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एक ऐसे IAS ऑफिसर जिन्होंने स्वच्छता अभियान को सफल बनाने के लिए शुरू कर दी शौचालयों की सफाई

कुछ लोग अपने अनुकरणीय कार्यों के द्वारा समाज में एक मिसाल पेश करते हैं। उनके ज़मीनी आचरण और विचारधारा ही लोगों को प्रेरित करने के लिए काफ़ी होते हैं। तभी तो देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने चम्पारण सत्याग्रह के शताब्दी मौके पर मीडिया के कैमरे को उस शख्स पर फोकस करने को कहा और उनके काम की तारीफ भी की।

सीनियर आईएएस ऑफिसर परमेश्वरन अय्यर एक ऐसे ही व्यक्ति हैं, इनकी वाणी से ज्यादा इनका काम बोलता है। हाल ही में इस स्वच्छता विशेषज्ञ आईएएस ने तेलंगाना के एक गांव में टॉइलेट-पिट साफ कर लोगों को यह मैसेज दिया कि कोई भी काम छोटा नहीं होता अगर आप इसे अच्छे के लिए करें तो।

अय्यर 1981 बैच के आईएएस ऑफिसर हैं। वह उत्तर प्रदेश काडर में रहे हैं। वे मूलरूप से  तमिलनाडु के रहने वाले हैं। आईएएस रहते हुए 80 के दशक में वे यूनियन मिनिस्ट्रीस ऑफ़ डिफेंस और टेक्सटाइल्स में काम कर चुके हैं। उसके बाद वे यूपी के बिजनौर जिले में कलेक्टर के रूप में और जिला मजिस्ट्रेट के रूप में सेवाएं दे चुके हैं।

अय्यर ने यूनाइटेड नेशन के वर्ल्ड फ़ूड प्रोग्राम में आठ साल का (1998 -2006) लम्बा समय बिताया, जहाँ उन्होंने जल-आपूर्ति और स्वच्छता के क्षेत्र में अपनी विशेषज्ञता विकसित की। वहां उन्होंने एक सीनियर जल आपूर्ति और स्वच्छता विशेषज्ञ के रूप में काम किया।

आख़िर जून 2009 में उन्होंने वॉलंटरी रिटायरमेंट ले लिया और वर्ल्ड बैंक के सफाई अभियान से जुड़ गए। उन्होंने वहां प्रोग्राम लीडर के रूप में काम किया और हनोई ऑफिस में जल आपूर्ति और स्वच्छता विशेषज्ञ का कार्यभार संभाला।

जब उन्हें स्वच्छ भारत अभियान के बारे में सूचना दी गई तब उन्होंने यूएस से वापस आकर इस अभियान का नेतृत्व किया। 3 फरवरी 2016 में सरकार ने अय्यर को जल आपूर्ति और स्वच्छता मंत्रालय में सयुक्त सचिव की जिम्मेदारी सौंपी। उन्हें जल आपूर्ति और स्वच्छता विभाग में 20 सालों  का पहले से ही अनुभव है।

18 फरवरी को 56 वर्षीय अय्यर वारंगल जिले के गंगदेवीपल्ली गांव में विजिट करने गए। वे यहाँ ट्विन-पिट टॉयलेट टेक्नोलॉजी के सिद्धांत का अध्ययन करने गए थे जिसमें बहुत ही कम समय में मानव-मल और मूत्र को खाद में बदला जाता था और इससे खुले में शौच का उन्मूलन करने में मदद मिलती है। गांव वाले इस टेक्नोलॉजी का उपयोग 16 सालों से कर रहे थे।

इस ट्विन-पिट टॉयलेट टेक्नोलॉजी में, हर टॉयलेट में दो छेद होते हैं जो खुदे हुए और सीमेंटेड होते हैं। जब पहला पिट मानव मलमूत्र से भर जाता है तो उसे बंद कर दिया जाता है। तब गांव वाले दूसरे पिट का उपयोग करते हैं। छह महीने बाद जब दूसरा पिट भर जाता है तब तक पहले पिट का मानव मलमूत्र डिकम्पोस हो कर सूख जाता है और खाद में बदल जाता है। पिट को खाली कर फिर से उसका उपयोग किया जाता है।

गांव से विजिट करने के बाद अय्यर ट्वीट करते हैं, “ट्विन-पिट टॉयलेट को खाली कराना पूरी तरह से स्वच्छ और सुरक्षित है। आज @swachhbharat टीम गंगदेवीपल्ली गांव से जुड़ी।”

अय्यर ने बताया, “यह टॉयलेट न केवल किफायती और पूरी तरह से सुरक्षित है बल्कि इसमें अपशिष्ट पदार्थ का खाद के रूप में उपयोग भी होता है। किसान इसे अपने खेतों में खाद के रूप में उपयोग करते हैं। सेप्टिक टैंक न केवल मंहगा है बल्कि असुरक्षित भी है। इसलिए ग्रामीण इलाकों में केवल ट्विन-पिट टॉयलेट ही सही चयन है।”

इसके उपयोग से खुले में शौच का भी पूरी तरह से उन्मूलन हो सकता है। इस टेक्नोलॉजी के बारे में बताते हुए अय्यर ने पिट के ढक्कन को खोल दिया और उसके अंदर चले गए और उसमें से सूखे हुए मल जो अब खाद में बदल चुका था, को बिना ग्लब पहने अपने हाथों से बाहर निकालने लगे। यह उन 40 ब्यूरोक्रेट्स के लिए आश्चर्य का विषय था जो उस दिन उनके साथ थे। हिंदुस्तान टाइम्स को बताते हुए वारंगल के रूरल जॉइंट कलेक्टर प्रशांत जीवन कहते हैं, “कुछ समय के बाद सभी ने सफाई में हिस्सा लिया। उन्होंने सभी के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत किया कि सफाई का काम केवल सेवक का नहीं होता।”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने शो “मन की बात” में अय्यर के कामों के प्रति अपना आभार व्यक्त किया। “टॉयलेट पिट खाली करने का यह जल आपूर्ति और स्वच्छता मंत्रालय द्वारा किया गया काम असाधारण है।”

अय्यर ने यह दिखा दिया है कि भले ही आप जीवन में कहीं भी पहुंच जाएँ, समाज की बेहतरी के लिए किये जाने वाले काम के लिए आपको ज़मीनी होने की ज़रूरत है। उनके द्वारा किया गया स्वच्छ भारत का यह काम सचमुच अविश्वसनीय है। हम आशा करते हैं कि ज्यादा संख्या में, और खासकर हमारे युवा, आगे आएं और इस अभियान को आगे बढ़ाकर स्वच्छ भारत के सपने को एक मूर्त आकार देने में अपना योगदान करें।

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