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MBA के बाद नौकरी की बजाय किसानी को चुना, एक गाय से शुरुआत कर आज कर रहे करोड़ों का टर्नओवर

किसी भी व्यक्ति के जीवन में रोज़गार का चुनाव बेहद महत्वपूर्ण होता है। और जब आप स्वरोजगार का चुनाव करते हैं तो वह आपकी जीवन शैली को प्रभावित तो करता ही है, साथ-ही-साथ आपके आस-पास के लोगों को भी प्रभावित करता है। मुख्यतः स्वरोजगार को चुनते वक्त अपनी दिलचस्पी और क्षमता का पूरा ध्यान रखना चाहिए जिससे आपकी सेवा प्राप्त करने वाले उपभोक्ता को कुछ बिल्कुल नई सुविधा मिले या उनकी किसी समस्या का समाधान हो। हमारी आज की कहानी एक ऐसे ही पहली पीढ़ी के उद्यमी की है जिन्होंने स्वरोजगार का रास्ता चुना और दूध की शुद्धता की समस्या के समाधान के एक कृषि स्टार्टअप की आधारशिला रखी।

उत्तर प्रदेश के बरेली में जन्मे मोहित बजाज ने 1 गाय के साथ घर-घर दूध पहुँचाने से येलो डेयरी की शुरुआत की। आज 3 साल के बाद उनके पास 50 उन्नत नस्ल की गाय-भैंसे हैं और लगभग 1 करोड़ का टर्नओवर करते हैं। मोहित के पिता श्री सुरेन्द्र कुमार बजाज रक्षा मंत्रालय में कार्यरत हैं और माता श्रीमती दीपा बजाज एक कुशल गृहिणी हैं। तीन भाइयों में सबसे बड़े मोहित के इस काम में उनका साथ उनके दूसरे भाई भी देते हैं। वाणिज्य विषय में स्नातक करने के बाद उन्होंने लाल बहादुर शास्त्री इंस्टिट्यूट आॅफ मैनेजमेंट एण्ड टेक्नोलाॅजी से एम.बी.ए. की डिग्री हासिल की। वे शुरु से ही कुछ अलग और अपना करना चाहते थे। डिग्री मिलते ही 3-4 कम्पनीज ने जॉब आफर की, लेकिन जॉब जॉइन न करने का फैसला किया और वापस बरेली लौटकर उद्यमिता को गले लगाया।

केनफ़ोलिओज़ से ख़ास बातचीत में उन्होंने बताया, “कॉलेज की छुट्टीयों में मैं घर पर था। एक दिन हमारा दूधवाला दूध दे कर गया तो मैंने माँ से पूछा कि यह दूध कितने का देता है तो उन्होंने बताया 40 रुपये प्रति लीटर। फिर मैंने इसकी शुद्धता के बारे में पूछा तो वह इसकी विश्वसनीयता को लेकर हमेशा संदिग्ध रहा करती थी। तभी मैंने यह सोच लिया था कि दूध की अशुद्धता की समस्या के विकल्प पर अवश्य काम करुँगा।”

उन्होंने देखा कि दूध प्रत्येक व्यक्ति के हर दिन की पौष्टिकता की एक सामान्य जरुरत है। विशेष रुप से छोटे बच्चों और बुजुर्गों के लिए। वैसे ही विभिन्न भोजन पदार्थों में मिलावट से आधुनिक जीवन प्रत्याशा कम हुई है तो कम से कम बच्चों और उम्रदराज लोगों जिनके लिए दूध एक आवश्यक तत्व है वह शुद्धता की सभी कसौटियों पर खड़ा हो। इसी सोच के साथ उन्होंने डेयरी उद्योग शुरू करने की दिशा में कदम बढ़ाया।

मोहित के माता-पिता उनके इस निर्णय के साथ थे और संयुक्त परिवार में रहनेवाले कुछ लोगों को आश्चर्य तो हुआ परंतु सभी सदस्यों ने इसके उद्देश्य को समझ कर उनका उत्साहवर्द्धन किया। ऊर्जावान मोहित आई.वी.आर.आई. से पशुपालन और डेयरी बिजनेस की ट्रेनिग ले कर जब वापस आए तो 2014 में येलो मिल्क नाम से डेयरी फार्म की स्थापना की। प्रारंभ में उन्होंने अपनी पूँजी 35,000 रुपये में स्थानीय हास्टिन फ्रेसियन नस्ल की गाय से शुरुआत की जिसकी क्षमता 20 लीटर दूध की थी। एक बड़े संयुक्त परिवार में ही दूध उत्पादन का बड़ा हिस्सा खपत हो जाता था और शेष की आपूर्ति उन्होंने आस पड़ोस में शुरू की।

