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महाराष्ट्र की पहली महिला आईपीएस ऑफिसर मीरा की कहानी, जो फिल्म मर्दानी की प्रेरणा बनी

हमारे देश में अपराध तेजी से बढ़ रहा है। केवल कुछ ही लोग हिम्मत के साथ और अपना जीवन दांव पर लगाकर इसके खिलाफ खड़े होते हैं। साहस, ईमानदारी और नैतिकता किसी व्यक्ति को सीना तानकर आसुरी ताकतों का सामना करने की शक्ति प्रदान करती है और वही व्यक्ति एक विजेता के रूप में उभरता है। ऐसा ही एक नाम लेडी सुपरकॉप मीरा बोरवांकर का है जो 150 साल के इतिहास में पहली महिला हैं जो मुंबई क्राइम ब्रांच की कमिश्नर बनीं।

पुलिस सेवा में महिलाओं की उपस्थिति केवल एक या दो प्रतिशत ही है, परन्तु मीरा की कहानी अलग है उनके नेतृत्व के तले 300 ऑफिसर्स हैं। आज मीरा एक स्पेशल इंस्पेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस, पुणे स्थित सीआईडी स्टेट क्राइम ब्रांच और पुलिस फोर्स की मेजर ऑफिसर्स के रूप में सेवाएं दे रही है।

एक बॉर्डर सिक्योरिटी फ़ोर्स ऑफिसर की बेटी मीरा का जन्म और लालन-पालन पंजाब के फाजिल्का में हुआ था। वह मेहनती विद्यार्थी थी जो शुरू से ही अपनी पढ़ाई को प्रथम प्राथमिकता देती थीं। उन्होंने लिटरेचर से एमए किया और पढ़ते समय ही वे कॉलेज की हेड गर्ल बन गई। वह पढ़ने की शौक़ीन थीं और आगे पढ़ना चाहती थी।

मीरा लॉ एनफोर्समेंट में पॉलिसी एनालिसिस की पढ़ाई करने यूएसए की मिन्नेसोटा यूनिवर्सिटी गई। विविध प्रकार की शिक्षा लेने से उन्हें अलग-अलग संस्कृति और लॉ प्रवर्तन के बारे में ज्ञान हासिल हुआ। वे हमेशा पढ़ाई और दूसरी गतिविधियों में अच्छा करती थी। मीरा नाटक, ड्रामा, वाद-विवाद और खेलों में भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेती थी। पंजाब क्रिकेट टीम में भी वे शामिल थी।

किरण बेदी उनकी प्रेरणा श्रोत थीं जिन्होंने उनके कॉलेज के समय ही आईपीएस ज्वाइन किया और अपने क्रन्तिकारी सोच के द्वारा समाज में सनसनी फैला दी। मीरा की एक शिक्षक ने उन्हें कहा था कि उनमें आईपीएस ऑफिसर बनने के सारे गुण हैं। उस शिक्षक के दिशा-निर्देश में ही वह अपनी मंजिल की ओर आगे बढ़ती रहीं।

मीरा ने पहली बार में ही यूपीएससी की परीक्षा पास कर ली। उन्होंने इंडियन एकाउंट्स और ऑडिट सर्विस का विकल्प चुना क्योंकि उनके माता-पिता ने सुझाव दिया था कि पुलिस सर्विसेज महिलाओं के लिए सुरक्षित नहीं है। उन्होंने ट्रेनिंग ली पर खास अच्छा नहीं लगा और उन्होंने इसे बीच में ही छोड़ दिया। मीरा ने फिर परीक्षा दी और इस बार उन्होंने आईपीएस को चुना।

ट्रेनिंग के समय वह अकेली महिला थी। यह उनके लिए कठिन था, उन्हें ट्रेनिंग में कोई रियायत नहीं मिलती थी। उनके बैच के सभी पुरूष साथी मिलकर पार्टी करते तब वे अकेला महसूस करती थी। बहुत जगहों पर उनकी पोस्टिंग हुई परन्तु एक लेडी ऑफिसर के नीचे काम करना पुरूषों को अच्छा नहीं लगता था।

मीरा ने मुंबई में रहते समय दाऊद इब्राहिम और छोटा राजन के बहुत से ग्रुप के सदस्यों को सलाखों के पीछे पहुँचाया था। सबसे बड़ा केस जलगांव सेक्स स्कैंडल उनके नेतृत्व में ही सुलझ पाया था। उस समय वह गर्भवती थीं। इस केस में स्कूल और कॉलेज की लड़कियों को देह व्यापार के व्यवसाय में ढकेलने की बात सामने आई थी। जाने-माने राजनीतिज्ञों, बिज़नेसमैन, और अपराधियों द्वारा महिलाओं से बलात्कार किया जाता था। वे उनकी फिल्म बनाकर उन्हें ब्लैकमेल किया करते थे।

जलगाँव में यह धंधा सदियों से चला आ रहा था। पांच से बारह वर्ष तक की लड़कियां इसमें शामिल थीं और शिकार महिलाओं की संख्या 300 के लगभग थी। ब्लैकमेलिंग के डर से लड़कियां उनकी शिकायत नहीं करती थीं। इस स्कैंडल का खुलासा करने में मीरा ने अहम रोल निभाया था। इस घटना के बाद मीरा देश भर की मीडिया की सुर्ख़ियों में छाई रही। 

मीरा ने सतारा में एक केस डकैती का सुलझाया था जो उस समय अपने चरम पर था। मीरा ने इस केस को चतुराई के साथ संभाला। इन केसों के अलावा उन्होंने बहुत सारे केस अपने नेतृत्व में सुलझाया और सिद्ध कर दिया कि पुलिस डिपार्टमेंट में एक ईमानदार और बहादुर ऑफ़िसर भी है। 

भारत के राष्ट्रपति के द्वारा उन्हें 1997 के मेरिटोरियस सर्विस के लिए मेडल प्रदान किया गया। मीरा की ईमानदारी और सराहनीय कामों के लिए बहुत सारे पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। उनकी  ज़िन्दगी पर एक “मर्दानी” नाम की बायोपिक भी बनी जिसमें रानी मुखर्जी ने मीरा का रोल अदा किया था। 

1981 में मीरा महाराष्ट्र कैडर की ऑफिसर बनी, 1987-1991 तक उन्होंने डिप्टी कमिश्नर ऑफ़ पुलिस के रूप में सेवा देती रहीं। वे औरंगाबाद में डिस्ट्रिक्ट सुपरिन्टेन्डेन्ट ऑफ़ पुलिस के स्वतंत्र प्रभार में रहीं और सतारा के चार्ज में 1996-1999 तक रही। 1993-1995 तक उन्होंने स्टेट क्राइम ब्रांच की भी बागडोर संभाली। मीरा मुंबई में सीबीआई के आर्थिक अपराध शाखा और नई दिल्ली के एंटी-करप्शन ब्रांच में डीआईजी के रूप में भी सेवा प्रदान किया है। 

मीरा ने यह सिद्ध कर दिया है कि लिंग-भेद असंगत है। अगर आपके दिल में दृढ़ विश्वास है तो आप महिला होकर भी पुरूष प्रधान समाज में हर क्षेत्र में अपना मक़ाम बना सकती हैं। हमारे देश में सुधार की बहुत जरुरत है और महिला और पुरूष दोनों मिलकर देश को प्रगति की राह पर आगे बढ़ा सकते हैं। 

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