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शरीर से पैरालाइज्ड इस शिक्षिका का जुनून तो देखिये पिछले 7 साल से बेड पर लेटे-लेटे ही चला रही स्कूल

आजकल छोटी-छोटी बातें हमें तनाव ग्रस्त करने लगती है और हम खुद पर से ही विश्वास खोने लगते हैं। परेशानियों से लड़ने के बजाय हम खुद की किस्मत को कोसने लग जाते हैं या फिर सारा दोष भगवान के माथे मढ़ने लगते हैं। लेकिन दुनिया में ऐसे भी कुछ लोग हैं जो जीवन की बड़ी से बड़ी मुसीबतों को हँसते हुए हिम्मत के साथ पार करने का दृढ़ संकल्प लेकर बढ़ते जाते हैं और दुनिया के सामने मिसाल कायम करते हैं।

हमारी आज की कहानी भी एक ऐसी महिला की है जो साहस, निश्चय और ईमानदारी का सशक्त उदाहरण हैं। जिनके बारे में जानकर आपको दिल से उन्हें सलाम करने की इच्छा होगी। सहारनपुर में नेशनल पब्लिक स्कूल की प्रिंसिपल 64 वर्षीया उमा शर्मा हैं हमारे आज के कहानी की नायिका।

पिछले 7 साल से उमा का गले से नीचे का पूरा शरीर पैरालाइज्ड है और वह बिस्तर पर ही लेटी रहती हैं। इनके बावजूद वह नियमित रूप से अपना स्कूल चला रही हैं। इतना ही नही वह बच्चों की वर्चुअल क्लास भी लेती हैं। उमा का शरीर भले बेजान हो लेकिन उम्मीद और हौसले बुलंद है। आज के दौर में बच्चे ही नहीं बल्कि टीचर भी स्कूल नहीं जाने के बहाने खोजते हैं, ऐसे में उमा अपनी ड्यूटी पूरी ईमानदारी के साथ पिछले दस सालों से निभा रही हैं।

सहारनपुर शहर के नुमाईश कैंप इलाके में रहने वाली उमा पूरी तरह से अकेली हैं। संघर्षों के साथ उमा का चोली दामन का साथ रहा है लेकिन उनकी हिम्मत लाखों लोगों के लिए प्रेरणास्त्रोत है। 27 सालों से उमा ने दुखों के हर रूप को देखा है, सहन किया है। साल 1991 में जब उनके पति का निधन हो गया तो उनकी जिंदगी के सारे रंग-बेरंग हो गए। इतना ही नहीं उनकी जिंदगी तब और मुश्किल की घड़ी आई, जब उनके एकमात्र बेटे राजीव की महज 21 साल की उम्र में मौत हो गई।

उमा के दुःखों का अंत यहाँ भी नहीं हुआ साल 2010 में उमा ने अपनी बेटी ऋचा को भी खो दिया। लेकिन मुश्किल वक्त उनके लिए अभी भी खत्म नहीं हुआ, साल 2007 में उमा आंशिक पैरालिसिस का शिकार हो गई। स्थितियां लगातार बिगड़ने लगी और साल 2010 में वह पूरी तरह से पैरालाइज्ड हो गई आज वह सिर्फ अपने सिर और हाथों को हो हिला सकती हैं। इतनी मुसीबतों और काल की क्रूरता का शिकार होने के बाद भी उमा ने अपने आप को संभाले रखा। हालांकि पैरालाइज्ड होने के कारण उमा के लिए अपने उस स्कूल को संचालित कर पाना बहुत मुश्किल था जिसकी स्थापना उन्होंने 1992 में की थी। खुद को व्यस्त रखने के लिए उन्होंने शिक्षण कार्य में ही जुटे रहने का मन बनाया। साथ ही ऐसे बच्चों की तलाश की, जिनके भीतर ऐसी भावनाएं पैदा हो गई थी कि वें पढ़ लिख नहीं सकते।

उमा बताती है कि “मैंने तय किया कि हार नहीं मानूंगी और जो कार्य मैं सबसे ज्यादा पसंद करती हूं वह करती रहूंगी यानी कि अपने स्कूल को संचालित करूंगी। सबसे पहले हमने स्कूल और मेरे घर पर डिश कनेक्शन लगवाया, जिससे मैं स्कूल की हर गतिविधि का वीडियो आवाज़ के साथ सुन सकती हूँ।”

आज सात साल गुजर गए और डिजिटल आविष्कार उमा के लिए वरदान साबित हुए। स्कूल के प्रबंधक सुरेंद्र चौहान ने बताया कि “सीसीटीवी कैमरे क्लासरूम, स्टाफ रूम, प्ले ग्राउंड समेत पूरे स्कूल परिसर में लगे हुए हैं। उमा अपने टैबलेट के जरिए स्कूल की प्रत्येक गतिविधि को देख सकती हैं।”

उमा समय-समय पर शिक्षकों और बच्चों से टैबलेट के जरिए सीधे तौर पर बात करती हैं और शिक्षकों से स्कूल के बारे में बातचीत करने के लिए उन्हें घर बुला लेती है।

वर्तमान में उमा भोपाल नगर स्थित अपने घर में रहती हैं जो कि ज्वालानगर स्थित उनके स्कूल से पांच किलोमीटर की दूरी पर है। उमा के इस स्कूल में आठवीं कक्षा तक की पढ़ाई होती है। स्कूल में कार्यरत सभी सदस्य अपनी प्रिंसिपल के प्रयासों की सराहना करते नही थकते।

वाकई उमा शर्मा ने साबित कर दिया की मुसीबतें इंसान को इतना मजबूत भी बना देती है कि कोई भी परिस्थिति उसके दृढ़ निश्चय को बदल पाने में असमर्थ हो जाती है।

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