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पिछले 60 वर्षों से यह शख्स आख़िर ऐसा क्या कर रहे हैं असम के जंगलों में, जो सरकार ने दिया ‘पद्मश्री’

क्या कोई अकेला व्यक्ति बिना किसी सहायता के 1,360 एकड़ भूमि में जंगल उगा सकता है? वो भी बंजर जमीन में बिना किसी सरकारी व गैर सरकारी संस्था के सहयोग से। आप ताज्जुब कर रहे होंगे कि भला यह कैसे संभव हो पाएगा लेकिन यह सच हैं कि एक व्यक्ति की दृढ़ इच्छाशक्ति और पर्यावरण के प्रति उसके प्यार ने इस असंभव जैसे लगने वाले काम को संभव कर दिखाया है।

जिस समय हम सब निश्चिंत होकर अपने-अपने घरों में चैन की श्वास ले रहे थे, उस समय यह शख्स बंजर भूमि में पेड़ लगा रहे थे ताकि आने वाली पीढ़ी भी स्वच्छ हवा में श्वास ले सके। ‘फॉरेस्ट मैन’ के नाम से मशहूर 56 वर्ष के जादव पाएंग समाज के लिए किसी प्रेरणास्रोत से कम नहीं हैं। उन्होंने हमें एक ऐसा तोहफ़ा दिया है, जिसका शुक्रगुजार हमारी आने वाली कई पीढ़ी भी होगी।

असम के जोरहट गांव में एक आदिवासी समुदाय से ताल्लुक रखने वाले जादव ने 16 वर्ष की आयु में ही अपने जीवन का सबसे बड़ा फैसला लिया और यह निश्चित किया कि वह ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे पेड़ लगाएंगे और एक जंगल को जन्म देंगे। अब आप सभी सोच रहे होंगे कि इतने बड़े निर्णय का कारण क्या था। दरअसल, पाएंग को बचपन से ही प्रकृति से प्रेम था और वह पेड़ों और जानवरों से बेहद जुड़े थे। जीवन में उन्होंने प्रकृतिक जीवों को अपना मित्र बनाया।

एक दिन अचानक उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि उनके इलाके में जानवरों और पेड़ों की संख्या लगातार घटती जा रही है। एक समय ऐसा आया जब पाएंग नदी किनारे टापू पर घूमने गए और उन्होंने देखा कि वहां बहुत सारे सांप मरे हुए हैं।  उन्हें पता चला कि उस स्थान पर जंगल से लगातार पेड़ काटे जा रहे थे। पाएंग ने सोचा कि अगर ऐसी घटना आज जानवरों के साथ हुई है तो आने वाले समय में मनुष्य भी इसी स्थिति से जूझ सकता है।

कुछ दिनों तक पाएंग इसके बारे में परेशान रहे और अंत में वह वन विभाग के पास एक आशा लेकर गए। उन्होंने वन विभाग के अधिकारीयों से गुज़ारिश की कि वे वहां कुछ पेड़ लगा दें जिससे जानवरों की जान बच सके। परंतु वन विभाग ने उन्हें बताया कि यह बंजर जमीन है और यहां कोई पेड़ नहीं उग सकते। जाधव ने इसे एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया और दृढ़ संकल्प के साथ अपने जीव मित्रों को बचाने की पहल में जुट गए।

उन्होंने ब्रह्मपुत्र नदी के बीच स्थित एक वीरान टापू पर बीस बांस के पोधे लगाकर अपने मुहिम की शुरूआत की। तीस वर्षों तक हर सुबहवे उस टापू पर एक पोधे लगाते। ऐसा करते-करते वह वीरान जगह हरे-भरे जंगलों में परिवर्तित हो गया। उन्होंने विभन्न प्रकार के पेड़ लगाए और 1,360 एकड़ जमीन को एक विशालकाय जंगल की शक्ल दी। इस जंगल में कई जानवर भी रहते हैं जैसे 5 रॉयल बंगाल चीता, सौ से भी ज्यादा हिरण, गिद्ध, हाथी और अनेक प्रकार के पक्षी। इस जंगल को मोलाई जंगल भी कहा जाता है। 300 एकड़ जंगल के इलाके में केवल बांस के पेड़ हैं और बाकी का स्थान एजर, अर्जुन, गुलमोहर जैसे पेड़ों से भरा हुआ है।

आज पाएंग जोरहात स्थित अरूणा सापोरी नामक एक छोटे नदी के टापू पर रहते थे। महज़ दसवीं पास पाएंग बिना थके-बिना रुके आज भी अपनी मुहिम में लगे हैं जिसकी शुरूआत उन्होंने साल 1979 में किया था। धीरे-धीरे उनके काम की भनक मीडिया से लेकर सरकार तक पहुंची और उन्हें देश के चौथे सर्वश्रेष्ठ नागरिक सम्मान पद्म श्री से नवाज़ा गया। 

दसवीं पास पाएंग के पास कोई डिग्री तो नहीं है जो लाखों-करोड़ों रुपये खर्च करके लोग ले पाते हैं लेकिन पर्यावरण के प्रति उनकी संवेदनशीलता सच में बेहद अभूतपूर्व और अनुकरणीय है। उनके कारनामे से हमें यह सीख मिलती है कि  पर्यावरण को शुद्ध रखने की हम सब की सामूहिक जिम्मेदारी है।

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