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कैसे एक 67 वर्ष के बुजुर्ग ने देशी जुगाड़ से कई इनोवेटिव उत्पाद बना डाले

क्या आप उस व्यक्ति पर बेचारगी चस्पा कर देंगे जो संसाधनों से हीन तो है, पर अपने नई और उर्वर सोच से हमेशा समाज की समस्याओं का समाधान करने में जुटा रहता है? कतई नहीं। ऐसे लोगों के पास साधनों की कमी हो सकती है परन्तु उनकी शक्ति उनके मस्तिष्क और उनकी सोच में समाहित होती है। आज हम बात कर रहे हैं 67 वर्षीय एक प्रोफेसर की, जो अपने मिशन के तहत कम सुविधा प्राप्त उद्यमियों की मदद करते हैं।

अनिल गुप्ता, एक विश्व स्तर के जाने-माने विद्वान हैं और ज़मीनी स्तर के आविष्कारकों को ढूंढ उनकी मदद करने वाले मसीहा। कुछ 25 साल पहले उन्होंने हनी बी नेटवर्क नामक एक संस्था की स्थापना की थी जिसके तहत वे स्वदेशी उद्यमियों को ढूंढ़ कर और उनके ज़रूरत के मुताबिक उनकी मदद करते हैं।

हरियाणा के एक छोटे से शहर में उनका जन्म हुआ और वहीं वे पले-बढ़े। एग्रीकल्चर में उन्होंने स्नातक किया और बायोकैमिकल जेनेटिक्स में मास्टर डिग्री ली। उसके बाद उन्होंने पीएचडी किया और आईआईएम अहमदाबाद में सेंटर फॉर मैनेजमेंट इन एग्रीकल्चर में नौकरी ज्वाइन की। बहुत सारे कठिन रिसर्च करने के बाद अनिल ग्रामीण भारत में बिखरे हुए अवसरों को नज़रअंदाज नहीं कर सके। तब उन्होंने यह निश्चय किया कि वे ग्रास रूट्स इन्नोवेटर्स की सहायता करेंगे। उन लोगों के पास ज्ञान तो बहुत है पर साधनों की नितांत कमी है।

1981 में स्थापित हनी बी नेटवर्क के माध्यम से वे आर्थिक रूप से कमजोर इन्नोवेटर्स की मदद करते हैं। 1993 में वे SRISTI (सोसाइटी ऑफ़ रिसर्च एंड इनिशिएटिव फॉर सस्टेनेबल टेक्नोलॉजीज एंड इंस्टीट्यूशन) लेकर आये, ग्रास रुट के इनोवेशन को बड़े पैमाने पर वृद्धि करना जिसका उद्देश्य था।

अपने नवीन दृष्टिकोण के कारण उन्होंने कुछ अदभुत आइडिया को मूर्त रूप देकर बाइसिकल स्प्रेयर, बैम्बू प्रोसेसिंग मशीन, कम्पोस्ट एयरेटर और डबल शटल करघे का अविष्कार किया।

बाइसिकल स्प्रेयर : यह एक पोर्टेबल स्प्रेइंग सिस्टम है जिसमें एक स्प्रोकेट-पंप को संशोधित कर जोड़ा गया है और एक टैंक और अडजस्टेबल स्प्रेयर बूम को किसी भी साइकिल में लगा कर उपयोग किया जाता है। एक ड्रम जिसमें सॉल्यूशन होता है उसे साइकिल के फ्रेम में जोड़ दिया जाता है।

बैम्बू प्रोसेसिंग मशीन : इसमें दो मशीन का उपयोग कर बैम्बू को निश्चित आकार और लम्बाई के टुकड़ों में काटा जाता है। इसका उपयोग हैंडीक्राफ्ट, फर्नीचर और दूसरे उत्पाद बनाने में किया जाता है। इससे लोगों को रोज़गार मिलता है।

कम्पोस्ट एयरेटर : इस अविष्कार के जरिये लोगों में ऑर्गनिक फार्मिंग के प्रति जागरूकता लाने का प्रयास किया गया है। इसमें बायो वेस्ट को मिक्स कर, नमी प्रदान कर और  एयरेट करके और इस तरह सड़ाकर खाद बनाया जाता है, जिसका उपयोग खेती के लिए किये जाता है।

इसके अलावा श्री गुप्ता ने भारत सरकार के साथ मिलकर नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन की स्थापना की जिसके द्वारा इन्वेस्टर्स को इस तरह के इनोवेटिव प्रोजेक्ट्स में पैसा इन्वेस्ट करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।

अपने ग्रास रुट इनोवेशन को लेकर पूरी दुनिया में मशहूर प्रोफेसर गुप्ता कहते हैं कि आज की पीढ़ी के पास जबरदस्त इनोवेटिव आइडिया है। जरुरत है उन आइडियाज़ को पहचान कर उन्हें सम्मान देने की। आज भारत तेज़ी से बदल रहा है। ऐसी स्थिति में ग्रास रूट्स इन्नोवेटर्स को सम्मान देने की जरुरत है। उन्होंने नए आइडियाज को प्रत्साहित करने के लिए, अपनी जरुरत को स्पष्ट करने और उसके बारे में ज्यादा खुलकर बात करने व सवाल पूछने पर ज़ोर दिया है।

यह देश युवाओं के इनोवेटिव सोच से भरा-पूरा है पर यहाँ आधारभूत इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी है। इस तरह की स्थिति में अनिल गुप्ता ने एक नयी शुरुआत की है जो क़ाबिले तारीफ है। श्री अनिल गुप्ता वह चराग़ हैं जिसने असंख्य दीपों को जलाकर देश के लिए रौशनी की इबारत लिखी है। भारत सरकार ने उनके योगदानों के लिए उन्हें 2004 में पद्मश्री उपाधि से सम्मानित किया है। 

किसी शायर ने क्या खूब कही है,

माना कि तू लड़ा है अकेले ही रात भर, एक वो भी है, हज़ार दिए जो जला गया !

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