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नौकरी छोड़ किसानी को गले लगाया, जैविक खेती के घरेलू नुस्खे से बदल रहे हजारों किसानों की जिंदगी

एक ओर पढ़े-लिखे युवक की बहुराष्ट्रीय कंपनी के वतानुकूलित आॅफिस में मोटी तनख्वाह वाली नियमित नौकरी और दूसरी तरफ अनपढ़ हर मौसम खेतों के लिए सुबह-सुबह निकलना और जी तोड़ मेहनत के बावजूद अनियमित और बहुत ही कम कमाई का जरिया वाली किसानी। सिर्फ कल्पना मात्र ही काफी है दोनों के बीच का अंतर समझने के लिए तो सोचिए वास्तविकता कैसी होगी। लेकिन जब एक पढ़ा लिखा युवक पहली स्थिति का त्याग कर दूसरी स्थिति को बेहतर बनाने के लिए खेती-किसानी को चुने तो यह निश्चित ही साहसिक और बेहद सराहनीय प्रयास कहलाएगा।

7 सालों तक अमेरिकी फार्मा कंपनी में काम करने वाले नितिन काजला जब अपनी नौकरी छोड़ कर किसानी का फैसला किया तो कईयों के लिए यह एक आश्चर्य था तो कुछ के लिए यह मजाक बनाने का जरिया। पर नितिन के लिए यह रासायनिक भोजन से मुक्ति और किसानों की बेहतरी, जागरुकता और शिक्षा के लिए एक संकल्प था। 2 साल पहले उनके द्वारा शुरू किया गया अकेला सफर अब एक कारवाँ बन चुका है।

एक दिन अचानक रसायनों से उपज वाला भोजन करते हुए नितिन को इससे निजात पाने का ख्याल आया और मार्च 2015 में नौकरी छोड़ वे किसानी की ओर बढ़ गये। मैंनेजर पद पर नियुक्त नितिन ने एक आधुनिक सोच के साथ कैमिकल फ्री आर्गेनिक फार्मिंग के माॅडल को विकसित करने का मन बनाया और इसकी शुरुआत करने के लिए अपने गाँव भाटीपूरा (मेरठ, यू.पी.) आ गये। अपने 6 एकड़ की भूमि पर जब उन्होंने जैविक खेती के माॅडल को अपनाया तो किसी को यकीन नहीं हुआ कि कैमिक्ल्स के बिना भी खेती हो सकती है तो कुछ ने उनके अच्छी-खासी नौकरी को छोड़ किसानी अपनाने को नासमझी भरा कदम बताया।

हालांकि शुरुआत इतनी आसान नहीं थी। नवम्बर 2014 में उन्होंने आधे एकड़ पर जैविक खेती की शुरुआत की थी। उन्होंने इसके तरीकों को जानने के लिए काफी आॅनलाइन अध्ययन किया और आर्गेनिक खाद, फर्टिलाइजर्स और पेस्टिसाईड के तकनीकों को विकसित कर खेती शुरु की। कुछ ही समय में नितिन के प्रयास के सकारात्मक परिणाम आने लगे और उनके माॅडल पर लोगों का विश्वास बढ़ने लगा। सोशल मीडिया के माध्यम से उन्होंने आर्गेनिक खेती के लाभों से अपने जानने वालों को अवगत कराना शुरु किया। परिणामतः उनकी फसल को लोग हाथों हाथ लेने लगे।

नितिन काजला के माॅडल कुछ इस तरह से हैं।

फसल के पोषण के लिए:

रासायनिक उर्वरक के विकल्प के रुप में तैयार किये गये जैविक खाद के लिए गोबर, गौमूत्र, गुड़ और बेसन को मिलाकर मटके में खाद तैयार किया जाता है। बुआई से पहले खेतों में इसका प्रयोग किया जाता है और खड़ी फसल पर पानी में मिलाकर इसे छिड़का जाता है। पौधे के पोषण में मदद करने वाले इन्ट्राक्राॅप पद्धति अपनाते हैं। हरी खाद के साथ गोबर की खाद को जीवाणुओं की मदद से और पोषक बना कर खेतों में डालते हैं। जिससे फसलों की पोषकता की आपूर्ति होती है।

