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दिनेश इसलिए करते हैं ओवरटाइम काम ताकि गरीब बच्चो को मिल सके शिक्षा व समुचित स्वास्थ्य व्यवस्था

कभी-कभी जब हम किसी दर्द से गुजर चुके होते हैं तो दूसरों के दर्द को भी बखूबी समझ पाते हैं। लेकिन आज के समय में ज्यादातर लोग अपनी निज़ी ज़िन्दगी और निज़ी फायदे के अलावा कुछ और देख ही नहीं पाते। आज न जाने कितने ऐसे बच्चे हैं जिनको सामान्य स्कूली शिक्षा भी नहीं मिल पा रही है। वे सड़कों पर भटकने और स्लम में रहने को मजबूर हैं। सरकार की न जानें कितनी योजनाएँ आती हैं और जातीं हैं लेकिन इनकी स्थिति जस के तस बनी हुई है। कितने गरीब बस पैसों के अभाव में अच्छा इलाज़ नहीं करवा पाते।

ये तमाम सवाल एक शख्स के ज़हन में हमेशा उठते रहते थे। कभी उसे भी पैसों के अभाव में पढ़ाई छोड़नी पड़ी थी और यह बात उसके दिल में हमेशा से थी। स्लम के बच्चों को पढ़ाने से शुरू हुआ उनका सफ़र आज एक बड़े फाउंडेशन का रूप ले चुका है और हज़ारों जरूरतमंदों की मदद कर रहा है।

इस अनोखे मुहिम के कर्णधार हैं दिनेश कुमार गौतम। हरियाणा के झज्जर जिले के एक छोटे से गांव गुल्बानी में जन्में दिनेश ने अपनी स्कूली पढ़ाई दिल्ली के नजफगढ़ इलाके से पूरी की। वे बचपन से ही छोटी-छोटी चीजों को बड़ी बारीकी से देखते व उनका विश्लेषण करते थे और विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर अपनी राय खुलकर सबके सामने रखते थे। साल 1996 में जब वे मात्र 19 साल के थे और पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे थे, तब उन्होंने खाली वक़्त में स्लम के बच्चों को पढ़ाने की बात सोची । कुछ दोस्तों की मदद से उन्होंने दिल्ली में ही आसपास के स्लम में गरीब बच्चों को पढ़ाना शुरू किया।

दिनेश ने अपने परिवार को असुविधाओं के बीच झुझते हुए देखा था, और आर्थिक हालातों से उन्हें पढ़ाई भी छोड़नी पड़ी थी। हालांकि, कुछ समय बाद उनकी स्थिति में सुधार हो गया था, लेकिन वे अपने कठिन वक़्त को भूले नहीं थे। उन्होंने उसी वक़्त तय कर लिया था कि बचपन में पढ़ने के लिए जो तकलीफ उन्हें झेलनी पड़ी वो दूसरे बच्चों को नहीं झेलनी पड़े।

पत्रकारिता में सफलतापूर्वक डिप्लोमा हासिल कर उन्होंने राजस्थान में एक अखबार में बतौर पत्रकार अपने करियर की शुरुआत की। इसी दौरान उन्होंने साल 1998 में न्यू दिल्ली एजुकेशन सोसाइटी के नाम से राजस्थान में मुफ्त माध्यमिक विद्यालय की स्थापना की। लोग उन्हें दिल्ली वाला कहते थे और इसीलिए उन्होंने दिल्ली के नाम पर ही स्कूल का नाम रखा। इस ट्रस्ट के जरिए उन्होंने मेवात और अलवर जिले के गरीब बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। चूंकि शुरूआत में स्टाफ और वॉलेंटियर की काफी कमी थी इसलिए कई बार तो दिनेश खुद ही स्कूल वैन चलाकर बच्चों को लेने चले जाया करते थे। 2003 तक उनके स्कूल में बच्चों की संख्या 187 हो गयी। इस समय तक वे लगातार अपने काम और स्कूल के बीच सामंजस्य बिठाये हुए थे।

