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रोज़गार के लिए जाते थे दूसरे प्रदेश, फिर आया काजू की खेती करने का ख्याल, आज हो रही है मोटी कमाई

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी अक्सर इस बात को दोहराते थे की, “असल भारत यहाँ के गाँव में बसता है”। वास्तव में भारत की असली ताकत गाँव में बसने वाली आबादी ही है, खासकर के वो किसान जिनकी वजह से पूरे देश में अन्न की कमी नहीं होती। इसके चलते ही भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने भी “जय जवान, जय किसान” का चर्चित नारा दिया था।

यह सच है कि आज भी हमारे देश में ऐसे कई गाँव हैं जहाँ मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। लेकिन यह भी सच है कि हाल ही में देश के कई गाँव में स्थितियां सुधार की तरफ बढ़ चली है।| इसका प्रमुख श्रेय वहां रहने वाले लोगों की जिजीविषा को जाता है। आज की हमारी कहानी देश के एक ऐसे ही पिछड़े गाँव की है जहाँ के लोगों ने अपनी मेहनत के दम पर गाँव की कायापलट कर दी है। हम हमेशा सुनते आये हैं कि संगठन में शक्ति होती है, और इस शक्ति से हम कुछ भी हासिल कर सकते हैं, इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है ओडिशा के दक्षिण पश्चिमी इलाके में बसा एक जिला नवरंगपुर। 5,291 स्क्वायर किलोमीटर में फैले इस जिले की आबादी 12.2 लाख है जिसमें से 56 प्रतिशत जनसंख्या आदिवासियों की है। ओडिशा को देश के पिछड़े प्रदेशों में गिना जाता है। आदिवासी जनसंख्या की अच्छी ख़ासी तादाद वाले उड़ीसा के कई जिले इतने पिछड़े हैं कि वहां के लोगों के पास गरीबी में जीवनयापन करने के सिवा दूसरा कोई विकल्प नहीं है।

रोज़गार के लिए जाते थे दूसरे प्रदेश, फिर आया काजू की खेती करने का ख्याल

उड़ीसा के नवरंगपुर को भी कुछ समय पहले तक देश का सबसे गरीब गाँव के रूप में गिना जाता था। इस जिले के हालात इतने बदतर थे कि यहाँ न तो रोज़गार का कोई विकल्प था और न ही परिवहन के लिए अच्छी सड़कें। शिक्षा, चिकित्सा और बिजली की उचित सुविधा तो बहुत दूर की बातें थी। आज से तीन चार साल पहले तक इस गाँव का परिदृश्य कुछ और ही था। यहाँ के हालात ऐसे थे कि गाँव में रहने वाले 100 से ज्यादा परिवारों को अपने खेतों में धान और मक्के की खेती करने के बाद जनवरी और फरवरी के महीनों में मजदूरी के लिए हैदराबाद और चेन्नई का रुख करना पड़ता था।  लेकिन बीते कुछ वर्षो में यहाँ रहने वाले लोगों के जीवन में बहुत परिवर्तन आया हैं।

आज इस गाँव के लोग काजू की खेती करके अपना और अपने परिवार का जीवन स्तर संवारने में लगे हैं। गाँव के हर परिवार ने काजू की खेती करना प्रारम्भ कर दिया है जिससे की उन्होने न केवल अपनी तकदीर को बल्कि गाँव की तस्वीर को बहुत हद तक बदल दिया है। गांव के एक किसान भोला पात्रा की मानें तो “अब हम काजू की खेती करते हैं और फिर इसे बाजार में 100 रुपये किलो तक बेच देते हैं। ऐसा करके पहले की अपेक्षा अब हमारी आमदनी बढ़ गयी है। इसीलिए अब हमें दूसरे राज्यों में मजदूरी करने नहीं जाना पड़ता है। पूर्व में भी गाँव का कोई व्यक्ति अपने बीवी-बच्चों को छोड़कर किसी दूसरे प्रदेश में नहीं जाना चाहता था, लेकिन मजबूरी में जाना पड़ता था। हालाँकि अब सबकुछ बदल चुका है, अब हम अपने ही गाँव में सफलतापूर्वक काजू की खेती करते हैं और अपने अपने परिवार के साथ सुखी रहते हैं”|