कीटनाशक के रुप में:

फसलों को कीटों से बचाने के लिए नीम, करंज, आक, धतूरा आदि के कड़वे पत्तों को गौमूत्र में उबालते हैं फिर उसमें तीखे मिर्च और लहसून को पिस कर मिलाते हैं। इस मिश्रण को छानकर 10 गुणा पानी मिलाकर फसलों पर छिंड़काव करने से उनपर कीटाणु नहीं बैठते। फंगस से बचाव के लिए छांछ (बटरमिल्क) में ताँबे का टुकड़े डालकर कुछ दिन रखते हैं फिर उसमें 10% पानी मिला कर फसलों पर छिड़काव करते हैं जिससे फंगस वाले रोग से मुक्ति मिलती है।

वायरस जनित रोग के लिए:

500 मिली लीटर दूध में 50 ग्राम हल्दी को मिलाकर उसे 15 लीटर पानी के मिश्रण के साथ फसलों पर स्प्रे करने से वायरस जनित रोग से फसलों का बचाव होता है।

अपने इन्ट्राक्राॅप खेती के बारे में बात करते हुए उन्होंने केनफ़ोलिओज़ की टीम को बताया, “गन्ने को चूने के पानी में 5 मिनट धो कर लगाया है जिससे उसका जर्मिनेशन बहुत अच्छा आता है। चार फीट की दूरी के बीच अभी लहसून लगाया है, दूसरे प्लाॅट में बीच में सरसों लगाई है। सरसो, लहसून की कटाई के बाद कोई दलहन मूंग या उड़द लगायेंगे। इससे मुख्य फसल गन्ना के साथ और भी दूसरे फसल से कमाई में वृद्धि होती है। फिर जैविक गन्ने का स्वयं गुड़ बना कर 80-100 रुपये किलो बेचते हैं। और वे सरसों से तेल भी निकाल कर बेचते हैं। इस प्रकार हर फसल को स्वयं प्रसंस्कृत कर बेचते हैं। किसी भी बिचौलियों को बीच में नहीं आने देते।”

इस प्रकार कई घरेलू उपायों का नितिन प्रयोग करते हैं और दूसरे किसानों से भी साझा करते हैं। अपने प्रयोगों के अच्छे परिणामों को शेयर करने के लिए उन्होंने फेसबुक और वाट्सएप्प जैसे सोशल नेटवर्क का सहारा लिया और फ्री आॅनलाईन ट्रेनिंग की भी शुरुआत की है। अपने कुछ मित्रों के साथ टीम बना कर वे किसानों को जैविक खेती के लिए प्रेरित करते हैं। नितिन के नुस्खों से किसानों को लाभ मिलने लगा और खेत-खेत तक उनके प्रयोग पहुँचने लगे। उनके बढ़ते नेटवर्क के साथ-साथ आर्गेनिक खेती के विस्तार की उनकी जिम्मेदारी भी बढ़ने लगी। अपने अभिलाषा को साकार रुप मिलता देख नितिन ने नए आयाम रचते हुए साकेत (SAKET- Sustainable Agriculture Knowledge and Empowerment Trust) नामक संस्था की नींव रखी। साकेत के फेसबुक ग्रुप में 2 लाख से अधिक किसान जुड़े हैं और हर दिन 10,000 से अधिक किसान आर्गेनिक खेती पर चर्चा करते हैं और अनुभवों को साझा करते हैं।