धीरे-धीरे कई लोग उनकी मदद के लिए हाथ बढ़ाये और शिक्षक के रूप में सेवाएं दी। राज्य सरकार ने भी उनके काम को देखकर स्कूल को मान्यता दे दी लेकिन अचानक 2003 में दिनेश को पारिवारिक कारणों से अहमदाबाद में शिफ्ट होना पड़ा और इस वजह से स्कूल बंद हो गया।

दिनेश पत्रकारिता छोड़ मार्केटिंग फील्ड में आ गये क्यूंकि पत्रकरिता में पूर्ण तौर पर समर्पण और समय की जरुरत थी और इन समाजक कामों के लिए उन्हें ठीक से वक्त नहीं मिल पा रहा था। इसके बाद उनकी आमदनी भी थोड़ी बढ़ गई जिससे उनके सामाजिक कार्यों को और मजबूती मिली। साथ ही ओवरटाइम काम कर उन्होंने अपनी मुहिम को आर्थिक रूप से और सक्षम बनाया। उनके समर्पण भाव को देखते हुए कई लोग मदद को आगे आए और  स्कूल के लिए बेंच, परदे, अलमारिया और कंप्यूटर आदि सामान देकर अपना सहयोग दिया।

पहले नौकरी और उसके बाद शादी के कारण दिनेश को भले ही गुजरात जाना पड़ा। लेकिन समाज के लिए काम करने के उनके इस जुनून में जरा भी कमी नहीं आई और साल 2012 में उन्होंने वहां पर एक एनजीओ ‘दृष्टि फाउंडेशन’ की शुरूआत की और तब से लेकर आज तक यह एनजीओ लगातार लोगों के बीच जाकर जमीनी स्तर पर काम कर रहा है और जरूरतमंदों की मदद में लगा है।

दृष्टि फाउंडेशन से जुडे वॉलेंटियर्स की संख्या 10 हजार से ज्यादा है और यह भारत के 7 राज्यों में स्वास्थ्य, शिक्षा, ह्यूमन ट्रैफिकिंग कंट्रोल जैसे मुद्दों पर काम कर रहा है। सामाजिक कार्यों को उन्होंने अपना कर्तव्य समझा और आज तक किसी भी तरह की सरकारी मदद नहीं ली। उनके वॉलंटियर्स बिना किसी स्वार्थ के अपना काम कर रहे हैं। उनके वॉलंटियर्स भी बिना किसी सैलरी के उनके साथ काम में लगे हैं। पैसा लेना तो दूर जरूरत पड़ने पर ये सभी वॉलंटियर्स अपनी ओर पैसा खर्च करने में नहीं हिचकते। एनजीओ से जुड़े लोगों की पृष्ठभूमि सम्पन्न परिवारों से है और ज्यादातर अच्छी नौकरियां कर रहे हैं। आज ‘दृष्टि फाउंडेशन’ एचडीएफसी, बजाज कैपिटल्स, जस्ट डॉयल, एआईएसईसी,जैसी बड़ी कंपनियों के सहयोग से गरीबों तक मदद पहुंचाने का काम कर रहा है।

आंकड़े की मानें तो देशभर में करीब 30 लाख एनजीओ हैं और इनमें से करीब 24 लाख एनजीओ आमदनी और खर्च का ब्यौरा नहीं देते हैं। आए दिन मीडिया गलियारों से भी यह फर्जी एनजीओ की ख़बरें देखने और सुनने को मिलती रहती है। इसमें कोई दोराय नहीं है कि कुछ लोग एनजीओ की आड़ में पैसे कमाने का धंधा कर रहे हैं। लेकिन इन सब के बीच दिनेश कुमार गौतम जैसे भी कुछ शख्स हैं जिन्होंने समाज कल्याण का बीड़ा उठाते हुए तन-मन-धन से समर्पित हैं।

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