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विदेशी नौकरी छोड़ किसानी को गले लगाया, 18×45 की जगह में मशरूम की खेती से हो रही लाखों की कमाई

अपनी काबिलियत के बल पर पढ़ाई कर अच्छी तनख्वाह पर नौकरी पाने के बाद यदि अपनी मातृभूमि का प्रेम वापस बुला ले और अपने साथियों के लिए कुछ करने को प्रेरित करे तो आज की आधुनिक पीढ़ी इसे भावुकता मानेगी। लेकिन कुछ कर गुजरने में यदि आप सफलता की सीढ़ियां चढ़ने लगें तो यह आपका सही निर्णय कहलाएगा। ऐसा ही कुछ हुआ पोस्ट ग्रेजुएट एमबीए डिग्री होल्डर प्रग्‍नेश पटेल के साथ।

मैनेजमेंट स्टडीज में ग्रेजुएशन करने के बाद मुंबई से फाइनेंस एंड मार्केटिंग में एमबीए करते ही प्रग्‍नेश को कैंपस प्लेसमेंट सिंगापुर की एक कंपनी में मिला जहां से अफ्रीका में उन्‍हें बतौर ब्रांड मैनेजर भेजा गया। यहां अफ्रीका के इंटीरियर में प्रग्‍नेश को जाने का मौका मिला जहाँ उन्‍होंने देखा कि लोग भारतीयों को एंजेल कह कर बुलाते हैं उनकी ब्राउन स्किन के कारण इन गरीब लोगों के लिए वह कुछ करना चाहते थे लेकिन करियर के पहले पड़ाव पर इसे कर पाना बहुत मुश्किल था।

खाड़ी देशों से भी प्रग्‍नेश को नौकरी के ऑफर मिले लेकिन भारत में वापस लौटने का मन उन्होंने बना लिया था। अपने दादा-दादी से भावनात्मक जुड़ाव उनका इतना रहा कि खेती-बाड़ी में कुछ नया करने की इच्छा भी थी। भारत में वापस आकर एकदम समझ में नहीं आ रहा था कि किस सिरे से अपनी सोच को परिणित करना है इसलिए बिना समय गवाएं फार्मास्यूटिकल कंपनी एबॅाट को ज्वाइन कर लिया जहां 3 साल मुंबई में काम करते हुए उन्हें काफी रूरल एरियाज में जाने का मौका मिला। यहां उन्होंने देखा कि खेती किसानी भारत की जीवन रेखा है। लेकिन परंपरागत तरीके और अनभिज्ञता किसान की मजबूरी है। खेती में कुछ नया करने का ज़ज़्बा फिर से प्रग्‍नेश के मन में जाग उठा। गुजरात में 2 साल ट्रांसफर होने के दौरान बार-बार अपने गांव जाने का मौका मिला जहां उन्होंने महसूस किया कि वहां का किसान चावल की खेती पर ही आश्रित है और वे पालतू गाय का दूध बेचकर गुजारा कर रहे हैं।

प्रग्‍नेश ने रिसर्च किया कि किन चीजों की खेती किसानों को 365 दिन आय का स्रोत बन सकती है। आखिरकार मशरूम एक ऐसा उत्‍पाद उन्‍हें लगा जिसकी खेती से किसानों को बहुत लाभ होगा। यह कम निवेश में शुरू किया जा सकता था और मशरूम बहुत कम समय में उत्पादित भी हो जाते हैं। उन्होंने काफी यूटयूब वीडियोस देखे और किताबों से नॉलेज लेकर 18 बाई 45 फुट में वर्टिकल सिलेंडर्स में मशरूम की खेती शुरु की। इस इनोवेटिव तरीके से खेती की वजह से प्रोडक्शन भी काफी तेजी से बढ़ा।

उनकी सफलता ने गांव के किसानों को आकर्षित करना शुरू कर दिया और किसान मॉडल को समझकर धीरे-धीरे अपना भी रहे हैं। शुरुआत में प्रग्‍नेश ने किसानों की वित्तीय मदद भी की। कृषि विपणन सरकारी केंद्र से प्रग्‍नेश को गांव के किसानों को शिक्षित करने के साथ-साथ पूरे गांव को ऑर्गेनिक खेती में परिवर्तित करने की सहायता भी मिल रही है। हालांकि प्रग्‍नेश किसानों को मशरूम उगाने की ट्रेनिंग दे रहे हैं लेकिन उनकी एक छोटी सी गलती पूरे उत्पादन को नष्ट कर सकती है इसके लिए वे सिलेंडर बनाने तक की विधि वह किसानों को बता देते हैं उससे आगे की देखभाल किसान स्वयं करते हैं। इतना ही नहीं किसान चाहें तो मशरूम को खुद जाकर बाजारों में अच्छे दामों पर बेच सकते हैं ऐसा नहीं कर पाने की स्थिति में प्रग्‍नेश मार्केटिंग में भी उनकी सहायता कर रहे हैं।

मार्केटिंग के लिए भी प्रग्‍नेश ने काफी मेहनत की। मशरूम की रेसिपी और उसके फायदों का पैंफलेट छपवाकर गुजरात के विभिन्न गांवों और शहरों में बंटवाया जिससे लोगों को मशरूम खाने की जिज्ञासा हुई। इससे पहले तक यहां मशरूम की मांग नहीं थी। स्कूल टीचर्स, डॉक्टर्स और होटलियर्स से मिलकर उन्हें मशरूम के हेल्थ बेनिफिट्स बताए जिससे उन्हें मार्केटिंग में काफी सहायता मिली।

 

सफलता के जिस मुकाम को वह धीरे धीरे छू रहे हैं वह बिल्कुल संतुष्ट हैं कि उनका सही करियर तो यही है। प्रग्‍नेश को तलाश है अपने जैसे प्रग्‍नेशों की जो खेती के इस मॉडल को अन्य राज्यों में अपनाएं। उनकी अगली योजना मशरुम रेसिपीज स्‍टॉल और फूड प्रोसेसिंग में जाकर मशरूम चिप्‍स और अचार बनाने की भी है। इतना ही नहीं गुजरात की मिट़टी जो काला सोना कहलाती है यहां प्रग्‍नेश मशरूम के अलावा अन्य सब्जियां जैसे ब्रोकली और रैड कैबेज उगाने की योजना भी बना रहे हैं।

केनफ़ोलिओज़ से खास बातचीत में उन्होंने एक बहुत शानदार किस्‍सा साझा किया “उनके बारे में पढ़कर बंगलोर के एक बड़े उद्योगपति उनसे मिलने उन्हें ढूंढते हुए पहुंचे कि देखें कौन पागल है जो एमबीए की नौकरी छोड़कर मशरूम की खेती कर रहा है, लेकिन प्रग्‍नेश से मिलकर जो पहले शब्द उनके मुंह से निकले वह थे ‘’आप जन्नत में रह रहे हैं’’ यही प्रग्‍नेश की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

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