काजू की खेती से हुई है गाँव की तरक्की

भोला पात्रा ने भी तीन साल पहले काजू के 40 पौधे लगाए थे। जैसा की आपको मालूम होगा कि काजू की फसल में पानी की बहुत अधिक आवश्यकता नहीं होती है और सिर्फ 2-3 साल में ही काजू का पौधा फल (काजू) देने लगता है। आज नवरंगपुर गांव के 21 हेक्टेयर क्षेत्र में काजू का उत्पादन हो रहा हैं और 250 परिवार के गांव में 100 परिवार इसकी खेती कर रहे हैं। गांव की सरपंच निलेन्द्री बत्रा के अनुसार, “पिछले कुछ सालों में गाँव से बाहर मजदूरी करने जा रहे लोगों की संख्या में बहुत कमी आई है। इस साल तो गाँव से सिर्फ 10-12 लोग ही मजदूरी के लिए चेन्नई और हैदराबाद गए हैं”।

 

 

साथ ही गाँव वालों के द्वारा कृषि की उन्नत तकनीकों का प्रयोग करने से काजू के अलावा सामान्य फसलों की पैदावार में भी काफी बढ़ोत्तरी हुई है। इस गाँव में प्रमुखता से धान और मक्के की खेती की जाती है। लेकिन मक्के और धान जैसी फसलों की पैदावार ज्यादा होने के कारण उनका मूल्य भी कम रहता है। लेकिन काजू की फसल से उन्हें अच्छा फायदा हो जाता है।

प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से मिल रहा है लोगों को रोज़गार

काजू की खेती में फायदे को देखते हुए गांव वाले जोखिम उठाने को भी तैयार हैं। धीरे-धीरे विकास की ओर अग्रसर हो रहे इस गाँव का किसान तो जागरूक होने लगा है लेकिन यहां अभी भी कई सारी समस्याएं जस की तस बनी हुई है।

सम्पूर्ण जिले में उद्योग के नाम पर सिर्फ एक बीके बिरला ग्रुप की फैक्ट्री है जो फाइबर बोर्ड बंनाने का काम करती है। यहाँ वर्तमान में सिर्फ एक ही रोज़गार लोगों की आजीविका का साधन है, वो है काजू की खेती। इसी वजह से कई सारी काजू की प्रोसेसिंग यूनिट इस स्थान पर स्थित है। लेकिन इस बात से कोई इंकार नहीं है कि गाँव के लोग धीरे-धीरे जागरूक होते जा रहे हैं और उन्होंने काजू की खेती के लिए बैंकों और साहूकारों से कर्ज भी लेना शुरू कर दिया है।

मौजूदा समस्याओं से जल्द मिलेगी निजात

यहाँ के किसानों ने अभी तक अपना काम तो कर दिया लेकिन अन्य सुविधाओं के लिए यहाँ के निवासियों को सरकार की मदद की दरकार है। क्योंकि वहाँ आने-जाने के लिए न तो सड़के हैं और न ही बच्चों के लिए शिक्षा की व्यवस्था और बात करें स्वास्थ्य सुविधाओं की तो उसकी हालात और भी ज्यादा विकट है। लेकिन लोगों को उम्मीद है कि हालात जल्द ही सुधरेंगे। गाँव के किसानों की मेहनत अब रंग लाने लगी है तो यह उम्मीद की जा सकती है कि काजू की खेती से आने वाले समय में यहाँ के लोगों का जीवन स्तर और अधिक सुधरेगा। इसके साथ ही अन्य सुविधाओं को लेकर सरकार भी नवरंगपुर के प्रति गंभीर होगी और वहाँ के किसानों के लिए हितकारी योजनाएं लाएगी।

नवरंगपुर के लोगों से हमें यह सीख मिलती है कि एकता में कितनी ताकत है। रोज़गार के अवसर गाँव में ही उपलब्ध करके यहाँ के लोगों ने खुद को इतना मजबूत कर लिया है कि उन्हें अब किसी और चीज़ पर निर्भर होने की आवश्यकता नहीं रही है। हम यहाँ के लोगों की जिजीविषा को सलाम करते हैं।

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