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असफलताओं को मात देकर बने प्रशासनिक अफ़सर, आमजनों के हित में इनकी कार्यवाही है बेहद प्रशंसनीय

एक कामयाब और एक निराश व्यक्ति में यदि कोई फर्क होता है तो वह है सिर्फ इच्छाशक्ति का। हालात कितने ही बुरे हों, घनघोर गरीबी हो बावजूद इसके आपका आत्मबल और आप पर हर हाल में कामयाब होने का जुनून हो, तो दुनिया की कोई ताकत आपको सफल होने से रोक नहीं सकती। जब आप चुनौतियों को स्वीकार कर उन्हें खुशी और उत्साह से सामना करते हैं तो चमत्कार होते हैं। इन्होंने हताशा-निराशा को कभी खुद पर हावी नहीं होने दिया, हतोत्साहित हो रहे लोगों को प्रोत्साहित करने का एक उम्दा उदाहरण है हमारे नायक कुमुद कुमार झा

सिमडेगा, झारखंड के एक निम्न मध्यवर्गीय परिवार में जन्मे कुमुद के पिता स्व. श्री तेज नारायण झा स्वास्थ विभाग में क्लर्क थे और माता श्रीमती मल्लिका देवी एक गृहिणी। 3 भाइयों और 1 बहन में सबसे छोटे कुमुद का बचपन बहुत ही संघर्ष में बीता। विभागीय अनियमितताओं के कारण कई वर्षों तक उनके पिता को वेतन नहीं मिला और अत्यंत गरीबी का जिन्न दरवाजे पर कुंडली मार कर बैठ गया। तंगहाली की काली कोठरी में जन्मे कुमुद जब 7वीं में थे तभी उनके पिता का देहांत हो गया। घर चलाने के लिए बड़े भाई चाय और पान की दुकान चलाते थे। कई प्रकार से लोगों के हतोत्साह और अपमान को झेलना पड़ा।

वे बताते हैं कि ऐसे में इनकी माँ मनोबल बनाएँ रखने के लिए कहतीं, “अपमान का बदला सिर्फ शिक्षा से लिया जा सकता है। पढ़ोगे-लिखोगे कुछ बनोगे तभी लोग सम्मान करेंगे नहीं तो अपमान की ही जिन्दगी जीनी पड़ेगी।” माँ की बातें उनके दिल में उतर गयी और तब से उन्होंने लगन और जोश से पढ़ाई करने का संकल्प लिया। आधारभूत शिक्षा के लिए माँ का सहयोग मिलता था। मगर अभावों में पढ़ाई की निरंतरता नहीं रहती और आगे की पढ़ाई छूटती चली गई और वह भी भाइयों की मदद करने के लिए दुकान पर बैठने लगे।

टेटईटाँगर ब्लाॅक के सरकारी स्कूल के शिक्षक श्री फिरोज आलम और माता जी के प्रोत्साहन से उन्होंने पुनः पढ़ाई आरंभ की। तीक्ष्ण बुद्धि बालक कुमुद हमेशा अपनी पढ़ाई लिखाई में अव्वल रहे और हर परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण किया। उनकी सभी शिक्षा गाँव के विद्यालय और सिमडेगा में ही हुई। अपने गाँव शहर में ही उन्होंने जीवन का हर सबक सीखा और तजुर्बा लिया। विज्ञान से स्नातक की पढाई पूरी करने के बाद वे घर के आर्थिक सहयोग हेतु वे एक निजी विद्यालय में शिक्षक के रुप काम करने लगे और साथ ही साथ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में भी जुट गये। इसी दरम्यान 1997 में उनका विवाह पार्वती कुमारी से सम्पन्न हुआ।

कठिनाइयों का दौर कम होने का नाम नहीं ले रहा था। मगर कुमुद कभी निराश नहीं हुए। हर विपरीत परिस्थिति और असफलता से सबक लेकर नए जोश से तैयारी में जुट जाते। कई लिखित परीक्षाएं पास की पर अंतिम रुप से चयन नहीं हो पाता। मगर अपने लगन और उत्साह को कम न होने दिया और दृढ़ संकल्प के साथ प्रयासरत रहे। निर्धनता और विपत्ति के वक्त के इस उतार चढ़ाव के बीच उन्हें एक पुत्री वैष्णवी प्राप्त हुई। दोनो माता-पिता बेरोजगारी झेल रहे थे। अभावग्रस्त कुमुद को यह भी नहीं पता था कि बच्ची के भोजन की भी व्यवस्था कैसे हो पाएगी। जब वैष्णवी 4 दिनों की थी तभी उनकी पत्नी पार्वती को शिक्षक मुख्य परीक्षा हेतु पटना जाना पड़ा। कमजोर हाल में डाॅक्टर ने उन्हें जाने से मना किया। मगर उनके पास विकल्प नहीं थे और अवसर को खोने का ख़तरा उठा पाना कठिन था। कुछ महीने बाद परीक्षा का परिणाम घोषित हुआ और पूरे राज्य में वह प्रथम आयीं। लक्ष्मी स्वरूप बेटी के सौभाग्य ने परिस्थिति बदल दी। कुछ ही महीने में कुमुद का भी चयन सरकारी शिक्षक के तौर पर हो गया और वे दोनो बसिया, गुमला में पदस्थापित हुए। वर्ष 2017 के झारखंड अकादमिक कौंसिल की इंटरमीडिएट परीक्षा में सौभाग्यशाली वैष्णवी राज्य में द्वितीय स्थान पर रहीं और वह भी अपने पिता की तरह आई.ए.एस. अधिकारी बनना चाहती हैं।

