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MIT जैसे संस्थान से निकलकर चुना समाज सेवा का रास्ता, गाँव के 20 लाख लोगों की बदल दी जिंदगी

बहुत से लोग इस बात से सहमत होंगे कि इंजीनियरों का एक अलग ही नस्ल होता है। अपनी बहुमुखी प्रतिभा के दम पर वे किसी भी क्षेत्र में श्रेष्ठ प्रदर्शन कर सकते हैं और कोई भी काम जैसे एक पल में ही पूरा करने की ताकत रखते हैं। लेकिन आज हम आप को एक ऐसे इंजीनियर से मिलवाना चाहते हैं जिन्होंने श्रेष्ठता और गुणों से आगे जाकर अपने आप को परिभाषित किया है।

प्रेरणा से भरी हुई यह कहानी इंजीनियर दीप जोशी की है। अगर चाहते तो मेसाचुसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी (एम.आई.टी) से अपनी मास्टर डिग्री करने के बाद दुनिया का कोई भी शानदार करियर दीप जोशी के क़दमों पर होता पर उन्होंने एक संभावित आलीशान जीवन को छोड़कर दूरस्थ क्षेत्रों में गांव के गरीब लोगों की मदद करने का रास्ता चुना।

देश जब स्वतंत्र हुआ उसी वर्ष ही दीप का जन्म हुआ। दीप उत्तराखंड के पिथौरागढ़ के पुरियाग नामक गांव से ताल्लुक रखते हैं। उनके पिता खेती कर अपने परिवार का पालन-पोषण करते थे। पढ़ाई में हमेशा से अव्वल रहे दीप ने एक के बाद एक परीक्षाएं पास करते हुए अपना पोस्ट ग्रेजुएशन प्रतिष्ठित संस्थान मेसाचुसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी (MIT) से पूरा किया।  

दीप ने भारत लौटकर सभी को आश्चर्य में डाल दिया। उन्होंने फोर्ड फाउंडेशन में काम किया और प्रदान (PRADAN) (प्रोफेशनल असिस्टेंस फॉर डेवलपमेंट एक्शन) में भी काम किया जो एक ऐसा आर्गेनाईजेशन है जिसमें कॉलेज के अंडर ग्रेजुएट्स विद्यार्थियों को समाज सेवा के काम के लिए रिक्रूट किया जाता है।

प्रदान के द्वारा गांव के गरीब लोगों के लिए बहुत सारी डेवलपमेंट एक्टिविटी की जाती है जैसे पानी के साधन विकसित करना, सभी उपलब्ध प्राकृतिक साधन को उपयोगी बनाना और खेती और हॉर्टिकल्चर के नए तरीके विकसित करना, आदि। 2006 में भारतीय एनजीओ अवार्ड इवेंट में प्रदान को एनजीओ ऑफ़ द ईयर सम्मान से सम्मानित किया गया।

दीप का जीवन हमें मुख्य रूप से यह सिखाता है कि जब हमारी अपनी आवश्यकता से अधिक संसाधन हमारे पास हों तब हमें उनकी मदद करनी चाहिए जो वास्तव में ज़रूरतमंद हैं। भारत की जनसँख्या लगभग 1.32 बिलियन है जिसमें से 276 मिलियन परिवार गरीबी रेखा के नीचे जीवन बिता रहे हैं।

यह आंकड़ा एक सवा-अरब से अधिक आबादी के मुकाबले कुछ भी नहीं है परन्तु वहां संकट को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। बच्चों को शिक्षित कर उन्हें अपने पेट भरने के काबिल बनाने के लिए ये परिवार बहुत सारी चुनौतियों का मुकाबला करते हैं। हममें से बहुत लोग मॉल्स में सामान खरीदते वक्त मोलतोल नहीं करते परन्तु जब हम छोटे दुकानदारों से सामान खरीदते हैं तब हम उनसे भाव कम कराते हैं। हमें समझने की जरूरत है कि ये लोग अपनी रोज़मर्रा के साधन जुटाने के लिए अपनी आर्थिक स्थिति से संघर्ष कर रहे होते हैं इसलिए ये स्वच्छता, फिटनेस और आराम के लिए खर्च नहीं कर पाते।

हमें संसाधनों की कमी नहीं है परन्तु हम अपने संसाधनों का सही इस्तमाल नहीं करते। PRADAN जैसे एनजीओ गरीब लोगों के जीवन स्तर को सुधारने में उनकी मदद करते हैं और बेहतर जीवन का भरोसा दिलाते हैं। अच्छे शिक्षित बैकग्राउंड के दीप चाहते तो अच्छे पैकेज किसी भी संस्थान से प्राप्त कर सकते थे। बजाय इसके उन्होंने अपनी सादा जीवन उच्च विचार के फलसफे के साथ चले। आरामदायक जीवन को छोड़कर दीप ने जरूरतमंदों की मदद का लक्ष्य चुना और उनके कल्याण के लिए काम किया।

प्रदान बहुत सालों से हमारे समाज में बदलाव लाने का काम कर रहा है। सही दिशा में लिया गया एक छोटा कदम एक बड़े बदलाव का सबब बनता है। भारत के ग्रामीण विकास के लिए किये उनके काम के लिए और भारत में एनजीओ के बढ़ावे के लिए उन्हें 2009 में प्रतिष्ठित  सम्मान मैग्सेसे अवार्ड से नवाज़ा गया।

दीप कहते हैं -“सभ्य समाज में दिल और दिमाग दोनों की जरूरत होती है। यदि आप सारा दिल से कर रहे हों तो वह काम नहीं करेगा। अगर आप केवल दिमाग से कर रहे हो तो आप केवल तय समाधान ही कर पाएंगे जो मानवीयता के तार को छू तक नहीं पायेगा।”

यह उद्धरण जीवन के सभी पहलू के लिए सही साबित हुआ है। जो केवल दिमाग से काम करता है वह वर्तमान की परिस्तिथियों को नहीं समझ पाता और अगर कोई केवल दिल से काम करता है दिमाग से नहीं, तो वह किसी समस्या का संभव समाधान नहीं कर पायेगा। हमारी नींव मजबूत बनाने के लिए हमें अपने आईडिया को शीशे की तरह साफ रखना होगा और उसे पूरा करने के लिए हमारी इच्छाशक्ति को मजबूत होना होगा। परिवर्तन तो हमारे अपने भीतर से  शुरू होता है और बाद में पूरा राष्ट्र प्रगति करता है।

तो, क्या आपने निकट-अतीत में किसी के बेहतर जीवन के लिए कुछ मदद की है ? यदि नहीं तो जल्द ही शुरूआत कर दीजिये। इससे न केवल किसी की जिंदगी बदल सकती है बल्कि खुद को हमें अच्छा महसूस होगा।

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