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दुर्घटना ने बना दिया अपाहिज लेकिन हार नहीं माने, अपनी मुहिम से कर रहे सैकड़ों दिव्यांगों की मदद

कहते हैं इंसान शारीरिक रूप से भले ही अपंग हो जाए, लेकिन उसकी सोच अपंग नहीं होनी चाहिए। क्योंकि शारीरिक रूप से अपंग व्यक्ति फिर भी अपने हौसलों से सारे जहाँ को जीतने की क्षमता रखता है, पर अगर किसी की सोच ही विक्षुद्ध हो जाए तो वह जीवित होकर भी एक मृत प्राणी की भाँति होता है। कई बार एक सामान्य व्यक्ति को भी परिस्थितियाँ अपंग व विकलांग बना देती है। लेकिन इन्ही विपरीत परिस्थितियों में जो नहीं टूटता, वही आगे चल कर एक मिसाल कायम करता है। आज हम एक ऐसे ही दिव्यांग शख्स की बात करने जा रहे हैं जिसने अपने दुःखों से परे जाकर दूसरे दिव्यांगों के बारे में सोचा।

इनका नाम है बसम सोनार। बसम पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के रहने वाले हैं। बसम, बानरहाट के लक्ष्मीपाड़ा के एक चाय बगान में रहते हैं। वह एक दिव्यांग हैं और उनकी पैरों में जान नहीं है। यहाँ तक की उनके दोनों हाथ भी बहुत कमजोर हैं। आपको बता दें कि बसम शुरुआत से ही ऐसे नहीं थे। वे एक कंपनी में मार्केटिंग मैनेजर के पद पर नियुक्त थे और एक साधारण व्यक्ति की तरह ही जीवन जी रहे थे। यहाँ तक की उनको स्पोर्ट्स का भी बहुत शौक था और वे फुटबॉल खेला करते थे। मगर 2005 में ऊँची कूद लगाते वक़्त वे गिर पड़े और उनकी रीढ़ की हड्डी में चोट लग गई।

अस्पताल में इलाज़ के दौरान उन्हें कुछ राहत तो मिली। लेकिन चोट इतनी गंभीर थी कि इसकी वजह से उनके पैर और हाथ सुन्न पड़ने लगे। धीरे-धीरे उनके पैर और हाथों नें पूरी तरह ही काम करना बंद कर दिया। इस हादसे के बाद बसम के अंदर निराश घर कर गई। अपने जीवन में अचानक आए इस बदलाव के कारण बसम पूरी तरह टूटने लगे थे। यहाँ तक की उन्होंने आत्महत्या करने की कोशिश भी की थी।

अलिदपुर दुआर के विधायक दशरथ तिर्के को जब बसम के हालत के बारे में पता चला तो वे उनकी सहायता के लिए आगे आए। उन्होंने बसम को एसएसकेएम अस्पताल में भर्ती करवाया, जहाँ उनकी रीढ़ की हड्डी का ऑपरेशन हुआ। यह इलाज तकरीबन 8 महीने चला, जिससे उनके हाथ तो सक्रिय हो गए पर पैरों की स्थिति वैसी ही बनी रही। पर इस ऑपरेशन के बाद बसम के अंदर एक अलग ही आत्मविश्वास पैदा हुआ। और उनकी सोच नकारात्मक से सकारात्मक हो गई।

बसम नें जान लिया था कि वे अब कोई भी शारीरिक कार्य ठीक से नहीं कर पाएंगे। फिर उन्होंने लॉटरी का व्यापार शुरू किया। इसके ज़रिये उन्होंने 35 हज़ार रूपए कमाए, जिसमें से 30 हज़ार रूपए दिव्यांगों के लिए काम करने वाली संस्था को दान कर दिए। बचे हुए पैसों से फिर उन्होंने लॉटरी का व्यापार किया और इस बार 60 हज़ार रूपए कमाए। बसम नें इन पैसों से 3 कंप्यूटर ख़रीदे और चाय बागान में दिव्यांगों के लिये एक कंप्यूटर ट्रेनिंग सेंटर खोल दिया। इसका मुख्य मकसद था, जो दिव्यांग शारीरिक श्रम नहीं कर सकते वे कंप्यूटर के ज्ञान से जीवन में आगे बढ़ सकते हैं।

स्थानीय प्रशासन नें भी बसम की पहल की खूब सराहना की है। जलपाईगुड़ी के जिलाधिकारी रचना भगत नें बसम को रोल मॉडल में रूप में सम्मानित किया है। साथ ही जिला प्रशासन की ओर से बसम के संस्थान को 10 कंप्यूटर भी दिए गए। इस सम्मान से बसम भी खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। इतनी विपरीत परिस्थितियों और कठिनाइयों के बावजूद बसम नें जो ज़ज़्बा दिखाया है वह वाकई क़ाबिले तारीफ है।

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