घर के हालात उन्हें सहूलियत की इजाज़त नहीं देता है। आर्थिक चुनौतियों के बावजूद उनके पिता उन्हें एक बड़े एथलिट बनने का सपना देखते हैं।

निसार के पिता के एक पाँव में 20 सालों से गहरा जख्म है। जो दर्द करता है मगर रिक्शा चलाने के अलावे उनके पास कोई और दूसरा विकल्प नहीं है। निसार की माँ शफीकुनिशा को भी कभी गिरने के कारण लगी चोट के कारण चलने फिरने में थोड़ी परेशानी होती है फिर भी घरों के काम की मशरुफियत से फुर्सत नहीं रहती। मगर वह अपने बेटे की खुशी में खुश रहती हैं और हर तरह से बेटे की लालसा पूरी करने में समर्थन करती हैं और निसार को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती रहतीं हैं, बिना घर की चिंता किए। उन लोंगों का प्रयास रहता है कि निसार को अच्छी खुराक मिले ताकी वो फिट रहे। इसके लिए सप्ताह में कम से कम एक बार मीट का इंतजाम हो जाए इसके लिए वे कोशिश करतीं है। फलों के बंदोबस्त का भी वे हमेशा कोशिश करती हैं। निसार अपनी माँ को अपने खेल के बारे में लगातार बताते रहते हैं। हालांकि शफीकुनिशा टीवी पर कभी-कभी क्रिकेट देखती हैं। मगर मोबाईल पर अपने बेटे को वीडियो देखकर काफी खुश होती हैं।

अशोक नगर के सरकारी स्कूल के शारीरिक शिक्षा के शिक्षक सुरेन्द्र सिंह ने निसार को धावक बनाने के लिए प्रेरित किया। श्री सिंह ने जब निसार को दौड़ते हुए देखा तो उसकी प्रतिभा को पहचान कर उन्हें एथलेटिक्स में भाग लेने की सलाह दी। उस वक्त निसार के पास न तो रनिंग शूज थे न ही ट्रैक पैंट। निसार के कोच उसे अंडर 14 इंटर जोनल ईवेंट में ले गये जहाँ उसने अपने प्रतियोगियों को आसानी से हरा दिया और तीन गोल्ड जीते और रिकार्ड भी बनाया। इंटर जोन जीतने के बाद आॅल इंडिया स्कूल प्रतियोगिता में क्लीवालिफाई किया। केरल में हुई इस प्रतियोगिता के पहले दिन 400 मीटर में कांस्य पदक जीता, दूसरे दिन गोल्ड और तीसरे और चौथे दिन भी मेडल अपने नाम किया। 2016 में दिल्ली अंडर 16 में अच्छा प्रदर्शन कर गोल्ड और सिल्वर जितने के बाद गेल इण्डिया ने निसार को स्पाॅन्सर करते हुए कुछ पैसे भी दिए। निसार अब गेल इण्डिया स्प्रिंट स्टार के नाम से भी जाना जाता है। निसार 3 सालों से बकायदा कोच सुनिता राय से छत्रसाल स्टेडियम में प्रशिक्षण लेता है। सुनिता इसके लिए निसार से कोई फीस नहीं लेतीं हैं। घर से 1 किलोमिटर दूर स्टेडियम में रोज सुबह 5 बजे वह प्रैक्टिश करने पहूँचता है फिर घर आ कर खाना खा कर स्कूल जाता है। निसार की रुटिन लाईफ सेट हो गई है। मगर निसार अहमद की आँखों एक ही सपना रोज पल रहा है और बड़ा हो रहा है कि वह एक दिन देश के लिए दौड़ेगा।

निसार अहमद अपनी क्षमता को अपनी मेहनत से चार चाँद लगा रहें हैं। वे एथलेटिक्स को अपनी मुसीबतों और गरीबी दूर करने का साधन मानते हैं। उनके माता पिता भी उनके सपनों को पूरा करने की जी तोड़ कोशिश कर रहे हैं।ऐसे में सभी का सहयोग भी निसार के हौंसलों को बुलंद कर रहा है। खेल को करियर के रुप में अपनाना हिन्दुस्तान में एक बहुत बड़ी चुनौती है। ऐसे में आर्थिक रुप से पिछड़े निसार और उसके परिवार की यह कोशिश अत्यंत ही सराहनीय है। बच्चे की प्रतिभा, क्षमता और शौक के अनुरुप करियर चुनने और बनाने में माता-पिता का सहयोग सबसे आवश्यक तत्व है। निसार अहमद और उसके माता-पिता के सपने एक दिन जरुर सच होंगें जब वह देश के लिए दौड़ेगा।

आप अपनी प्रतिक्रिया नीचे कमेंट बॉक्स में दे सकते हैं और इस पोस्ट को शेयर अवश्य करें

आपका कमेंट लिखें