,

बिना मिट्टी की तकनीक से कर रहे हैं टमाटर की खेती, कम लागत में हो रही है भरपूर पैदावार

आज के ज्यादातर युवा खेती-किसानी से दूर भागते नज़र आते हैं। कारण है खेती में लगने वाली कठिन मेहनत, पूंजी और लम्बे इंतज़ार के बाद भी मिलने वाला कम मुनाफ़ा। ऊपर से अगर मौसम की मार पड़ जाए तो सारी मेहनत पर पानी फिर जाने का डर अलग रहता है। इन्ही कारणों से आज के युवा खेती से मुँह फेर रहे हैं और जो किसान खेती कर रहे हैं वो भी इसे छोड़ दूसरे अवसरों की तलाश कर रहे हैं।

लेकिन खेती में भी मुनाफ़े की कोई कमी नहीं है बशर्ते उसे सही ढंग से किया जाए। आजकल खेती के ऐसे-ऐसे आधुनिक और वैज्ञानिक तरीके आ गए हैं कि आप कम जगह और कम लगत में भी लाखों का मुनाफ़ा कमा सकते हैं। आज हम एक ऐसे ही युवा किसान की बात करने जा रहे हैं जो हाइड्रोपोनिक तकनीक यानी बिना मिट्टी की खेती द्वारा टमाटर का उत्पादन कर मिसाल कायम कर रहा है।

टमाटर की खेती से कर रहे हैं शानदार कमाई 

इनका नाम है पार्थ। पार्थ उत्तरप्रदेश के गाजीपुर जिले के मिर्जापुर गांव के निवासी हैं। पार्थ नें मिट्टी रहित खेतीे को एक नया आयाम दिया है। उन्होंने हाइड्रोपोनिक (बिना मिट्टी की खेती) तकनीक विकसित कर टमाटर की खेती कर मिसाल कायम की है। पार्थ को वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान इस तकनीक के बारे में पता चला था। वहां के हार्टीकल्चर विभाग के कुछ प्रोफेसरों नें उन्हें यह बात बताई की ऐसी भी कोई तकनीक है। भारत में जोधपुर के सेंट्रल एरिड जोन रिसर्च इंस्टीट्यूट (साजरी) में तब यह तकनीक आई थी। लेकिन वहां यह तकनीक सफल नहीं हो पायी थी। पर पार्थ ने सोच लिया था कि वे इस तकनीक पर रिसर्च और प्रयोग करेंगे।

काफी मेहनत के बाद पार्थ का प्रयोग सफल रहा और वे इस तकनीक के द्वारा टमाटर की खेती करने में सफल रहे। उनसे प्रेरित होकर मौजूदा समय में गाजीपुर जिले में लगभग सभी घरों में उनके मॉडल से टमाटर की खेती की जा रही है। पार्थ के इस तकनीक को लोग उनसे सिखने आते हैं और फिर अपने घरों में प्रयोग करते हैं। इसके बाद लोगों ने गुणवत्तापूर्ण टमाटर अपने घरों की छतों पर ही उगाना शुरू कर दिया।

क्या है ‘हाइड्रोपोनिक’ तकनीक 

दरअसल इस तरीके में जिसे वैज्ञानिक रूप से ‘हाइड्रोपोनिक’ तकनीक और सामान्य तौर पर बिना मिट्टी की खेती कहा जाता है। इसमें मिट्टी का प्रयोग नहीं होता है, इसे केवल पानी में या लकड़ी का बुरादा, बालू अथवा कंकड़ों को पानी में डाला जाता है। सामान्यतया पेड़-पौधे अपने आवश्यक पोषक तत्व जमीन से लेते हैं, लेकिन हाइड्रोपोनिक्स तकनीक में पौधों के लिये आवश्यक पोषक तत्व उपलब्ध कराने के लिये एक विशेष प्रकार का घोल डाला जाता है। इस घोल में पौधों की वृद्धि के लिये आवश्यक खनिज एवं पोषक तत्व मिलाए जाते हैं। पानी, कंकड़ों या बालू आदि में उगाए जाने वाले पौधों में इस घोल की महीने में दो-एक बार केवल कुछ बूँदें ही डाली जाती हैं। इस घोल में नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश, मैग्नीशियम, कैल्शियम, सल्फर, जिंक और आयरन आदि तत्वों को एक खास अनुपात में मिलाया जाता है, जिससे पौधों को आवश्यक पोषक तत्व मिलता रहता है।

कैसे की जाती है इसकी संरचना

पार्थ के इस विधि द्वारा खेती में 20-20 मीटर के छह पाइप को एक पिलर पर रख दिया जाता है। पिलर के एक तरफ दस फीट का गड्ढा खोदकर उसमें 100 लीटर का टैंक डाला जाता है। इस टैंकों में विभिन्न 16 पोषक तत्वों से युक्त पानी मिलाया जाता है। पौधे को पाइप में लगा दिया जाता है और पंप की सहायता से पानी पहुंचाया जाता है। पाइप में एक कीप लगा दी जाती है, जिसके जरिये बचे हुए पानी के वापस टैंक तक ले जाया जाता है। पूरी प्रक्रिया इसी तरह चलती रहती है। इस तकनीक के जरिये टमाटर का पौधा लौकी के पौधे से भी बड़ा होकर लगभग 60 मीटर तक का हो जाता है। पार्थ के इस विधि द्वारा एक हजार रुपये खर्च करके कम से कम चार सौ किलो टमाटर प्राप्त किया जा सकता है।

इसके अलावा पार्थ नें बिना मिट्टी की खेती यानि हाइड्रोपोनिक विधि को लोगों तक पहुँचाने के लिए 18 किताबों की एक पूरी श्रृंखला ही लिख डाली है। उनकी किताब का शीर्षक भी बड़ा रोचक व गम्भीर है “वेपन अगेंस्ट हंगर” अर्थात भूख के खिलाफ हथियार। पार्थ का मानना है कि इस तकनीक से कम लागत व जगह में ही अधिक से पैदावार की जा सकती है। जिससे किसानों की आर्थिक समस्या दूर हो जायेगी और हमारे अन्नदाता को कभी भूखा नहीं सोना पड़ेगा। पार्थ इस तकनीक को हर किसान तक पहुँचाना चाहते हैं।

पार्थ को हाइड्रोपोनिक (बिना मिट्टी के खेती) तकनीक विकसित करने के लिए 2015 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा प्रेसिडेंट रोवर अवार्ड से सम्मानित भी किया जा चुका है।

आप अपनी प्रतिक्रिया नीचे कमेंट बॉक्स में दे सकते हैं और इस पोस्ट को शेयर अवश्य करें 

आपका कमेंट लिखें