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पिता के फलते-फूलते कारोबार को छोड़ शुरू किया खुद का स्टार्टअप, आज है करोड़ों में टर्नओवर

चाहे आप कितनी भी सुकून भरी जिंदगी जी रहे हों, या चाहे आप कितना भी कमाते हों; यदि आप अपने काम को पसंद नहीं करते तो सब बेमानी है। ऐसा ही कुछ बैंगलोर यूनिवर्सिटी से एमबीए किये हुए नवाज़ शरीफ के साथ हुआ। उन्होंने 1997 में अपने पिता का स्टील-बिज़नेस ज्वाइन किया। यह बिज़नेस उस तरह से अच्छा नहीं चल रहा था जैसा कि वे चाहते थे। हालात बदलने की आशा के साथ उन्होंने और अधिक समय लगाया और प्रयास भी किये, लेकिन शरीफ को यह महसूस हो गया था कि उन्हें इस काम में दिलचस्पी नहीं है। वे कुछ नया करने की कोशिश करना चाहते थे, ऐसा कुछ जिसे करने में उन्हें सुकून प्राप्त हो।

बिरयानी के मुरीद शरीफ को यह आभास हो गया कि वे कुछ इसी तरह का काम करना चाहते हैं। एक दिन जब वे अपनी अम्मी के हाथ की बिरयानी का लुत्फ़ उठा रहे थे तभी उनके मन में यह विचार आया कि भारत में बिरयानी सभी जगह खाया जाता है और लोग इसे काफी पसंद भी करते हैं। अगर इसे हाइजीनिक मील के रूप में पैक कर प्रस्तुत किया जाये तो बात ही कुछ और होगी। इसी सोच के अनुसार उन्होंने ‘बिरयानी इन ए बॉक्स’ के आइडिया के साथ शुरुआत की। वे इसी अवधारणा के साथ आगे बढ़े और अम्मीज़ बिरयानी की नींव रखी।

उर्दू नाम होने की वजह से उनके परिवार और दोस्तों के विचारों में कुछ संदेह था। परन्तु अपने अंतर्मन की आवाज़ सुनकर आखिरकार उन्होंने इसी नाम के साथ आगे बढ़ने का निर्णय लिया। उन्हें विश्वास था कि लोग इसे इसी नाम से स्वीकार करेंगे। उसी दौरान बहुत से इसी तरह के और आउटलेट्स की शुरुआत हुई थी। उन्होंने यह तय किया कि वे फ्रेंचाइजी मॉडल के साथ ही आगे बढ़ेंगे। वेंचर कैपिटल फण्ड सैफ पार्टनर्स ने 2011 में अम्मीज़ बिरयानी से संपर्क किया और दोनों की पटरी मेल खा गयी।

अपने फ़ूड चेन के जरिये शरीफ ने 40 करोड़ रूपये की पूंजी जुटाई। आज बैंगलोर में उनके 13 आउटलेट्स हैं। पूंजी जुटाने के बाद उनका विचार अम्मीज़ को पूरे भारत में फ़ैलाने की है। पहले बैंगलोर में ही अपने आप को पूरी तरह से स्थापित करने की चाह है। और सही समय आने पर पूरे देश में एक नेशनल ब्रांड के रूप में अपने आप को स्थापित करने का विचार है।

इस स्थिति तक पहुंचने के लिए नवाज़ को अनगिनत संघर्षों का सामना पड़ा। जहाँ डिलीवरी की बात आती थी तब बहुत सारी चुनौतियाँ उनके सामने आयी जैसे बिरयानी गर्म रहने की या उसकी नमी बरक़रार रखने की। इन सभी बातों का समाधान जल्द ही निकाल लिया गया।  इस तरह उनके रास्ते में आई सारी बाधाएं एक-एक करके खत्म होती गई।

उनके सभी आउटलेट्स सही ढंग से लगभग एक ही साइज 500 स्क्वायर फ़ीट के होते हैं। उसमें छोटा सा एक डाइनिंग एरिया होता है। परन्तु उनके बिज़नेस का मुख्य आधार बिरयानी की डिलीवरी ही है। नवाज़ जानते थे कि आज के ज़माने के बिज़नेस में पैकेजिंग का महत्वपूर्ण रोल है। बिरयानी के साथ-साथ एक अलग छोटे से खाने में रायता, मिठाई और एक पाउच में चम्मच, पेपर नैपकिन और टूथपिक इतने करीने से सजाया जाता था कि बरबस ही सबका ध्यान उस ओर चला जाता था। इतनी बारीकी से वे सभी चीजों का ध्यान रखते हैं। इसी वजह से आज अम्मीज़ बिरयानी सफलता की ऐसी ऊंचाई को छू सकी है। वे अपने ग्राहकों से बहुत प्यार करते हैं और ‘अतिथि देवो भव’ की उक्ति पर दृढ़ता से विश्वास करते हैं।

चाहते तो नवाज़ अपने पिता का फलता-फूलता बिज़नेस अपना कर आराम की जिंदगी बिता सकते थे। परन्तु उन्होंने वही किया जो उनके दिल ने कहा। इस बिजनेस के लिए उन्हें कोई अनुभव भी नहीं था, हाँ चाहत ज़रूर थी और कुछ नया करने का जूनून। और इसी जूनून के साथ वे चल पड़े एक नए सफर की ओर, जहाँ सफलता के साथ-साथ कुछ नया और अनूठा करने का संतोष था।

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