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पिता करते हैं वेल्डिंग का काम, गरीबी और अभावों को मात देकर बेटा बना ISRO में वैज्ञानिक

एक कहावत बहुत प्रसिद्ध है कि “मेहनत इतनी खामोशी से करो की सफलता शोर मचा दे”। सच में अगर आप ईमानदारी से मेहनत करें और आपने लक्ष्य प्राप्ति को लेकर जुनून हो तो कोई भी आपके सफलता की बुलंदियां छूने से कोई नहीं रोक सकता। हमारे राह में काई रोड़े जरूर आते हैं, कभी हमें पर्याप्त संसाधन नहीं मिल पता, कभी हमारी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होती, तो कभी सामाजिक परिस्थितियाँ हमें आगे बढ़ने नहीं देती। पर इन्हीं अड़चनों को जो पार कर लेता वही पूरी दुनिया के लिए मिसाल कायम करता है। आज हम एक ऐसे ही शख्स की बात करने जा रहे हैं जिसने आर्थिक चुनौतियों को मात देकर अपने दम पर इसरो का वैज्ञानिक बन गया।

इनका नाम है कृष्ण गोपाल। अपने नाम की तरह ही गोपाल का जन्म भी भगवान कृष्ण की नगरी मथुरा में ही हुआ है। वे मथुरा रिफाइनरी नगर के गोपालपुरा गाँव के रहने वाले हैं। गोपाल की उम्र अभी महज़ 24 वर्ष है। उनके पिता पूरन सिंह एक श्रमिक हैं और वेल्डिंग का काम करते हैं। इसी काम से वे पूरे परिवार का भरण-पोषण करते हैं। उनकी माता एक गृहिणी हैं। गोपाल के परिवार की आर्थिक स्थिति शुरू से ही अच्छी नहीं थी। बचपन से ही गरीबी और संघर्ष को बेहद करीब से देखने वाले गोपाल ने तय किया कि वह मेहनत के बल पर अपनी परिस्थिति को बदल कर दिखायेंगे।

गोपाल की स्कूली शिक्षा सरकारी स्कूल में ही पूरी हुई। लेकिन वो पढ़ने-लिखने में काफी अच्छे थे और खासकर साइंस विषय पर उनकी पकड़ मजबूत थी। उन्होंने यूपी बोर्ड से ही इंटरमीडिएट तक ही पढ़ाई की। उन्होंने आगे इंजीनियरिंग करने का मन बनाया पर, आर्थिक स्थिति कमज़ोर होने की वजह से उनके पिता उनका शिक्षण शुल्क देने में असमर्थ थे। तब गोपाल ने छात्रवृति की परीक्षा उत्तीर्ण की और किसी तरह कॉलेज फीस का इंतज़ाम कर लिया। उसके बाद उन्होंने गाज़ियाबाद के एक निज़ी इंजीनियरिंग कॉलेज में दाख़िला लिया। और मेकैनिकल ब्रांच से अपनी बी.टेक की पढ़ाई पूरी की।

गोपाल नें  फरवरी 2017 में आयोजित इसरो (इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन) की परीक्षा में भाग लिया। इस परीक्षा में पूरे देशभर से करीब 3 लाख प्रतिभागियों नें आवेदन किया था। जिसमें मात्र 300 उम्मीदवार ही लिखित परीक्षा में सफल हो पाये, जिसमें गोपाल भी एक थे। फिर 22 सितम्बर को दिल्ली में इन सभी 300 उम्मीदवारों को साक्षात्कार हुआ। इसके बाद केवल 34 उम्मीदवारों का ही चयन हुआ, जिसमें गोपाल का नाम 32वें नंबर पर रहे। गोपाल अब इसरो के वैज्ञानिक के रूप में जाने जाएंगे।

इसरो के वैज्ञानिक पद पर चयन होने के बाद गोपाल के परिवार के साथ-साथ पूरा गाँव बहुत खुश है। गोपाल ने सिर्फ अपने गाँव का ही नहीं बल्कि पूरे राज्य का नाम रौशन किया है। अब गोपाल की चाहत है कि वे एक ऐसा अनोखा रॉकेट बनाएं जैसा रॉकेट आज तक नहीं बनाया गया है। इसके साथ ही गोपाल चाहते हैं कि उनकी दो-बहनें भी पढ़-लिखकर खूब तरक्की करे।

गोपाल का मानना है कि परिस्थितियां कितनी भी ख़राब क्यों न हो लेकिन लक्ष्य के प्रति समर्पण हो तो रास्ते खुद-ब-खुद बनते चले जाते हैं।

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