परिस्थिति बदल चुकी थी, हालात अब बेहतर थे। मगर कुमुद झा और ऊँचा जाना चाहते थे। उन्होंने पढ़ाई का दामन नहीं छोड़ा और अब वे प्रशासनिक परीक्षाओं की तैयारी में लग गये। इसी दौरान उनकी प्रोन्नति राज्य स्तर पर शिक्षक प्रशिक्षक के रुप में हुई। शिक्षा के महत्व को बखूबी समझने वाले कुमुद शिक्षण प्रणाली को आसान और दिलचस्प बनाने के लिए नए-नए शोध करते रहते। इधर प्रशासनिक परीक्षाओं में भी वे प्रयास करते रहे।  बिहार और झारखंड लोक सेवा आयोग में 12 बार असफलता का सामना किया। इस समय अंतराल में उन्हें पुत्र प्राप्त हुआ। मगर एक घातक बीमारी ने उसे अपने चपेट में ले लिया और 8 वर्ष की अवस्था में वह इस दुनिया से विदा हो गए। इस घटना ने पूरे परिवार को तोड़ कर रख दिया। अवसादित कुमुद ने फिर से अपने आप को जोड़ा और अपने जीवनचर्या में शामिल हुए।

वर्ष 2013 में उन्होंने झारखंड लोक सेवा आयोग में 10वां स्थान प्राप्त किया और अपने करियर को नई ऊँचाई दी। 2013 में प्रशिक्षु के रुप में उनकी पहली नियुक्ति डिप्टी कलेक्टर के रुप में जमशेदपुर में रही। सितंबर 2014 में उनका पदस्थापन हजारीबाग में कार्यपालक दण्डाधिकारी के रुप में हुई। अपने काम और संकल्प के प्रति समर्पित कुमुद जिले में विधि व्यवस्था कायम रखने के लिए प्रसिद्ध हैं।

उन्होंने कहा, “बहुत कोई कष्टों को झेल कर अच्छा मुकाम पाते है। जिन्दगी में मैंने बहुत हार का सामना किया पर कभी हार नहीं मानी। नाकामयाबी से हताश हुआ पर निराश कभी नहीं हुआ।”

अपने कार्य अनुभवों को साझा करते हुए उन्होंने बताया कि जिले में मजिस्ट्रेट के रुप में सबसे अधिक एफ.आई.आर. दर्ज किया है। कई बड़ी कार्यवाहियों का हिस्सा रहने वाले अधिकारी के रुप में दिन रात हमेशा अपने फर्ज में तत्पर रहते हैं। एक बड़े फर्जीवाड़े का पर्दाफाश उन्होंने किया था जब एक चिटफंड कंपनी से छापेमारी में 28 लाख ज़ब्त कर राजस्व खाते में जमा किया था। मुख्य अभियुक्त अब तक फरार है और उसकी तलाश जारी है। उन्होंने स्टैम्प पेपर की कालाबजारी को भी पकड़ा था। आम लोगों को धोखाधड़ी से राहत देनेवाली ऐसी कार्यवाहियाँ उन्हें अधिक संतुष्टि देती है।

जिले में अतिक्रमण अभियान के कार्यान्यवन में तेजी लाने का श्रेय इन्हें जाता है। नगर निगम के कार्यपालक अधिकारी के तौर पर अतिक्रमण के बड़े बड़े दोषियों पर बड़ी कार्यवाही की और धारा 133 के तहत केस किया। एक कोचिंग संस्थान से जुर्माने के रुप में 50,000 की बड़ी रकम उगाही की। नगर निगम में 2 महीने के कार्यकाल में उन्होंने एक बड़े प्रयास के तहत रात्रि सफाई अभियान उन्होंने चलवाया था।

जिला खेल अधिकारी के रुप में उन्होंने कर्जन ग्राउण्ड का जिर्नोद्धार करवाया। छात्रावास में खेल छात्रों के उत्तम और पोषक भोजन प्रबंधन की व्यवस्था की।

 

आज के युवकों और छात्रों के लिए उन्होंने कहा, “कभी हार नहीं माननी चाहिए, मन में विश्वास रहना चाहिए कि यदि हम करना है तो करते रहना है जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।” और कहा, “पढ़ने का कोई विकल्प नहीं। यदि कोई पढ़ाई करता है और असफल भी रहता है तो मेरा मानना है कि कुछ ज्ञान ही अर्जित होता है। इसलिए मैं असफलताओं से दुःखी होता था पर हार नहीं मानता था।”

अपने संघर्षों पर विजयी कुमुद हास्य व्यंग में माहिर है। उन्होंने कई आरकेस्ट्रा और सामुदायिक आयोजनों में भी अपना अंदाजा बिखेरा है और अपने मित्रों और सहयोगियों के साथ हँसी का माहौल कायम रखते हैं। “शिक्षण प्रशिक्षण के दौरान हमेशा मैं हास्य विनोद का प्रयोग करता था। मेरे तहत प्रशिक्षण प्राप्त शिक्षक आज भी मिलने बात करने पर उन बातों को याद करते हैं। अब व्यस्तता अधिक है परंतु मौकों का आनंद जरूर लेता रहता हूँ। मुझे खुशी मिलती कि मैं लोगो को हँसा पाता हूँ।”

कुमुद कुमार झा एक आदर्श हैं उन हताश लोगों के लिए जो परिस्थितियों के आगे झुक जाते हैं। शिक्षा को अपना हथियार बनाकर और आत्मबल की शक्ति से प्रतिकूल स्थिति का मुकाबला करने की वह एक प्रेरणा है। जिन्दगी में कभी हार न मानने वाले इस जज़्बे और हौसले को सलाम है।

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