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विदेश मंत्रालय की नौकरी छोड़ गाँव के गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा देकर बना रहे देश का भविष्य

विद्या के दान को ही सर्वोत्तम दान कहा जाता है। भोजन, रुपया और संपत्ति तो क्षणिक होते हैं और कभी न कभी खत्म हो जाते हैं लेकिन शिक्षा जीवन के हर मोड़ पर काम आती है। अगर किसी को विद्या दान दिया जाए तो इससे बड़ा पुण्य कोई दूसरा नहीं है, क्योंकि शिक्षित व्यक्ति एक सभ्य समाज का निर्माण करने में अहम भूमिका निभाता है।

लेकिन आज के युग में शिक्षा या ज्ञान को कोई मुफ़्त में नहीं बाटना चाहता। शिक्षा आज एक खुला व्यापार बन गया है। जहाँ नाम के हिसाब से अगल-अलग दाम तय होते हैं। गरीबों के लिए क़्वालिटी एजुकेशन प्राप्त कर पाना आज बहुत मुश्किल हो गया है। इसी दर्द को समझा बिहार के एक नौजवान राजेश कुमार सुमन ने और गरीबों को निः शुल्क शिक्षा देने की ठानी।

कौन हैं राजेश

राजेश कुमार सुमन बिहार के समस्तीपुर जिले के रोसड़ा गाँव के निवासी है। इनका जन्म एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। एक ग्रामीण परिवेश से होने के वाबजूद राजेश को पढाई में बहुत रूचि थी।राजेश नें इतिहास से स्नातकोत्तर किया है। राजेश अभी अपने गाँव में बी.एस.एस क्लब नमक शिक्षण संस्थान चलाते हैं, जहाँ गरीबों को निः शुल्क प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी करवाई जाती है।

कैसे शुरू हुआ सफ़र

राजेश ने देखा कि उनका गाँव एक काफी पिछड़ा हुआ इलाका है। जहां के छात्रों को उचित मार्गदर्शन नहीं मिल पा रहा है। होनहार छात्र भी पैसे के आभाव में अपनी पढ़ाई अधूरी छोड़ काम-धंधे में लग रहा है। आसपास कोई ऐसी संस्थान नहीं है जहाँ लोगों को परीक्षाओं के लिए तैयार किया जाये। फिर राजेश ने सोचा कि क्यों न वे समस्तीपुर में एक ऐसा इंस्टीट्यूट खोलें जहां वे छात्रों को विभिन्न प्रतियोगिताओं के लिए तैयार कराया जाए और उनका भविष्य संवारा जाए। फिर उन्होंने कुछ मित्रों के साथ बीएसएस क्लब को खोलने का मन बनाया और 2008 में इसकी नींव रखी।

छोड़नी पड़ी सरकारी नौकरी

राजेश जब अपनी संस्थान चला रहे थे उसी दौरान 2011 में उनकी नौकरी मिनिस्ट्री ऑफ़ एक्सटर्नल अफेयर यानी विदेश मंत्रालय में बतौर कलर्क लग गई। घर-परिवार वालों ने भी जॉब ज्वाइन करने को कह दिया। फिर राजेश भी अपने संसथान का सारा जिम्मा अपने दोस्तों को देकर जॉब ज्वाइन करने मुम्बई चले गए। उनके जाने के बाद उनके संसथान में पढ़ाई का स्तर थोड़ा घटने लगा था और कुछ छात्र भी संस्थान छोड़ने लगे थे। जब राजेश को इसका पता चला तो उनको उन बच्चों और गरीबों के भविष्य की चिंता सताने लगी। फिर राजेश ने घर वालो के लाख समझनें के बावजूद नौकरी छोड़ वापस गाँव आने का फैसला किया और वापस आकर संस्थान का सारा काम अपने कन्धों पर ले लिया।

गरीबों, लड़कियों और दिव्यांगों को मुफ़्त शिक्षा

राजेश का मानना है की उनके आसपास का कोई भी छात्र सिर्फ पैसे की वजह से शिक्षा से दूर नहीं रहना चाहिए। वैसे छात्र-छात्रा जो सुविधा के आभाव में प्रतियोगिता परीक्षा की तयारी नहीं कर पाते और अपना भविष्य नहीं बना पाते उनको वह मुफ़्त में शिक्षा देंगे। उन्होंने प्रधानमंत्री जी की बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ योजना का भी जिक्र किया और कहा की हम बेटियो के लिए ख़ास अलग बैच भी चलाते हैं। राजेश गरीबों के अलावा दिव्यांगों को भी प्रतियोगिता परीक्षा की मुफ़्त तैयारी करवाते है।

सामूहिक सहयोग से चलती है संस्था

केनफ़ोलिओज़ से खास बातचीत में राजेश ने बताया की हमारी संस्था गाँव और आसपास के कुछ लोगों के आर्थिक सहयोग से चलता है। उनकी टीम में उनके अलावा 4-5 और भी लोग हैं जो उनके संसथान के बच्चों को पढ़ते है। सारे शिक्षक भी किसी तरह का पैसा नहीं लेते हैं।

कई जगह हो चुके हैं सम्मानित

राजेश के इस सामाजिक काम को कई जगह सराहा जा चूका है। लोग दूर दूर से उनको बधाई देने भी आते रहते हैं। ललित नारायण मिथिला यूनिवर्सिटी भी उन्हें उनके काम के लिए सम्मनित कर चुकी है। अभी 7 अक्टूबर को ही दिल्ली के हंसराज कॉलेज ने उन्हें बेस्ट यंग टीचर के अवार्ड से भी सम्मनित किया है।

अभी राजेश के संस्थान में करीब 300 बच्चे शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। राजेश बताते हैं कि बहुत सारे गरीब और बेसहारा छात्र आज उनकी संसथान से पढ़कर आज अच्छी-अच्छी जगह नौकरी कर रहे है और अपने पैरों पर खड़े हैं।

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