गुणवत्तापूर्ण दूध की माँग जल्द ही बढ़ने लगी और फिर उन्होंने एक बड़ी कारोबारी संभावनाओं को देखते हुए गायों की संख्या में बढ़ोतरी कर 10 कर दी। सहयोग के लिए उन्होंने एक ग्रामीण को साथ रखा जिससे उन्हें काफी कुछ सीखने को मिला। तकनीक की तो उन्होंने ट्रेनिंग ले रखी थी पर बहुत सी मूलभूत और सूक्ष्म जानकारी उन्होंने अपने ग्रामीण कर्मचारियों से ही सीखा।

“एक बार होली की छुट्टी में मेरे दो कर्मचारी नहीं आए ऐसे में उन सब से ली गई सीख बहुत काम आई और गायों की साफ-सफाई, सेवा मैंने अकेले की और उन्हें किसी तरह की परेशानी नहीं होने दी”, उन्होंने बताया।

उन्होंने अपनी डेयरी फार्म शहर से दूर पैतृक जमीन के टुकड़े पर की। मगर वहाँ बिजली की आपूर्ति नहीं हो पाने के कारण वे आधुनिक उपकरणों का प्रयोग नही कर पा रहे हैं। कई बार आवेदन करने और विभाग में गुहार लगाने के बावजूद कोई कार्यवाही नहीं हुई जिस कारण सारे काम हाथों से ही करने पड़ते हैं। वे दूध को बोतलों में बंद कर सील करते हैं और घर-घर सप्लाई देते हैं। इसके लिए उन्होंने 10 लोगों को अपने यहाँ रोज़गार दे रखा है। दूध के साथ-साथ उन्होंने दही, घी, मक्खन, छांछ, मठ्ठा, पनीर इत्यादि का उत्पादन भी शुरु कर दिया है। पूरे बरेली शहर में शुद्ध और पौष्टिक दुग्ध उत्पादों की फ्री होम डिलीवरी की जाती है। ग्राहकों की मांगों को पूरा करने के लिए वे ग्रामीणों से भी उचित मूल्य पर दूध खरीदते हैं और हाथों हाथ उन्हें भुगतान करते हैं। इससे ग्रामीणों को अपने गाँव में ही बेहतर बाजार मिल गया है। इससे गाँव में लघु स्तर पर रोज़गार का सृजन हो रहा है।

प्रारंभ में एक गाय और उसके कुछ समय बाद एक भैंस उन्होंने बरेली से ही ली और फिर उन्होंने हरियाणा जा कर पशुओं को खरीदी की। वर्तमान में भैंस की नस्ल मुर्राह है और गायों की किस्मों में हाॅस्टिन फ्रेसियन, जर्सी, साहिवाल और कुछ देशी नस्लें भी हैं। अभी वे 350 लीटर दूध की सप्लाई देते हैं और 150 लीटर से दूध के अन्य उत्पाद तैयार किए जाते हैं। जैसा कि उन्होंने बताया कि उनके फार्म में बिजली आपूर्ति नहीं है जिसके कारण गाय के रख-रखाव और उत्पादन प्रक्रिया की लागत काफी हो जाती है। मगर घास-भूसे की व्यवस्था उनके खुद के खेतों से हो जाती है जो लागत में थोड़ी राहत देती है। मगर गायों के लिए दाने खरीदने पड़ते हैं और मानवीय श्रम को वेतन देना होता है।

उन्होंने बताया कि प्रति पशु की देखभाल पर प्रतिदिन खर्च लगभग 210 रुपये की होती है। मोहित के चाचा उनकी काफी मदद करते है और उनके दूसरे भाई लोग अपशिष्ट पदार्थो से जैविक खाद का निर्माण करते हैं जिससे आॅर्गेनिक फार्मिंग में काफी मदद मिलती है।

अपने अनुभव के आधार पर उन्होंने कहा, “यदि आप किसी काम में हैं तो उसे पूरी शिद्दत से करें। परेशानियां से घबराने की बजाय उसका मुकाबला करें। आज नहीं तो कल आपको सफलता जरूर मिलेगी। जाॅब आप दूसरों के लिए करते हैं एक बार खुद के लिए काम करके तो देखें।

एक ओर जहाँ अभ्यर्थी नौकरी पाने के लिए दिन-रात मेहनत कर रहे हैं वहीं नौकरी के अवसर लगातार कम हो रहे हैं। ऐसे में मोहित बजाज और उनके जैसे उच्च शिक्षा प्राप्त युवकों का स्वरोजगार की दिशा में कदम बढ़ाना आत्मनिर्भरता के नये आयाम तो बना ही रहा है, साथ ही उपभोक्ताओं के चिरकालिक समस्याओं से भी निजात दिला रहा है।

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