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आँख से देख नहीं सकती थी तो क्या हुआ, उसने सरपंच बनकर बदल डाली पूरे गाँव की सूरत

हम सब भी कोई न कोई कमी जरूर होती है, और यह तथ्य ही हमें इंसान बनाता है। अगर सिर्फ हम यह जान लें कि उन कमियों पर काम कैसे करना है, हम हमेशा अपनी क्षमता से अधिक उपलब्धियाँ हासिल कर सकते हैं। इतिहास किसी के शारीरिक क्षमताओं को याद नहीं रखता बल्कि उनकी उपलब्धियों ने दुनिया को क्या दिया है, यह याद रखती है।

आज हम सुधा पटेल की कहानी लेकर आये हैं, जिनकी खुद की ज़िन्दगी में पूर्णतया अंधेरा है परन्तु उन्हें पूरा विश्वास है कि उनके गांव के लोगों की जिंदगियां इंद्रधनुषी खुशियों और रंगों से भरी होंगी। 34 वर्षीया सुधा आणंद के पेटलाद तालुका के चंगा गांव की सबसे युवा सरपंच हैं।

हर दिन वह चलती हुई केवल एक ही रास्ते को याद रखती हैं और वह है चंगा गांव के पंचायत ऑफिस का रास्ता। वैसे तो वे नेत्रहीन हैं, परन्तु गांव के हर व्यक्ति को उनकी आवाज़ से पहचान लेती हैं। वह हर संभव कोशिश करती हैं कि वे गांव के लोगों की समस्या सुलझाने सकें।

सुधा के पिता 10 सालों तक गांव के सरपंच रह चुके हैं और उनकी माँ गृहिणी हैं। उनकी बहन भी नेत्रहीन हैं और वे कॉलेज की पढ़ाई कर रही हैं। शुरूआत में उनके गांव के लोगों ने उनकी क्षमताओं को अनदेखा किया। उनके लिए सुधा केवल एक नेत्रहीन महिला थी। परन्तु जब सुधा ने चंगा गांव में परिवर्तन लाने के लिए जब विकास की रूपरेखा लोगों को दिखाई, तब सभी ने उन पर विश्वास करना शुरू कर दिया।  

DNA को दिए इंटरव्यू में में सुधा बताती हैं, “शुरूआत में लोगों के लिए इस बात को स्वीकार करना काफ़ी मुश्किल था कि एक नेत्रहीन लड़की, परंपरागत मानसिकता से युक्त इस गांव की सरपंच बन सकती है। मैंने तुरंत ही अपनी पढ़ाई ख़त्म की है। लोगों ने मेरी क्षमताओं को तब तक नजरअंदाज किया तब तक मैंने बेहतरीन इंफ्रास्ट्रक्टर के साथ विकसित गांव की स्थापना नहीं कर ली।”

सरपंच के चुनाव अभियान के दौरान सुधा ने गांव वालों से कोई वादा नहीं किया था। उन्होंने  अपने काम और अपने पर विश्वास करने को कहा था। समय के साथ-साथ उन्होंने बहुत से वाटर पंप और बोरवेल्स खुदवाये, बच्चों के लिए स्कूल खुलवाये।

इन्होंने अपने गांव के आठ तालाबों को किराये पर दिया और चंगा गांव के लिए आठ लाख की कमाई की। 10000 जनसंख्या वाले इस गांव में एक अच्छा हॉस्पिटल, कांफ्रेंस हॉल्स है और यहाँ के सभी लोग कम से कम दसवीं कक्षा तक पढ़े हैं। सुधा ने यह विश्वास दिलाया है कि हर स्कूल में कम्प्यूटर उपलब्ध होगा।

सुधा बताती हैं, “ मेरे माता-पिता को भी आलोचनाओं का सामना करना पड़ा था क्योंकि मैं नेत्रहीन पैदा हुई थी। परन्तु मैं खुश हूँ कि मैंने सभी को गलत सिद्ध कर दिया और आज मेरे लिए मेरी उपलब्धियां बोलती हैं।”

सुधा आज आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर है और वह ऐसे कई प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही है जो शारीरिक रूप से विकलांग बच्चों के लिए कल्याण से जुड़े हैं। इस काम से उन्हें संतोष मिलता है। उन्हें अक्सर अपनी विकलांगता के लिए आलोचना सहनी पड़ती थी पर आज उनका काम बोल रहा है। व्यवस्था प्रणाली में परिवर्तन लाने के उदेश्य से सुधा राजनीती में भी आना चाहती हैं।

सुधा के निस्वार्थ काम के लिए उन्हें हवाई में “टेन आउटस्टैंडिंग यंग पर्सन ऑफ़ द वर्ल्ड” अवार्ड से नवाज़ा गया। उन्हें “आउटस्टैंडिंग वीमेन पंचायत लीडर ऑफ़ इंडिया” सम्मान से भी सम्मानित किया गया है। उन्होंने कई विषयों पर कवितायें भी लिखी है जैसे तम्बाकू की बुराइयां, स्वार्थी मानव मूल्यों, प्यार, शांति और हिंसा।

सुधा जिंदादिल महिला हैं और आज की महिलाओं के लिए रोल मॉडल है। गांव के लोगों के लिए उनके द्वारा किया गया निस्वार्थ काम प्रशंसनीय है। आज हमारे देश को सुधा जैसे नेताओं की जरूरत है जो खुद से ज़्यादा अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों को महत्त्व दें।

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