,

उत्तर प्रदेश की बस्ती से निकलकर NASA तक का सफ़र तय करने वाली एक लड़की की प्रेरक कहानी

जिंदगी की असली उड़ान बाकी है, जिंदगी के कई इम्तिहान बाकी हैं।
अभी तो नापी है मुट्ठी भर जमीन हमने, अभी तो सारा आसमान बाकी है।।

यह पंक्तियाँ बिल्कुल सटीक बैठती है आज की बेटियों पर। एक पुरुष प्रधान देश के तमाम विपरीत परिस्थितियों को झेलते हुए भी बेटियां इस समाज में अपनी एक अलग पहचान बनाती जा रही हैं। बेटियां आज हर क्षेत्र में सफलता के झंडे गाड रही हैं। शायद ही कोई क्षेत्र बच गया हो जहाँ उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा न मनवाया हो। ऐसा क्षेत्र जहां लोगों की धारणा थी कि इसमें केवल पुरुष ही यह काम कर सकते हैं, वैसे क्षेत्रों में भी जाकर महिलाओं ने उस धारणा को तोड़ने का काम किया है। देश की रक्षा से लेकर अंतरिक्ष की उड़ान तक में बेटियां आज सबसे आगे है।

आज हम एक ऐसी ही बेटी की बात करने जा रहे हैं जिसने हौसलों की राह पर चलते हुए अपने सपने को सच कर दिखाया है। नासा द्वारा प्रशिक्षण के लिए बुलावा भेजे जाने के बाद अब वे अंतरिक्ष जाने की ओर अग्रसर हो गयी हैं।

उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के गांधी नगर की रहने वाली 33 वर्षीय अनुश्री श्रीवास्तव आज लाखों बेटियों के लिए प्रेरणास्रोत बन गई हैं। अनुश्री के पिता राकेश श्रीवास्तव रेलवे के अधिकारी हैं व उनकी माँ सुनीता एक गृहिणी हैं। अनुश्री अपने माँ-बाप की इकलौती बेटी हैं। अनुश्री अब अंतरिक्ष में जाने की तैयारी कर रही हैं। इन दिनों वे यूनाइटेड स्टेट स्थित नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन यानी नासा के मुख्यालय में इसकी ट्रेनिंग ले रही हैं। अनुश्री कल्पना चावला को अपना आदर्श मानती हैं। दरअसल कल्पना चावला से प्रेरित होकर उन्होंने सीविल सर्विस की तैयारी तक छोड़ दी। और फिर उनका सारा फोकस स्पेस रिसर्च की ओर मुड़ गया।

2003 में कल्पना चावला की अंतरिक्ष अभियान से लौटते समय मौत होने की घटना ने अनुश्री को बहुत प्रभावित किया। उस वक़्त वे लखनऊ में सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रही थी। सिविल सर्विसेज की तैयारी के दौरान ही उन्होंने साइंस की पुस्तक में मंगल ग्रह पर जीवन की तलाश के बारे में गंभीरता से पढ़ा और यही से मंगल की गुत्थियाँ समझने और सुलझाने की ज़िद ने उन्हे अंतरिक्ष में करियर बनाने को प्रेरित किया। इसके बाद उन्होंने लखनऊ के बायो एक्सिस डीएनई रिसर्च सेंटर से बायो टेक्नोलॉजी में शार्ट टर्म प्रोजेक्ट की ट्रेनिंग लेना शुरू किया। अनुश्री की खगौल विज्ञान और अंतरिक्ष अन्वेषण के बारे जानने की रुचि में लगातार बढ़ती गयी। पृथ्वी से परे जीवन की संभावना को समझना एक कला छात्र के लिए चुनौतीपूर्ण था। उसी दौरान उन्हें ब्रिटेन के एसेक्स विश्वविद्यालय में बायोटेक्नोलॉजी में मास्टर ऑफ साइंस प्रोग्राम में शामिल होने का ऑफर मिला जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया।

मास्टर्स की पढ़ाई के दौरान ही अमेरिका की एक कंपनी ने उन्हें मंगल ग्रह एक प्रशिक्षण अभियान में जुड़ने का प्रस्ताव दिया। इसमें यूटा के रेगिस्तान में प्रशिक्षण दिया जाना था। यहां भारत से अनुश्री के अलावा सात अन्य देशों के प्रशिक्षणार्थी भी शामिल थे। प्रशिक्षण के दौरान उन्हें पंद्रह किलो का स्पेस सूट पहन कर काम कराया जाता था। दो माह नार्थ पोल यानी उत्तरी ध्रुव के करीब प्रशिक्षण दिया गया, जहां उन्होंने दो माह में कभी रात नहीं देखी। इसके अलावा अनुश्री 2014 में कैप्सूल कॉम्युनिकेशन अधिकारी (कैपकॉम) के रूप में एमडीआरएस मिशन सपोर्ट टीम का हिस्सा रही हैं। 2015 में, वह एमडीआरएस रिमोट साइंस टीम (आरएसटी) में क्रू बायोलॉजिस्ट के रूप में शामिल हुई।

अनुश्री ने संयुक्त राष्ट्र के अंतर्राष्ट्रीय वाटर कोऑपरेटिव (आईवाईडब्ल्यूसी) इंडिया कार्यक्रम 2013 में समन्वयक के रूप में कार्य किया है। वह एस्ट्रोबायोलॉजी के इंडिया संस्करण में आयोजन समिति का मुख्य सदस्य है, जिसका उद्देश्य ज्योतिष विज्ञान और अंतरिक्ष के बारे में जागरूकता को प्रोत्साहित करना और बढ़ावा देना है। साथ ही अनुश्री नासा स्पेसवर्ड बाउंड इंडिया अभियान 2016 का भी हिस्सा रहीं है। जिसमें वे विज्ञान और समन्वय टीम दोनों के सदस्य के रूप में रही।

अनुश्री के अनुसार अब उन्होंने अपना पूरा जीवन मंगल ग्रह पर जीवन की खोज के लिए समर्पित कर दिया है। एक अप्रैल से नासा के गोडार्ड स्पेस फ्लाइट सेंटर में उनका प्रशिक्षण शुरू हो गया है। जहाँ उन्हें चार माह का प्रशिक्षण दिया जाएगा।

अनुश्री ने साबित कर दिया कि यदि लगन और दृढ़ इच्छाशक्ति हो तो किसी भी लक्ष्य को पूरा किया जा सकता है।

आप अपनी प्रतिक्रिया नीचे कमेंट बॉक्स में दे सकते हैं और इस पोस्ट को शेयर अवश्य करें 

आपका कमेंट लिखें