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“मैं मौत के मुंह से निकलकर एक नई जिंदगी को गले लगाया” ड्रग एडिक्शन के शिकार एक व्यक्ति की कहानी

यह एक ड्रग एडिक्ट और अपराधी के परिवर्तन और उनके बुराई के विरुद्ध जोश की अद्भुत कहानी है। यह आज पंजाब के हजारों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गए हैं। वे सात वर्ष की आयु से ही धूम्रपान करने लगे थे और समय के साथ-साथ वे हर तरह के एडिक्शन का शिकार हो गए। परन्तु आज पंजाब के नौजवानों के लिए वे एक आदर्श बन गए हैं। आखिर ऐसा क्या हुआ  जिसने इस व्यक्ति को पूरी तरह बदल कर रख दिया?

30 वर्षीय मिंटू गुरसरिया वह व्यक्ति है जिसकी मांस-पेशियां फूली हुई हैं और बाइसेप्स अच्छे आकार में ढली हुई और टीशर्ट पूरी तरह से पसीने से भीगी हुई होती है। उनके दाहिने आँखों में स्टिच का निशान है जो उन्हें एक दुर्घटना से मिला था। यह व्यक्ति पंजाब की सड़कों में हमेशा मशहूर हुआ करता था, लेकिन अलग-अलग समय पर, भिन्न-भिन्न कारणों के लिए। उनके दादा एक ड्रग तस्कर थे और उनका यह कारोबार पाकिस्तान और पंजाब के इर्द-गिर्द होता था। उनके पिता  कभी एक कबड्डी खिलाड़ी थे और वे भी एक ड्रग एडिक्ट थे।

उनके घर का माहौल पूरी तरह से एडिक्शन से सराबोर था इसलिए कोई आश्चर्य की बात नहीं थी कि उन्होंने सात वर्ष की कम उम्र से ही सिगरेट पीना शुरू कर दिया था। जैसे-जैसे वे बड़े हुए एडिक्शन की प्रकृति बढ़ने लगी और वे पूरी तरह से उसके  चंगुल में फंसते चले गए।

मिंटू बताते हैं “ऐसा कोई नशा नहीं बचा था जिसे मैंने नहीं आज़माया हो। क्योंकि मैं ऐसे ही माहौल में बड़ा हुआ था जहाँ ड्रग्स लेना गलत नहीं माना जाता था। ऐसे ही उनके जीने का तरीका होता था। हम अपने घर में बहुत सारे ड्रग्स रखते थे इसलिए एक दिन मेरे स्कूल की टिफ़िन में दोपहर के भोजन के बजाय अफ़ीम रखा था।”

स्कूल की पढ़ाई खत्म होते-होते वह अव्वल दर्ज़े का नशेड़ी हो चुका था और सड़कों पर नशे में धुत्त पड़ा रहता। हालांकि वह एक अच्छा कब्बडी खिलाड़ी भी था और उसने बहुत सी प्रतियोगिताओं में जीत भी हासिल की थी, परन्तु ड्रग्स ने उसे अपराध की दुनिया में धकेल दिया था। मिंटू बताते हैं “जब भी मैं पंजाब की सड़कों में घूमता, लोग डर की वजह से अपना सर झुका लिया करते थे। मेरा जीवन कुत्ते के समान हो गया था और मुझे कभी नहीं लगता था कि मैं बदल पाऊंगा।”

उनकी जिंदगी ने तब करवट बदली जब उन्होंने उच्च शिक्षा के लिए अपना शहर छोड़ दिया। वे कहते हैं “शहर की जिंदगी ने मुझे बेहद प्रभावित किया। इसके पहले मैंने ऐसा कुछ नहीं देखा था इसलिए इसने मुझे स्वस्थ ख़ुशहाल जीवन जीने के लिए प्रेरित किया और जीवन में लक्ष्य और चाहत प्रदान किया। लेकिन उससे पहले मैं पश्चाताप कर पाता 2009 में मेरा जबरदस्त एक्सीडेंट हो गया और लगभग मैंने अपना पैर खो दिया था।”

मौत का डर  और पैर  खोने के बाद मिंटू पूरी तरह बदल गए और धीरे-धीरे एक-एक करके सारे एडिक्शन से मुक्त हो गए। इन सब से बाहर निकलने के बाद उन्होंने अपना करियर चुनना चाहा। उन्होंने अपना सारा ध्यान पढ़ने-लिखने में लगा दिया। वे घंटों-घंटों अपनी भावनाओं को  कागज पर लिखने लगे थे। एक दिन उन्हें एक स्थानीय न्यूज़ पेपर में काम करने का अवसर मिला। सुरक्षा राशि भरने के लिए उनकी माँ ने अपना आख़िरी गहना तक बेच दिया।

परन्तु इस बार भाग्य ने साथ नहीं दिया क्योंकि एडिटर को उनके पिछले रिकॉर्ड के बारे में पता  चल गया और वे ऐसे व्यक्ति को नौकरी पर नहीं रखना चाहते थे। इससे मिंटू पूरी तरह से बिखर गए और उन्हें यह महसूस हुआ कि अपनी पुरानी छवि मिटाने के लिए कुछ अच्छा करना होगा। वे कहते हैं “ मेरे दादा, पिता, चाचा, छोटे भाई और बहुत से चचेरे भाई को नशे ने निगल रखा था। और मैंने अपनी माँ की आँखों में अपने आप के खोने का डर देखा था। यह मेरे लिए आखिरी मौका था।”

मिंटू बताते हैं “ मैंने जल्द ही एक लैपटॉप ख़रीदा और उसमें स्टोरी फाइल करना सीखने लगा। मैं काफ़ी खुश होता था जब मेरी कहानी न्यूज़ पेपर में छपती और इससे मुझे और बेहतर करने की प्रेरणा मिलती थी।” परन्तु वे इससे कुछ अधिक करना चाहते थे। वे एडिक्शन की चपेट में आये छात्रों तक पहुंचने लगे और डी-एडिक्शन प्रोग्राम की कैंपेनिंग करने लगे और लोगों में इसके लिए जागरूकता फ़ैलाने लगे। इसके अलावा मिंटू ड्रग एडिक्ट के परिवारों की भी कॉउन्सिलिंग करते थे।

वे कहते हैं “समय बदल गया है। जब मैं बाहर निकलता हूँ तो लोग अब भी मेरे सामने झुकते हैं परन्तु मेरी इच्छाशक्ति और मेरे बदलाव की वजह से, प्यार और सम्मान में। मैं वाहेगुरु का शुक्रगुज़ार हूँ।”

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