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500 रूपये से शुरुआत कर 800 करोड़ का साम्राज्य खड़ा करने के पीछे था यह निहायत साधारण आइडिया

जटिलता के बिना सफलता की राह पूरी नहीं हो सकती। इस राह में हमेशा कुछ न कुछ बाधाएं आपका इंतजार करती हैं। ये बाधाएं आपको और बेहतर बनाने में अपना योगदान देती हैं और भविष्य की समस्याओं के लिए आपको तैयार करती हैं। अगर आपका लक्ष्य साफ है तो यह बाधाएं आपको आगे बढ़ने से रोक नहीं सकतीं बल्कि यह आपको और आपके विश्वास को मजबूत बनाती हैं। धनंजय दातार की सफलता यही बयां करती है।

मसाला किंग के नाम से मशहूर धनंजय की पहली हवाई जहाज की यात्रा से ही उनका सब कुछ बदल गया। वे बचपन से ही महत्वाकांक्षी थे और लोग जल्द ही उनसे प्रभावित हो जाते थे। वे नौकरी की तलाश में दुबई गए और जब वे लौटे तो महँगे उपहारों के साथ लौटे। आगे चल कर वही धनंजय फोर्ब्स की मिडिल-ईस्ट की अमीरों की सूची में 45वां स्थान प्राप्त किया। उन्होंने अपनी क्षमता सिद्ध की और सभी के लिए एक उदाहरण प्रस्तुत किया।

यह 1984 की बात है जब अकोला के धनंजय ने अपना भाग्य आज़माने के लिए दुबई जाने का निश्चय किया। 10 दीनार के तीन नोट (लगभग 500 रूपये) लेकर, भाग्य की उड़ान के साथ प्लेन में बैठा। उनके पिता पहले से वहां थे और रोज़ी-रोटी के लिए संघर्ष कर रहे थे। इसलिए कोई आश्चर्य नहीं था कि यह 19 साल का लड़का यहाँ कुछ करना चाहता था। उन्होंने लक्ज़री का पहला स्वाद तब चखा जब एयर होस्टेस ने उन्हें बिज़नेस क्लास में अपग्रेड किया। अलग-अलग तरह के चॉकलेट्स और चीज़ उन्होंने टेस्ट किये जो उनके लिए एकदम नए थे और महंगे भी।

यह उल्लास से युक्त यात्रा उस समय खत्म हुई जब प्लेन ने दुबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर लैंड किया और उनके पिता उन्हें माल वाहक गाड़ी में लेने आये। वे धनंजय को एक शॉप में लेकर आये जो उनका अपना था। वह एक छोटी सी जगह थी भविष्य के इस बिज़नेसमैन के लिए।

वे अपने पहले दिन को अच्छी तरह से याद करते हुए बताते हैं कि “ शुरू तो हुआ रोमांचित प्रत्याशा के साथ और ख़त्म तोड़ देने वाली निराशा के साथ हुआ।”

धनंजय के शुरुआती दिन चुनौतियों से भरे थे, शारीरिक और मानसिक दोनों तरह से। वहां की झुलसाने वाली तेज गर्मी कुछ अच्छा होने नहीं दे रही थी और अरबी और अंग्रेजी नहीं आने की वजह से वे अपने को पराया महसूस कर रहे थे। जल्द पैसे कमाने की उनकी सोच कमज़ोर पड़ने लगी और घर की दूरी के चुभती अहसास के सामने वे घुटने टेकने लगे थे। वे अपने पिता से कुछ मैनेजमेंट स्किल सीखना चाहते थे, पर उनके पिता का ज्ञान उनके ही स्तर का था। उन्हें उतनी मदद नहीं मिली।

उनके पिता के संपर्क की वजह से उन्हें एक नौकरी मिली, पर वे ज्यादा दिनों तक नहीं कर पाए। लगातार निराशा के चलते धनंजय ने अपने आपको भाग्य के सहारे छोड़ दिया और फिर से अपने पिता के साथ पूरी लगन से काम करने लगे। दुबई ने उन्हें निराश नहीं किया। वे फिर से बाजार में अपने आप को खड़ा करने की कोशिश में लग गए। बैंक लोन की मदद से धनंजय ने एक दूसरा शॉप ले लिया।

एक-एक करके वे आगे बढ़ते चले गए और आज वे अल अदील ट्रेडिंग फर्म के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर का पद संभाल रहे हैं। इनकी कंपनी का सालाना टर्न-ओवर 800 करोड़ रूपये का है। दुबई बाजार की और ग्राहकों की जरूरतों की उनकी समझ की वजह से ही यह अंतर संभव हो पाया है। इस कंपनी को शुरू करने के पीछे का आइडिया बिलकुल ही साधारण था।

धनंजय के अनुसारअल अदील कंपनी की शुरुआत की संकल्पना वहां रहने वाले भारतीयों की दिन-प्रतिदिन की जरूरतों को ध्यान में रख कर की गई है। मसालें, दालें, ड्राई फ्रूट्स, नमकीन, अचार के अलावा हम भारतीय ग्राहकों को विशेष त्यौहारों की जरूरतों का सामान भी उपलब्ध कराते हैं।

उद्यमी बनना बहुतों का सपना होता है पर कुछ ही उन्हें पूरा कर पाते हैं। धनंजय दातार की कहानी उन सभी के लिए प्रेरणास्रोत है जो सफल होना तो चाहते हैं परन्तु बार-बार की असफलता से अपनी आशा खो देते हैं। वे कहते हैं कि धीरज ही सफलता की चाबी है। और इनकी कहानी से लगता है कि यह बिलकुल सच है।

दातार सभी के लिए मैसेज देते हुए कहते हैं “ दिमाग ठंडा रखो और जबान में मिठास। चुनौतियों और ग्राहकों से डील करते वक्त यही सबसे महत्वपूर्ण नियम होता है। इस उद्धरण का हमेशा पालन करें -ईमानदारी सर्वोत्तम नीति है।”

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