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अस्पतालों में हो रहे भ्रष्टाचार और मनमानी वसूली को खत्म करने के लिए इस वकील ने एक लंबी लड़ाई लड़ी

एक कहावत बड़ी मशहूर है कि आपके जीवन में अगर आपका पाला पुलिस, वकील और डॉक्टर से नहीं पड़ा तो आप बहुत ही ख़ुशनसीब इंसान हैं। अर्थात इन तीनों के चक्कर में पड़ने पर आप आर्थिक, शारीरिक और मानसिक रूप से कष्ट में पड़ सकते हैं। वैसे तो समाज में इन सभी का दर्जा बहुत ऊपर माना जाता है पर वर्तमान परिस्थितियां कुछ और ही हाल बयान करते हैं। पुलिस को जनता का सेवक, वकील को न्याय का रक्षक और डॉक्टर को तो भगवान का दूसरा रूप ही कहा जाता है। पर इन सभी में भ्रष्टाचार कुछ इस कदर लिप्त हो गया है कि लोगों का उनपर से विश्वास ही उठता जा रहा है। हर जगह लोग पैसों की ख़ातिर अपना ईमान बेचते नज़र आते हैं।

लेकिन आज हम एक ऐसे वकील की बात करने जा रहे हैं जिसने हृदय की सर्जरी में लगने वाले स्टेंट में अस्पतालों के द्वारा हो रहे भ्रष्टाचार और मनमानी वसूली को रोकने के लिए एक लंबी जंग लड़ी। उनके प्रयासों का नतीज़ा यह निकला कि सरकार ने स्टेंट की अधिकतम कीमत की सीमा तय कर दी।

 

इनका नाम है वीरेंद्र सांगवान। पेशे से वकील वीरेंद्र हरियाणा के सोनीपत के रहने वाले हैं। वीरेंद्र नें हार्ट की सर्जरी में उपयोग होने वाले उपकरण स्टेंट की मनमाने ढ़ंग से अस्पतालों द्वारा वसूली जा रही रकम के खिलाफ लड़ाई लड़ी है। दरअसल निजी अस्पतालों में स्टेंट की कीमत को लेकर कोई पारदर्शिता ही नहीं थी। अस्पतालों द्वारा इलाज के बिल में स्टेंट की कीमत का खुलासा ही नहीं किया जाता था। मरीज़ के घरवालों को साफ तौर पर पता ही नहीं चल पाता था कि उनसे स्टेंट की कितनी कीमत वसूली गयी है। अस्पतालों और डीलरों के मिली भगत के कारण कंपनी से ऑपरेशन टेबल तक आते-आते स्टेंट की कीमत में 1000 से 2000 गुना तक की बढ़ोतरी हो जाती थी। इसी के खिलाफ वीरेंद्र सांगवान ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की और उनकी वजह से आज हज़ारों मरीजों को फायदा होगा।

दरअसल वीरेंद्र को इस बात का पता तब चला जब उनके दोस्त की हार्ट सर्जरी हुई। अपने दोस्त की सर्जरी के दौरान वीरेंद्र भी अस्पताल पहुंचे। तब उन्हें पता चला कि हार्ट की सर्जरी के बाद उनके दोस्त को कोरोनरी स्टेंट लगाया गया है। कोरोनरी स्टेंट एक ट्यूब जैसा होता है। यह स्टेंट हार्ट की धमनियों को खुला रखने में यूज किया जाता है। जिससे कि हृदय तक खून आसानी से नलियों द्वारा पहुंच सके। आंकड़ों के मुताबिक प्रत्येक वर्ष भारत में लगभग 5 लाख से अधिक कोरोनरी स्टेंट यूज होते हैं। इनमें से ज्यादातर स्टेंट इम्पोर्टेड यानी भारत के बाहर से मंगाये जाते हैं।

वीरेंद्र के दोस्त की सर्जरी के बाद जब बिल देने की बारी आई तो अस्पताल द्वार जो बिल दिया गया, उसमें कहीं भी स्टेंट की कीमत का ज़िक्र नहीं किया गया था। दोस्त नें उन्हें बताया कि उन्होंने स्टेंट के लिए 1 लाख 26 हज़ार रुपये दिए हैं। वीरेंद्र को स्टेंट की यह रकम बहुत ज्यादा लगी। बहुत छान-बिन के बाद वीरेंद्र ने पता किया कि निज़ी अस्पताल वाले स्टेंट की बहुत ही अधिक कीमत वसूल रहे हैं। उन्होंने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को कोरोनरी स्टेंट के मनमाने दाम वसूलने की शिकायत की। उन्हें आरटीआई के द्वारा यह पता चला कि स्टेंट हेल्थ सेक्टर में दवा के रूप में काम आता है। हार्ट स्टेंट की कस्टमर ड्यूटी में भी छूट दी गई थी पर वह भारत में किसी भी प्राइज कंट्रोल प्रणाली के अंदर नहीं था।

वीरेंद्र नें जब इसके कारणों के बारे में पता किया तो मालूम चला कि स्टेंट दवाओं की जरूरी नेशनल लिस्ट National List of Essential Medicines (NLEM) में शामिल ही नहीं है। जिस कारण सरकार स्टेंट की कीमतों को रेगुलेट नहीं करती है और इसलिए अस्पताल या डीलर मनमाने दाम वसूलते हैं।

इसके बाद वीरेन्द्र नें दिल्ली हाईकोर्ट में 2014 में एक याचिका दायर की जिसमें उन्होंने कोरोनरी स्टेंट के प्राइज और सरकार द्वारा उसके नियंत्रण के बारे में पूछा। उन्होंने उसमें बताया कि अस्पतालों में स्टेंट की कीमत बहुत ज़्यादा वसूली जा रही है। साथ ही वीरेंद्र ने मांग की कि स्टेंट जोकि इतना महंगा और जरूरी उपकरण है उसे दवाओं की जरूरी नेशनल लिस्ट (NELM) में डाला जाए। वीरेंद्र यह केस जीत गए और दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को कीमतों पर नियंत्रण के आदेश भी दे दिये। मगर सरकार ने इसपर ढिलाई बरती और कुछ कड़े कदम नहीं उठाए। उसके बाद 2016 में एक अवमानना याचिका दायर की गई कि सरकार कोर्ट के आदेश के अनुसार काम नहीं कर रही है। दिसंबर 2016 में एक और याचिका दायर करने के बाद सरकार ने फैसला लिया। जिसके बाद सरकार ने सारे अस्पतालों के लिए स्टेंट की कीमते नियंत्रित कर दिया।

सरकार के नियमों के बाद अब हर अस्पताल वाले ड्रग एल्यूटिंग स्टेंट और बायोरेज़ॉर्बेबल स्टेंट की कीमत 30,000 से ज्यादा नहीं ले सकते। इसके अलावा मेटल के स्टेंट की कीमत 7,500 रुपये निर्धारित की गई है। पहले इन स्टेंट की कीमत मनमाने ढंग से 24,000 से 2 लाख तक वसूली जाती थी।

वीरेंद्र नें एक लंबी लड़ाई लड़कर मरीजों के साथ हो रहे धोखे को ना केवल उजागर किया बल्कि उसे समाप्त भी करवाया। यकीनन इससे अब मरीजों को बहुत लाभ होगा और उनका जो आर्थिक दोहन होता था, उससे निजाद मिलेगा।

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