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पाँचवीं पास शख्स को मिला ‘पद्मश्री’ सम्मान, इनके कारनामे जानकर आप भी करेंगे सैल्यूट

भारत कई दशकों से अपनी वस्त्र बुनाई के लिए जाना जाता है। हमारे देश में ब्रिटिश शासन आने से पहले, भारतीय वस्त्र, दुनिया के बहुत से हिस्सों में निर्यात किए जाते थे और उनकी गुणवत्ता भी बहुत उम्दा होती थी। ब्रिटिश शासन के चंगुल से स्वतंत्र होने के बाद, देश ने विकास की ओर पहला कदम रखा। हालांकि भारतीय बुनकरों का संघर्ष यहीं पर समाप्त नहीं हुआ, उन्हें अभी भी बहुत सी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। विदेशी आयातों और मशीन से बने कपड़ों से उनको प्रतिस्पर्धा करनी होती है।

हमारे देश में ऐसे बहुत से परिवार हैं जिनकी आमदनी बुनाई से होती है। ऐसे ही एक परिवार में चिंताकिंदी मल्लेशम, कठिन परिश्रम को देखते हुए बड़े हुए। वह हमेशा से अपने परिवार के कष्टों से सबक लेना चाहते थे। आज चिंताकिंदी ने हजारों लोगों की जिंदगियां बेहतर बनाने के उद्देश्य से एक ऐसी मशीन का आविष्कार किया है जिसमें बुनाई का समय बहुत कम हो जाता है जैसे एक साड़ी की बुनाई में 6 घंटे लग जाते थे परंतु इस मशीन से केवल 1 घंटे में साड़ी की बुनाई हो जाती है।

43 वर्षीय चिंताकिंदी का जन्म तेलंगाना के अलेर नामक एक छोटे से गांव के एक गरीब परिवार में हुआ था। उन्होंने अपनी पढ़ाई पांचवी कक्षा के बाद छोड़ दी और पारिवारिक बिज़नेस बुनाई में लग गए। उनका परिवार पोचमपल्ली साड़ी की बुनाई करता था, जिसके लिए एक बड़े फ्रेम के सिल्क विंड मीटर की जरूरत होती थी जिसे असू कहा जाता है। इसे करने के लिए काफी मेहनत लगती थी और बुनकर के कमर में अक्सर दर्द रहने लगता था।

चिंताकिंदी ने काम करती हुई अपनी मां के दर्द को देखा था। वह अपनी मां को और दर्द में नहीं देखना चाहते थे। जब उन्होंने अपने परिवार के साथ काम करना शुरू किया, तब निश्चय किया कि वह एक ऐसी मशीन बनाएंगे जिसमें वाइंडिंग का काम ऑटोमेटिक तरीके से पूरा हो पायेगा।

चिंताकिंदी बताते हैं, “पोचमपल्ली साड़ी की बुनाई में असू प्रक्रिया बहुत जरूरी होता है। साड़ी की डिजाइन से इसका कोई लेना देना नहीं होता है, इस प्रक्रिया के बाद ही साड़ी की डिज़ाइन तय होती है। इसे हाथ से करना मतलब एक 12 किलोमीटर धागे को लगभग 9000 बार घुमाना होता है।”

आविष्कार की यात्रा चिंताकिंदी के लिए इतनी आसान नहीं थी। उन्होंने अपने जीवन के 7 साल इसमें लगा दिए और 1992 से 1999 तक लगातार काम करते हुए इस मशीन को बनाने में लगे।

द हिंदू को दिए इंटरव्यू में चिंताकिंदी कहते हैं, “ मैंने सोच रखा था कि असू मशीन के लिए पांच चीजों की जरूरत पड़ेगी। मैंने 3 तो बना लिए परंतु तभी मेरे सामने एक रुकावट आ गई। मेरे पड़ोसी मुझे समय और परिवार के पैसे बर्बाद करने के लिए ताना कसा करते थे।”

उन्होंने अपने परिवार की लगभग सारी पूंजी खर्च कर दी थी और अपनी पत्नी के पैसे भी खर्च करना शुरू कर दिया था। परन्तु उन्हें पता था कि इस प्रोजेक्ट के पूरा होने के बाद सारे पैसे वापस आ जाएंगे। वह हैदराबाद शिफ्ट हो गए और गुजारा करने के लिए एक इलेक्ट्रिशियन का काम करना शुरू कर दिया।

उसके बाद वे अपनी अधूरी मशीन को हैदराबाद लेकर आए और उस पर काम करना शुरू कर दिया। आखिर 1999 में उनकी मेहनत रंग लाई और मशीन तैयार हो गई। चिंताकिंदी ने इसका नाम लक्ष्मी असू मशीन रखा और इसे लेकर अपने गांव आ गए। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया था कि उनका यह प्रयास केवल समय की बर्बादी नहीं थी। जल्द ही स्थानीय मीडिया और पड़ोसियों ने उन्हें हाथों-हाथ लिया।

परंतु उनका संघर्ष यहां पर आकर खत्म नहीं हुआ था। 2005 में स्टील की कीमत अचानक बढ़ गई इसका नतीजा यह हुआ कि मशीन की कीमत में भी बढ़ोतरी हो गई। मशीन की कीमत 13000 से ₹26000 तक पहुंच गया। कीमत ज्यादा होने की वजह से बहुत से बुनकर फिर से अपने पुराने तरीकों में लौट आए।

2009 में चिंताकिंदी ने माइक्रोकंट्रोलर्स और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस की दुनिया में कदम रखा। परंतु कम पढ़े लिखे होने की वजह से इसकी किताबें पढ़ने में उन्हें कठिनाई आई। हालांकि वे इस पढ़ाई के लिए दृढ़ संकल्पित हो गए। इसलिए उन्होंने डिक्शनरी के साथ पढ़ना शुरू किया और सूचनाएं एकत्रित की। जल्द ही उन्होंने अपने मशीन में माइक्रोकंट्रोलर चिप्स और सॉफ्टवेयर कोड उपयोग में लाना शुरू कर दिया। आज उनकी मशीन न केवल विंड यॉर्न्स में मदद करती है बल्कि कपड़ों में बहुत से डिज़ाइन भी बनाती है।

अपने परिवार वालों और दोस्तों से प्रशंसा पाने के बाद चिंताकिंदी को 2009 में राष्ट्रपति सम्मान से सम्मानित किया गया और भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम के द्वारा उनकी मशीन का उदघाट्न किया गया। 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों अमेजिंग इंडियन अवार्ड दिया गया। जनवरी 2017 में चिंताकिंदी को भारत के चौथे सर्वश्रेष्ठ नागरिक सम्मान पद्मश्री से नवाज़ा गया।

चिंताकिंदी ने यह सिद्ध कर दिया कि अगर आप अपने लक्ष्य के प्रति दृढ़ संकल्पित हैं तो सफलता पाने से आपको कोई रोक नहीं सकता; यहां तक कि कम शिक्षा, गरीबी और बहुतेरे चुनौतियां भी नहीं। इन सबके बावजूद उन्होंने आगे बढ़ते हुए न केवल अपना नाम बनाया बल्कि हजारों लोगों के जीवन को आसान बना दिया। केनफ़ोलिओज़ की टीम इस नायक को सलाम करती है और भविष्य के उनके प्रयासों के लिए शुभकामनाएं देती है।

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