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स्लम के बच्चों के विकास के लिए इस चायवाले का प्रयास बड़े-बड़े मंत्रियों को भी कर देगा शर्मसार

भारत में समाज सुधारकों की कभी कमी नहीं रही इसलिए किसी मिशन के लिए समर्पित किसी सामाजिक कार्यकर्त्ता को खोज लेना कोई नई बात नहीं है परन्तु जिस तरह हमारे देश में उनकी मौजूदगी है वह दिलो-दिमाग पर छा जाने वाला है। हमारी सोच की सीमा से परे जाकर अपने अथक प्रयासों से वे समाज के लिए काम करते हैं और हमें ऐसा दिखाते हैं जैसे वह सब एक आसान बात हो। हम सभी जानते हैं कि चायवाले कैसे मशहूर होकर इतिहास रच रहे हैं। 

ओडिशा, कटक के प्रकाश राव एक ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें पढ़ने का बहुत मन था परन्तु अपने परिवार की परिस्थितियों की वजह से वे पढ़ाई नहीं कर पाए। जब वे पांचवी कक्षा में थे तब उन्हें स्कॉलरशिप मिली थी परन्तु अपने घर की आर्थिक स्थिति के कारण उसे नहीं ले पाए। अंतत: उन्होंने अपने पिता के चाय के स्टॉल में काम करना शुरू किया। परीक्षा के समय वे स्टॉल में ही पढ़ाई करते थे परन्तु उनके पिता उन्हें इसके लिए डांटते थे क्योंकि उनका मानना था कि पढ़ाई से खाना नहीं मिलता, काम से मिलता है। घर में बड़े होने की वजह से उनके ऊपर काफ़ी जिम्मेदारियां थी। वे अपनी जिम्मेदारियों में फंसे रह गए और चाय की स्टॉल ही उनकी दुनिया बन कर रह गई।

स्टॉल में बहुत ज्यादा मेहनत और विटामिन्स की कमी की वजह से प्रकाश बीमार हो गए और उनके कमर के नीचे का भाग लकवा ग्रस्त हो गया। वे अगले छह महीनों तक बिस्तर पर पड़े रहे। जब वे ठीक हो गए तब उन्होंने पाया कि किसी अनाम व्यक्ति ने उन्हें खून दिया था जिसने शारीरिक रूप से स्वस्थ होने में मदद की थी।

उसके बाद 1976 से राव लगातार एक निश्चित अंतराल के बाद नियमित रक्तदान करने लगे। एक बार उन्होंने एक्सीडेंट के शिकार एक रिक्शा चालक के बेटे की ब्लड देकर मदद की। उनके अनुसार समाज ने उन्हें बहुत कुछ दिया है और वे ज़रूरतमंद लोगों को अपना खून देकर कुछ हद तक अपना कर्ज उतार रहे हैं। वे कभी सामाजिक कार्यकर्त्ता नहीं रहे परन्तु बाद में उन्हें झोपड़ पट्टी में रह रहे रिक्शा चालक, दैनिक वेतन भोगी मज़दूर और सफाई कर्मचारियों के बच्चों के भविष्य के लिए चिंता होने लगी। उन बच्चों को वे अपने घर पर पढ़ाने लगे। यह सब करने के लिए उन्हें बहुत सी बाधाओं से होकर गुजरना पड़ा। उन बच्चों के माता-पिता उन्हें पढ़ाने के लिए मना करते परन्तु वे लगातार बच्चों को कक्षा तीसरी तक पढ़ाते और बाद में आगे की पढ़ाई के लिए सरकारी स्कूल में भेज देते।

वे अपनी कमाई का 50% हिस्सा स्कूल को देते थे। बच्चों को स्कूल आने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए और उनके पोषण के लिए वे बच्चों को रोज 100 मिलीलीटर दूध और बिस्किट देते थे। एनजीओ और दूसरे सामाजिक संस्था प्रकाश की मदद करती थीं। महिला जागृति समिति ने शिक्षकों के सालाना वेतन के लिए फण्ड प्रदान किया।

राव की पत्नी एक नर्स हैं और वे दो लड़कियों के पिता हैं। उनके लिए स्कूल उनकी पहली प्राथमिकता है और परिवार उसके बाद आता है। उन्हें 2015 में ओडिशा ह्यूमन राइट्स कमीशन के द्वारा वर्ल्ड ह्यूमन राइट्स डे के दिन सम्मानित किया गया। समाज को वापस कुछ देने की इच्छा ने ही उन्हें प्रेरित किया। वे केवल यही सोचते हैं कि अगर बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं तो वे खुद स्कूल को बच्चों तक लेकर आएंगे। उनकी यही सोच उन्हें एक महान समाज सुधारक बनाती है।

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