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21 साल के लड़के को आँखों की रोशनी लौटा कर एक बार फिर भारतीय डॉक्टरों ने साबित की काबिलियत

किसी का सब कुछ खो जाय, यहां तक की उम्मीद भी तो उसे कितनी गहन हताशा से गुजरना होगा। फिर हौसले और जज़्बे के मिलेजुले करिश्मे से न केवल उसकी खोई हुई आंखों की रोशनी लौट आई बल्कि उसके जीने की उम्मीद भी लौटी।

वो पढ़ाई में अच्छा था, 11वीं कक्षा में था, इंजीनियर बनना चाहता था लेकिन एक हादसे ने उसकी जिंदगी में अंधेरा ला दिया, उसके सपने चूर चूर हो गए। देखते ही देखते उसकी आंखों के आगे अंधेरा छा गया। लेकिन शुक्र है भारतीय डॉक्टरों का, जिन्होंने उसे नई जिंदगी दी। एक असीम दर्द के साथ जीने को मजबूर था इस्लाम हुसैन, लेकिन भारतीय डॉक्टरों ने उसे दूसरी जिंदगी दी और लगभग 6 महीनों बाद वह अपनी आंखों से अपनी मां को देख पाया।

भारतीय डॉक्टरों ने दिया दूसरा जीवन

पिछले साल हुए यमन में एक ब्लास्ट ने उसकी आंखें और हाथ छीन लिए थे लेकिन भारत के डॉक्टर्स ने उसकी जिंदगी में हमेशा के लिए हो गए अंधेरे को दूर किया और फिर से उसे इस खूबसूरत दुनिया को देखने का मौका दिया। हादसे से 6 महीने के बाद वह इसी आस से भारत आया था कि शायद वह दोबारा इस दुनिया की खूबसूरती को देख पाएगा, कोच्चि के अमृता इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेस के डॉक्टर ने चमत्कार कर दिखाया।

आंखें खोलते ही डॉक्टरों को गले लगाया

हादसा पिछले साल 2017 के सितंबर महीने का है, जब उत्तर-पश्चिमी यमन के तैज में इस्लाम के घर के पास एक लैंडमाइन फट गई और देखते ही देखते उसकी आंखों के आगे अंधेरा छा गया। उसकी आंखों की रोशनी चली गई और उसने अपने दोनों हाथों को खो दिया लेकिन अब 6 महीने बाद 21 साल का हुसैन दोबारा इस दुनिया को देख पाने में सफल हुआ और इसका श्रेय जाता है कोच्चि के अस्पताल के डॉक्टरों को जिन्होंने उसकी आंखों के 8 घंटों के कॉर्नियल ट्रांसप्लांट कर 90 प्रतिशत तक रोशनी लौटा दी। इस दुनिया को देख वह इतना खुश हुआ कि आंखे खोलते ही सबसे पहले डॉक्टर को गले लगाया।

हुसैन बताते हैं कि वह हर रोज़ अपने घर से कुछ दूरी पर टहलने के लिए जाते थे और उस दिन भी वह अपने घर के पास टहलने ही निकले थे तभी उनका पैर लैंडलाइन पर पड़ गया था, जो फटी हुई थी, कुछ ही देर में मैं बेहोश हो गया और मेरी आंखों के आगे अंधेरा छा गया। जब उठा तो मुझे कुछ दिख नहीं रहा था, मैं जोर-जोर से चिल्ला रहा था लेकिन मैं असहाय था। डॉक्टरों ने कहा था कि अब मैं शायद ही दोबारा देख पाऊं। वह कहते हैं कि ‘मैं खुद को जिंदा रहने के लिए बहुत भाग्यशाली मानता हूं। मैं फिर से आंखें देने के लिए भगवान और डॉक्टरों का भी धन्यवाद करता हूं। कठिन समय के दौरान परिवार और दोस्तों का साथ मेरी ताकत बना और अब मैं बहुत खुश हूँ ।

ट्रांसप्लांट का इंतजार

दिसंबर, 2017 में अस्पताल लाए गए हुसैन मानते हैं कि उन्हें एक नई जिंदगी मिल गई है। उनके पिता अहमद मोहम्मद कहते हैं कि हमें नहीं लगा था हुसैन फिर कभी देख पाएगा, हमारे लिए उसकी आंखों का लौटना किसी करिश्मे से कम नहीं है। हुसैन का परिवार अब उनके हैंड ट्रांसप्लांट के लिए इंतजार कर रहा है।

इस करिश्मे ने हुसैन के सपनों को ही बदल दिया, वो कहते हैं कि इस दुनिया में कई ऐसे लोग हैं, जिन्होंने अपनी जिंदगी में सब खो दिया, वे उम्मीद तक खो चुके हैं, मेरी भी कुछ ऐसी ही हालत थी, लेकिन अब मेरी सोच बदली है। मैं पहले इंजीनियर बनना चाहता था लेकिन अब डॉक्टर बनना चाहता हूं ताकि लोगों को दोबारा जिंदगी दे सकूं। वहीं इस मामले में कोच्चि के अस्पताल के डॉ. गोपाल पिल्लई कहते हैं कि इस्लाम जब आया तब उसका चेहरा किसी हथौड़े से मारा हुआ लग रहा था लेकिन हमारा मकसद इसकी रोशनी लौटाना था, जिसमें हम सफल हुए, अब हम इसके चेहरे पर काम करेंगे।

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