साकेत संस्था किसानों को आर्गेनिक खेती के प्रति तो जागरुक बना रही है, साथ ही साथ उपभोक्ताओं को भी रासायनों से उपज होने वाले खतरों के प्रति भी सचेत कर रही है और आर्गेनिक खाद्य पदार्थों के प्रति सजग कर रही है। समय-समय पर नितिन और उनकी टीम 200-500 किसानों के लिए 2 दिनो का फ्री वर्कशाॅप का आयोजन करते हैं, जहाँ थ्योरी और प्रैक्टिकल माध्यम से ट्रेनिंग दी जाती है। यू.पी., उत्तराखण्ड, हरियाणा, मध्यप्रदेश, राजस्थान के हजारों किसानों ने नितिन के माॅडल खेती से लाभ उठाया है।

इंटीग्रटेड आर्गेनिक फार्मिंग (एकीकृत जैविक खेती) के नाम से ट्रेनिंग को दो भागों में बाँट कर ट्रेनिंग का माॅड्यूल बनाया गया है। बेसिक ट्रेनिंग के तहत उन किसानों को वर्गिकृत किया जाता है जो रासायनिक खेती कर रहे हैं परंतु आर्गेनिक खेती करना चाहते हैं। इसके तहत किसानों को रसायनों के प्रयोग के नुकसान और जैविक खेती के फायदों से अवगत कराया जाता है। उन्हें जैविक खाद, उर्वरक, कीटनाशक आदि तैयार करना सिखाया जाता है। किसानों को कम से कम एक एकड़ पर आर्गेनिक खेती अपनाने के लिए प्रेरित किया जाता है। एडवांस ट्रेनिंग के तहत वैसे किसान होते हैं जो आर्गेनिक खेती कर रहे हैं या करियर के रुप में अपनाना चाहते हैं। उन्हें आर्गेनिक खेती में आ रही समस्याओं के निवारण, उत्पादों की ग्रेडिंग, पैकिंग और मार्केटिंग के गुर सिखाए जाते हैं। साकेत संस्था आर्गेनिक खेती के सर्टिफिकेशन और मार्केटिंग में भी किसान साथियों का सहयोग करती है। इन सब के साथ आर्गेनिक खेती को प्रमोशन के लिए संस्था ने साकेत मार्गदर्शिका नाम से पत्रिका भी प्रकाशित करना शुरु किया है।

साकेत का माॅडल बाजार से किसानो की निर्भरता को कम करने की ओर प्रतिबद्ध है। इसके लिए नितिन एक ऐसा प्लेटफार्म तैयार करने में लगे हैं, जहाँ किसान सीधे उपभोक्ताओं तक अपने उत्पाद को पहुँचा सके। इसके किसानों को उनके उत्पाद की उचित कीमत मिल सके और ग्राहकों को उनकी खरीद पर सही, शुद्ध और पोषक खाद्यान्न मिल सके। नितिन जल्द ही ऐसा ऐप लाने की तैयारी मे हैं जहाँ किसानों की समस्याओं का सामाधान हो और उनके उत्पादों को बाजार मिल सके।

केनफ़ोलिओ़ज से कृषि महत्ता पर अपनी राय रखते हुए उन्होंने कहा, “उत्तम खेती मध्यम बान, करे चाकरी कुकर निदान। अर्थात् “आज हमें खेती को पहले स्थान पर लाना है तो युवाओं को आगे आ कर खेती को नए आयाम देने होंगे।”

कृषि और उससे जुड़ी गतिविधियां महत्वपूर्ण है। इसलिए कृषि के विकास में हर किसी को योगदान देना चाहिए। नितिन काजला जैसे एक शिक्षित युवक का यह प्रयास अनुकरनीय है। आज के वक्त की पुकार है कि शिक्षित युवक अपने हुनर, ज्ञान, पद्धतियों से किसानों को अवगत कराएँ और उनके कल्याण के लिए सार्थक कदम बढ़ाएं ताकि किसानों को उनकी मेहनत का मूल्य और सम्मान मिले और उपभोक्ताओं को शुद्ध और सस्ता खाद्यान।

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