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गरीबी से तंग आकर इस महिला ने एक ऐसा कदम उठाया कि पूरे गाँव की कायापलट हो गई

मौसम आते हैं और चले जाते हैं, लोगों को याद किया जाता है और भूल जाया जाता है, आपके अच्छे कार्यों की चर्चा भी एक अरसे के बाद फीकी पड़ने लगती है लेकिन एक बेशकीमती सोच हमेशा के लिए अपनी छाप छोड़ जाती है। यदि आपके पास कोई नायाब आइडिया है तो आप निश्चित रूप से आगे बढ़ के रहेंगे। आज हम आपके लिए ऐसी ही कहानी लेकर आये हैं जिसमें एक महिला की साधारण आइडिया ने दूसरों की जिंदगी में क्रांतिकारी परिवर्तन को संभव कर दिखाया।

40 की उम्र पार कर चुकी अनीता देवी, बिहार के नालंदा जिले में स्थित अनंतपुर गांव से ताल्लुक रखती हैं। ग़रीबी की वजह से उनके परिवार ने बहुत से कष्ट झेले हैं। अनीता सारा दिन घर का काम करती और उनके पति रात-दिन काम करके घर का खर्च चलाते थे। इस स्थिति में अनीता खुद को बेबस महसूस करती थी। तब उन्होंने यह निश्चय किया कि वे भी घर चलाने में अपना योगदान देंगी और बच्चों को अच्छी शिक्षा देंगी।

अनीता अपनी समस्या के समाधान के लिए नालंदा के हरनौत स्थित कृषि विज्ञान केंद्र पहुंची। वहां के संचालक ने उन्हें मशरूम की खेती करने की सलाह दी। बिना सोचे ही उन्होंने इस काम के लिए अपना मन बना लिया। कृषि विज्ञान केंद्र के संचालक ने उन्हें कृषि तकनीकी प्रबंध के माध्यम से सबसे पहले रांची के कृषि विश्वविद्यालय में मशरूम की खेती का प्रशिक्षण करवाया। उसके बाद उन्होंने समस्तीपुर स्थित पूसा के राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय में मशरूम उत्पादन और मशरूम के बीज के उत्पादन के गुर सीखे। उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

मशरूम की खेती का यह आइडिया उनके जीवन में एक बड़ा बदलाव साबित हुआ। अनीता ने अपना यह काम 2010 में शुरू किया परन्तु इस नई अवधारणा को स्वीकार करना सभी के लिए आसान नहीं था। उनकी सफलता की राह संघर्षों से निकली थी। परन्तु उन्होंने इसकी परवाह कभी नहीं की। मशरूम को उगाने में उन्हें बहुत सी चुनौतियों का सामना करना पड़ा।

कभी-कभी समस्याएं कुछ बड़ा और बेहतर करने के लिए हमें प्रेरित करती हैं। जब भगवान एक दरवाजा बंद करता है तो दूसरा ज़रूर खोलता है। अनीता के साथ आने वाले साल में यही कुछ हुआ। उन्होंने मशरूम के 20 किलो बीज राजेंद्र एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी से ख़रीदे। जब उनके कर्मचारी और बीज की मांग बढ़ने लगी तो अनीता ने यूनिवर्सिटी से अनुरोध किया कि उन्हें 300 किलो बीज दिए जाए। अनीता को  इस आधार पर इंकार कर दिया गया कि एक अकेले खरीददार को इतना बीज नहीं दिया जा सकता।

अब उनके पास केवल एक ही रास्ता बचा था कि वे खुद ही मशरूम के बीज का उत्पादन करें। पैसों की समस्या थी परन्तु भाग्य ने साथ दिया। बीज उत्पादन के लिए उन्नत तकनीक युक्त लैब स्थापित करने के लिए उन्हें नेशनल हॉर्टिकल्चर मिशन की ओर से 15 लाख रुपये के करीब का अनुदान मिला।

बहुत सारी मुसीबतों और परिस्थितियों से गुजरने के बाद अनीता आज अपने कठिन परिश्रम के फल का भोग कर पा रही हैं। उनकी सफलता ही उनकी कहानी कह रही है। अनंतपुर को मशरूम गांव घोषित कर दिया गया है और अनीता को आस-पास के लोग मशरूम महिला के नाम से जानते हैं। अनीता के पति संजय कुमार भी उनके काम में हाथ बटाते हैं और माधोपुर बाजार के पास अपनी कपड़े की दुकान भी चला रहे हैं। उसके दो बेटों ने हॉर्टिकल्चर की शिक्षा लेना प्रारंभ किया है और बेटी अभी बीएड की पढ़ाई कर रही है।

पिछले सात सालों से अनीता न केवल अपना भविष्य संवार रही है बल्कि मशरूम की खेती कर गांव की बहुत सी महिलाओं के लिए तरक्की का नया मार्ग प्रशस्त कर रही हैं। महिलाएं आत्मनिर्भर बनी हैं और घर खर्च में भी हाथ बटा रही हैं।

अनीता ने माधोपुर फार्मर्स प्रोड्यूसर्स कंपनी लिमिटेड की स्थापना की है और ऑर्गेनिक मशरूम की खेती से आस-पास की ज़्यादा से ज़्यादा महिलाओं को जोड़ने की कोशिश कर रही हैं। लगभग 250 महिलाएं उनकी कंपनी से जुड़ी हैं। अनीता देवी ने पिछले कुछ सालों में गांव-गांव घूम कर कई स्वयं सहायता समूह (सेल्फ हेल्प ग्रुप) का भी गठन किया है। यह ग्रुप बिहार सरकार चलायी जा रही आजीविका योजना जीविका” से जुड़ा है।

महिलाएं अपने आत्मविश्वास और प्रभाव के बल पर गरीबी से संपन्नता की ओर कदम रख रही हैं। यह एक महिला के आत्मविश्वास, जज़्बे और काम के प्रति उनके समर्पण की कहानी है। इस तरह के नए आविष्कार और नए पहल के माध्यम से हम आशा करते हैं कि राष्ट्र यशस्वी समृद्धि की ओर अग्रसर होगा।

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